समाज की सच्चाई
समाज की सच्चाई
जब दुनिया में कुछ लोग यूं ही, नफ़रत की महफ़िल
सजाते हैं
इंसान को मत इंसान समझो, ऐसी नफ़रत वो फैलाते हैं
कभी धर्म के नाम कभी जात के नाम, एक-दूजे को लड़वाते
हैं
भगवान को भी इंसान की तरह, ये ऊँचा नीचा दिखाते
हैं
भगवान के होने का दावा, ये पत्थर को खाना खिलाते
हैं
अगर पत्थर भी अब खाने लगे, हो सकता नहीं ये इन्हें
बताना है
पत्थर की पूजा करते ये लोग, इंसानों से नफरत करते
हैं
भगवान सभी में होता है, पहचान कभी नहीं करते हैं
इस झूठ का जाल चलाएंगे ये कब तक, न सोचा है न जाना
है
दुनिया को अनपढ़ रखना है, बाकी तो एक बहाना है
अगर गलती से पढ़ गए ये लोग, बहुत सवाल पूछेंगे
ये
जो पैसा हम लाते हैं उनसे, हिसाब उसी का पूछेंगे
ये
जो पैसा लूटा था हमने, वो अपनों में है बांट दिया
हिसाब उसका दे न सकते, ये काम हमने खुद ही किया
ये बात उन्हें समझ आ जाए कभी, दूर हमें चले जाना
है
इसे जनता की सेवा कहते, हकीकत में ये एक बहाना
है
_राकेश शर्मा_
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