पेड़ की पुकार

 

पेड़ की पुकार




इस जून के महीने में भी 

चली आ रही है अप्रैल से बरसात। 

सर्दियों में बर्फ कम पड़ी है, 

ये बरसती है अब दिन रात।

 

सब पेड़ भी थोड़े परेशान हैं इससे, 

कितना पानी पियें हम, 

हमें धूप भी चाहिए है ये, 

धूप से ज़िंदा रहते हैं हम। 

 

धरती पर इस जीवन को, 

हम करते हैं कुर्बान यहाँ। 

इस पानी में गोते खाकर, 

कर न पाएंगे कुदरत का काम। 

 

इंसानों की तरह पानी में 

ज्यादा देर सांस ले सकते नहीं। 

कितनी कोशिश भी क्यों ना कर लें, 

इतना पानी पी सकते नहीं। 

 

ऐसा क्या कर दिया इंसान ने 

जो ये मौसम है बदल गया, 

कहीं ज्यादा गर्मी और 

कहीं इतना पानी बरस गया। 

 

लगता है ये खुदगर्ज इंसान 

खुदगर्जी में ये सब करता है। 

कुदरत ने जो सब इसको दिया है, 

उस सबको ये बदलता है। 

 

कुदरत की असली ताकत को, 

ये मूर्ख कुछ जानता नहीं, 

जब कुदरत की मार पड़ती है, 

ये उसको पहचानता नहीं।

 

कुदरत की जब मार पड़ती है, 

तब पूरी दुनिया रोती है। 

संभल जा मेरे भाई जल्दी, 

किसी को ये नहीं बख्शती है। 

 

_राकेश शर्मा_

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