लोकतंत्र म्यूट पर: जब विरोध “देशद्रोह” बन जाए और चुप्पी “देशभक्ति”
लोकतंत्र म्यूट पर: जब विरोध “देशद्रोह” बन जाए और चुप्पी “देशभक्ति” English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2026/05/democracy-on-mute-when-protest-becomes.html कल खबर आई कि लोकसभा में विपक्ष के नेता ने प्रधानमंत्री को दो पन्नों का एक कड़ा पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने CBI निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई। आज के भारत में दो पन्नों का विरोध पत्र लिखना लगभग ऐसा है जैसे तूफान के बीच खड़े होकर फुसफुसाना, जबकि टीवी चैनल उसी समय पाकिस्तान पर 47वीं बहस चला रहे हों। पत्र में आरोप था कि संवैधानिक प्रक्रिया और संस्थागत जवाबदेही को एक बार फिर “औपचारिकता” समझकर किनारे कर दिया गया। एक और नियुक्ति। एक और “स्वतंत्र” संस्था। एक और ऐसा अधिकारी, जिसका असली काम शायद वही होगा जो आजकल हर बड़े पद पर बैठे व्यक्ति का होता है चुप रहना, सिर हिलाना, और सत्ता की सुविधा के अनुसार काम करना। अब भारत की कई संस्थाएँ लोकतंत्र की रीढ़ कम और ड्राइंग रूम की सजावटी वस्तु ज़्यादा लगने लगी हैं। दिखने में शानदार। नाम बड़े। मुहरें असली। लेकिन रिमोट किसके हाथ में है, यह सबको पता...