पिछड़ी मानसिकता
पिछड़ी मानसिकता
कल
मेरे किसी जान-पहचान वाले ने मुझे ये दैनिक भास्कर की खबर भेजी। मुझे नहीं मालूम कि
इस खबर के पीछे दैनिक भास्कर की क्या सोच है, मगर, इस समाचार से एक बात तो स्पष्ट है
कि हमारे समाज ने अपने ही लोगों की कदर करना नहीं सिखाया है। हम एक ऐसी मानसिकता के
गुलाम हैं जिसने हमारी सफलता और असफलता को हमारी किस्मत के साथ जोड़ रखा है, जो अमीर
हैं वो किस्मत वाले हैं, और जो गरीब हैं, वो बदकिस्मत हैं। आप सरकार ने औरतों के लिए
मुफ्त बस सेवा इसलिए की, क्योंकि हमारे समाज में पैसे का हक हमने आदमियों को दे रखा
है, जब कोई गरीब होता है, तब ये समस्या और भी बढ़ जाती है। इसलिए कि गरीब औरतों को
मुफ्त बस में आना-जाना उनके लिए एक जरूरत बन जाती है ताकि वो अपने परिवार के लिए काम
करके पैसा कमाएं, जो वो अपने मोहल्ले में नहीं कर सकती, क्योंकि वहां वैसे ही लोग रहते
हैं जिनको काम की जरूरत है। जब एक बस ड्राइवर ये हक उनसे छीन लेता है, तब वो अपने ही
समाज का नुकसान करता है, क्योंकि, काम देने और करने से समाज की आर्थिक उन्नति होती
है और साथ में देश की भी। गरीब ही जब गरीब से जब नफरत करने लगता है ताकि उसका अमीर
मालिक उससे खुश हो जाए, ये हमारी पिछड़ी हुई मानसिकता का परिमाण देती है। इसीलिए जब
राहुल गांधी ने कहा था कि 73% लोग जो इस देश को चलाते हैं, वो सोए हुए हैं, तो वो सबको
जगाने की कोशिश कर रहा था। जब तक ये समाज ऐसी गुलामी को मानता रहेगा, तब तक भारत एक
महान देश कभी नहीं बन सकता। अफसोस है कि ड्राइवर लोग ऐसा कर रहे हैं। इस समस्या का
तो संविधान है आज के टेक्नोलॉजी युग में, और हो सकता है इस रिपोर्ट के बाद सरकार कोई
एक्शन लेगी, लेकिन ऐसा हो रहा है, ये गलत है और हम सबको इसकी निंदा करनी चाहिए।
राकेश
शर्मा
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