पत्रकारिता का पाखंड
पत्रकारिता
का पाखंड
गोदी मीडिया स्टार्स
दुम हिलाते चलते हैं ये, पत्रकार कहलाते हैं
मुँह में इनके घूस ठोक दो, जो कहो वही बतलाते हैं
समाचार न ढूंढ पाते ये, बीजेपी के गुण गाते हैं
शर्म नहीं आती है इनको, नेशनल पत्रकार कहलाते हैं
जनता इनको जूते मारे, जनता से ये डरते हैं
एसी कमरों में बैठकर, ये नकली समाचार लिखते हैं
जनता को कैसे गुमराह करना, इनसे अब सब कोई सीखेगा
बीजेपी की हर गलती पर, सफाई अच्छी कोई नहीं देगा
तीन सौ तीन सौ रैप करके, बीजेपी वाले छूट जाते
हैं
उनके बारे में नकली पत्रकार, कभी नहीं कुछ भी बताते
हैं
आज मोदी ने मौका दिया इन्हें, मोदी का चिंतन दिखाने
का
लारें टपक रही थीं इनकी, मौका नहीं गंवाने का
पहुंच गए अपने लेकर जंतर, डेरा वहां लगाने को
देश चाहे भाड़ में जाए, इनका कुछ नहीं बताने को
बेच चुके हैं मर्यादा अपनी, पत्रकार न कहो इन्हें
तुम
इससे ज्यादा कोई नहीं गिर सकता, पालतू कुत्ते ही
इन्हें समझो तुम
By
Rakesh K Sharma
Disclaimer: This poem expresses the feelings of the common people who understand what real journalism is.
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