बुद्धिहीन की राजनीति

This poem summarizes what is seen in the parliament speeches of India and the functioning of the government. Please read also the blogs from the last few days to better understand everything. Enjoy this poem.

बुद्धिहीन की राजनीति



कुछ लोगों में होता है ये, 

बिना सुने और सोचे ही बोलना है। 

जिससे जनता मूर्ख बन जाए, 

उसे तो जरूर चिल्ला कर बोलना है। 

 

कम पढ़े-लिखों की पहचान अगर करनी हो तो, 

बातें इनकी सुनो तुम। 

ये हर बार उन्हीं बातों को दोहराएंगे, 

जिनसे मूर्ख बनोगे तुम।

 

संसद के भाषणों को देखकर, 

एक बात तो समझ आ गई थी। 

मोदी-शाह की बजी पड़ी थी, 

राहुल ने क्लास लगाई थी। 

 

जवाब न दे पाए किसी भी सवाल का, 

तब ढूंढ रहे थे मौके को। 

हिंदू सुन कर तड़प उठे थे, 

अब कैसे जाने दें इस मौके को। 

 

पूरी बात समझ नहीं आई, 

फर्क इनको नहीं पड़ता है। 

हिंदुओं को कोई हिंसक बताए, 

उसे सबक सिखाने का मौका है। 

 

तब राहुल ने फिर से बताया इनको, 

हिंदू हिंसक हो सकता नहीं। 

हिंदू नाम का मतलब ही है, 

अहिंसा है उसका धर्म यहीं। 

 

बीजेपी को हिंसक कहा मेंने, 

ये राहुल ने मोदी जी को कहा। 

तुम बातें हिंसा की करते हो, 

हिंदू हो सकते नहीं हो तुम।

 

अगले दिन ही मोदी भक्तों ने 

हमला गुजरात में कर डाला, 

कांग्रेस का ऑफिस उजाड़ कर 

राहुल को सच साबित कर डाला।

 

करोड़ देते हैं शहीद अग्निवीर परिवार को, 

राजनाथ ने ये सबको कहा, 

राहुल ने वीडियो मीडिया में डाल कर, 

राजनाथ के झूठ को नंगा किया।

 

इतने झूठ बोल चुके हैं सबको 

खुद भी इनको पता नहीं, 

सच से रिश्ता है नहीं इनका 

इसलिए सच ये कभी बोल सकते नहीं।

 

मंदबुद्धि को असली बातें, 

कभी समझ आती नहीं हैं। 

जो इनके मन में बसी हैं, 

उन्हें ये दोहराते हैं। 

 

मूर्ख बना कर जनता को, 

ये नेता बन जाते हैं। 

इनकी दुनिया में रहने वाले, 

कभी समझ नहीं पाते हैं। 

 

मंदबुद्धि भले ही हों ये, 

शातिर बहुत ये होते हैं। 

काम-धाम नहीं करना इनको, 

जनता के टुकड़ों पर पलते हैं। 

 

अगर गलती से चाबी इनको, 

देश ने दी तिजोरी की। 

लूट के ले जाते हैं माल देश का, 

तुम पूजा करो खाली तिजोरी की। 

 

घंटा इनसे सीखोगे तुम, 

जो नाली से गैस निकालते हैं। 

ऐसा झूठा प्रचार करके फिर, 

थाली तुमसे बजवाते हैं। 

 

हमको तो मालूम हैं ये मूर्ख, 

तुमको कैसे लूट रहे, 

पर तुम कब सुधरोगे मेरे भाई, 

अब देश को हैं ये लूट चुके। 

 

लाखों-करोड़ों का हिसाब मांगोगे इनसे, 

देशद्रोही तुमको कहलवाएंगे। 

जिस दिन सत्ता गई हाथों से, 

सारे बनाए पुल इनके गिर जाएंगे। 

 

उस दिन किसको ढूंढोगे तुम, 

जब होगा देश ये बिक चुका। 

तब पूछूंगा मैं तुमसे, 

तुमने देश के लिए क्या किया? 

 

धर्म की राजनीति में पड़कर, 

कोई देश नहीं सुधरा है। 

नज़र मारकर देखो पड़ोस में, 

उस देश का कैसा मंजर है। 

 

मंदबुद्धि के भले हों ये नेता, 

मूर्ख नहीं कभी होते हैं ये जान लो। 

चालें इनकी होती हैं ऐसी, 

समझ नहीं आती हैं किसी को।

 

ऐसे शातिर लोग ये हमको, 

मिल जाते हैं हर देशों में। 

जो लूट मचा रखी है इन्होंने, 

जीसे रखते हैं ये परदेसों में।

 

_राकेश शर्मा_

 

 

 


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