छल का खेल

 छल का खेल


बड़े दिनों से देख रहे हैं,

चुनावी बंदों की ये चाल,

वोटर्स ने ठुकराया इनको,

तब से हुआ है इनका बुरा हाल।

 

चूमने पड़े पांव नीतीश, नायडू बाबू के,

बनना है इनको प्रधान,

हजारों वादे ये कर चुके हैं,

मुकर जाएंगे देकर जुबान।

 

ऐसा इनका चाल चलन है,

सबको खबर है जिसकी,

धोखा देते हैं सबको हमेशा,

जुबान फिसलती नहीं इनकी।

 

याद करो तुम अब सब मिलकर,

वादे किए थे जो इन्होंने,

जुमला बता कर जिम्मेदारी से,

हाथ धो लिए थे इन्होंने।

 

धोखे बाजों ने मिलकर बनाया है,

BJP का ये खेला,

चाय बेचने वाले को प्रधान बनाया,

बेच दिया उसका ठेला।

 

जिस स्टेशन पर उसने चाय बेची थी,

बना नहीं है तब तक,

इसमें भी ये झूठ बोलकर,

बता रहे हैं सबको अब तक।

 

इतने झूठ बोल चुका है ये बंदा,

राम ने भी अब इसे ठुकराया,

अयोध्या से भगा कर इसको,

काम अपना करके दिखाया।

 

राम नाम में जानते हैं हम सब,

प्यार ही प्यार भरा है,

बदनाम करे जो राम नाम को,

उसका पतन होना लिखा है।

 

_राकेश शर्मा_

Comments

Popular posts from this blog

How We Turned an Abstract God into Concrete Hate

Distraction as Governance: How a Scripted National Song Debate Shielded the SIR Controversy

Superstitions: Where Do They Come From, and Why Do People Believe in Them?