अंधभक्ति की पराकाष्ठा (By Rakesh Sharma)
अंधभक्ति की पराकाष्ठा
जब मैंने किसी को अपनी कविता सुनाई
उसने मुझसे पूछा, "मोदी को ऐसा क्यों कहते
हो भाई?"
"अगर मोदी नहीं, तो कौन बनेगा देश का पीएम?
अगर मोदी नहीं, तो कौन लाएगा अच्छे दिन?"
मैंने कहा, "मेरे दोस्त, कब तक मूर्ख बने
रहोगे?
मोदी के अच्छे दिनों के वादों में खुद को रगड़ते
रहोगे।
लगता है मोदी के 'अच्छे दिन' कछुए पर चढ़कर आ रहे
हैं,
दस साल से देख रहे हैं, पर नजर कहीं नहीं आ रहे हैं।
दस साल पहले तुम्हें मोदी ने अच्छा मूर्ख बनाया,
दुनिया को पता चल चुका है, मगर तुम्हें अभी तक
समझ नहीं आया।
सोचा था, पढ़े-लिखे हो, थोड़ी तो अकल होगी,
दो ट्रिलियन डॉलर कर्ज हो गया है देश पर, और फिर
भी करते हो 'मोदी मोदी'।
तरक्की के नाम पर लूटा है पूरे देशवासियों को,
कर्ज चुकाएंगे देशवासी, इन अमीरों की जेबें भरेंगे वो।
कब तक जाहिल बने रहोगे, अब तो कुछ सीख जाओ तुम,
अंधभक्ति की भी कोई हद होती है, अब थोड़ा जमीन
पर आ जाओ तुम।
कुछ दिन पहले मोदी ने खुद को ही खुदा बताया,
कहाँ से मैं जन्मा हूँ, अपनी माँ पर ही सवाल उठाया।
जाहिल जो कहता खुदा अपने आप को, तुम्हें क्या सिखाएगा,
छोड़ दोगे उसे आज तो, हो सकता है तुम्हारा भला
हो जाएगा।
By
Rakesh K Sharma
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