समाज के फंदे

 

समाज के फंदे



वो ज़िंदगी ही क्या है 

जो उधार में मिली हो, 

ना पहचानें दिल की धड़कन, 

ना ज़िंदगी की रीत को। 

 

खोया है जिसमें सब कुछ 

इन रीतियों में यूँ ही दब कर, 

हर दम सांस जिसकी मांगे 

कबूल करो मुझे खुलकर। 

 

इन्हीं हसरतों में जी कर 

हम सब गुजर रहे हैं, 

बस ख्वाब में है आज़ादी, 

गुलाम यहाँ पड़े हैं। 

 

ये समाज हमको कहता, 

क्या ठीक किया है हमने, 

है बात उनकी मानी, 

दिल दफ़न किया है हमने। 

 

जब देखा उस शख्स को 

फांसी पे चढ़ गया वो, 

आज़ाद दिल था उसका, 

आज़ादी सिखा गया वो। 

 

घुट-घुट के जी रहे हैं, 

आज़ाद खुद को कहते, 

आज़ाद हैं परिंदे, 

उसी को आज़ादी कहते। 

 

Copyright © Rakesh Sharma

   

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