झूठ की लंका

 

झूठ की लंका


एक शाम जब बैठे थे हम एक जाम के साथ, 

दिल की गहराइयों ने पकड़ा था हाथ। 

सोच रहे थे ऐसा क्या बदल गया है अब, 

सच्चाई की कोई नहीं करता है अब कद्र। 

 

जब समझा क्यों करें कोई सच्चाई की बात, 

क्योंकि देश का नेता बोलता है झूठ दिन-रात। 

मीडिया उस झूठ को सबको सुनाता, 

राजा का सच है बताकर सबको खिलाता। 

 

जनता जो पुजारी के झूठ को सच माने, 

वो टीवी के झूठ को रावण का सच माने। 

रावण का घमंड यूँ बढ़ता गया, 

"मैं राम को लाया हूँ" दुनिया को कहता गया। 

 

राम किसी का घमंड सहते नहीं, 

रावण की लंका में रहते नहीं। 

अयोध्या से रावण की हुई जब हार, 

रावण बना तब क्रोध का शिकार। 

 

अब ये रावण तो कुछ कम पढ़ा-लिखा है, 

जिसका राज झूठ के पाँव पे खड़ा है। 

इस रावण ने लूटा है जनता को खूब, 

हमेशा ये बोलता है जनता से झूठ। 

 

मीडिया के दम पे झूठ की लंका खड़ी की, 

हर रोज़ इसने नई कहानियाँ गढ़ी थी। 

पर सच्चाई कभी झूठ को सहती नहीं, 

रावण की झूठी लंका कभी रहती नहीं। 

 

©_राकेश शर्मा_

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