ग़ुलामी की ज़ंजीरें
ग़ुलामी की ज़ंजीरें By Rakesh K Sharma ना रुकना है , ना झुकना है , आगे ही बढ़ते जाना है। इस देश को गंदे हाथों से , हमें मिलकर इसे छुड़ाना है। आज़ाद परिंदे हम हैं यहाँ , ग़ुलाम नहीं हम रह सकते। ये बहुत सह लिया अब तक हमने , अब और नहीं इन्हें हम सह सकते। ग़ुलामी की इन ज़ंजीरों को, अपनी मौत से हमने सजाया है। जिस वतन में पैदा हुए थे हम, उस वतन को तुमने रुलाया है। ऐ कायर, तू कब तक छुपकर बैठेगा, इक दिन तेरा भी आना है। जो पाप किए हैं सब तूने, तुझे उनका हिसाब बताना है। इस धरती पे अब बोझ है तू, कुदरत ही दिखाएगी अब रंग अपना। जब खुल जाएँगे सब राज़ यहाँ, तब दिखने लगेगा तुझे ये बुरा सपना। तू राम लुटेरा ज़ालिम है तू, बच्चों को भी लूटा है तुमने। जिस माँ ने दिया था जनम तुम्हें, उस माँ को भी लूटा है तुमने। तू भारत माँ को जय न कर, वो ख़ून के आँसू रोती है। जब तू हाथ लगाता है इस तिरंगे को, वो ख़ुद से शर्मिंदा होती है। जिन्होंने इस माँ के लिए बलिदान दिए, वो फिर से आज ...