खामोश आवाज
खामोश आवाज
खामोश करे जो इस दिल को,
ये आवाज उन्हीं से कहती है
कांटे तो बहुत हैं इन राहों पर,
नाराज किसी से ये न रहती है
हमें लगता है तुम इक दिन,
इस बात को खुद जान पाओगे
जिस खंजर पर तुम बैठे हो,
चुभने पे उसे पहचान जाओगे
बदलती हुई इस दुनिया में,
इंसान को कुछ करना होगा
खामोश हो जाएं हम इस पल,
ये हमको गवारा ना होगा
कविताएं तो मेरी कोशिश हैं,
उनकी आवाज मैं उठा पाऊं
जो टूट चुके हैं इस जग में,
मैं उनकी पुकारें सुना पाऊं
हर ताकतवर ये चाहता है,
खामोश हो जाए ये सब दुनिया
ये कविताएं ही तो हैं जिनमें उनको,
अपना असली रूप दिख जाता है
जिस खौफ के डर में रहते जो,
ये उनको जगाना चाहती हैं
कविताएं मेरी खामोश सही,
पर दिल में जाकर लग जाती हैं
_राकेश शर्मा_
Comments
Post a Comment