रोने धोने की राजनीति
रोने धोने की
राजनीति
सौ साल की नफरत दिल से
ऐसे खत्म नहीं होती है,
घी डालते रहोगे उसमें,
आग और बढ़ती जाती है।
धर्म के नाम पे बांटा मुल्क को,
धर्मों से नफरत आज भी है,
सौ सालों से नफरत फैलाने वालों में,
देश का बना प्रधान है।
सोचा था बरसों से इन पर,
कुछ तो फर्क पड़ेगा भाई,
हालत देश की अच्छी हुई थी,
खूब की इन लोगों ने कमाई।
जैसे नीचे से उठ कर
ऊपर लोग आने लगे,
ईर्ष्या इनकी बढ़ती गई,
इन्हें और भी दबाने लगे।
स्वतंत्रता में विश्वास नहीं रखते,
मचाने लगे हिंदुत्व का शोर,
हिंदू धर्म सबसे बड़ा है,
करने लगे संविधान को कमजोर।
समय बदल चुका है इतना,
चल नहीं पाएगा इनका जोर,
जितना लूटा धन देश का,
चलेगा नहीं इनका उसपे जोर।
रोने वाला ये प्रधानमंत्री,
था देखा नहीं इस देश ने,
रो-रो कर जनता को कहता,
मेरा गला दबाया है देश ने।
जनता पूछ रही है मोदी को,
जनता के सवालों के जवाब दो,
रोना-धोना छोड़ो भाई,
जनता का काम करो।
मोदी बोलें जनता को कैसे,
लूटा उसने देश को,
सारे प्रोजेक्ट अपनों को देकर,
ठेंगा दिखाया हर प्रदेश को।
फंस चुके इस बार मोदी जी,
बजट सबको दिखलाने में,
रोना-धोना शुरू किया है,
ध्यान जनता का भटकाने में।
पूरा यकीन है मोदी जी पर,
लोकसभा में भी रोएंगे,
जनता की सहानुभूति के लिए,
अपना आपा खोएंगे।
ऐसा अनपढ़ प्रधानमंत्री,
चुना है इस देश ने,
लूट रहा देश को जम कर,
बताया है तुमको राकेश ने।
© राकेश शर्मा
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