धर्म का गंदा खेल

 

धर्म का गंदा खेल


अचानक आज मेरी दुनिया में,
कुछ ऐसी बातें हो गईं।
ये ज़हर भरा जो सीने में,
उस ज़हर की दुनिया में सो रही।

क्या सच है और क्या झूठ यहाँ,
ये कैसे उसको बता सकें।
जो ज़ोर से बातें कर सकते,
वही बातें इन तक आ सकें।

इस धर्म की दुनिया में जब यूँ,
जहां देते हैं बलिदान हम।
खो जाते हैं उस दुनिया में,
बन पाते नहीं इंसान हम।

वहाँ झूठ परोसा जाता है,
सच का कर देते बलिदान हम।
कोई गलती से उन्हें ना माने,
तब बन जाते हैवान हम।

इस धर्म के नाम पर धरती पर,
लाशों की गिनती रुकती नहीं।
जिसे झूठ से खड़ा किया था कभी,
बलिदानों की गिनती थमती नहीं।

धर्म के नाम का तिलक लगाकर,
हम दुनिया को दिखाते हैं।
जो काले काम किए हमने,
उन्हें कैसे हम यूँ छुपाते हैं।

इस धर्म के नाम पे गोरों ने,
दुनिया को जाकर लूटा था।
जो वादे किए थे उन सब से,
हर वादा इनका झूठा था।

हर बात-बात पे धर्म यहाँ,
यहाँ बाँटे सब इंसानों को।
फिर लूटें सबको जी भर के,
हम देख न पाएँ हैवानों को।

जो धर्म की गंदी कुटिया से,
किसी देश को जब वो चलाता है।
वो राजा फिर उस देश को,
एक कुएँ में लेकर जाता है।

 

© Rakesh K. Sharma


Comments

  1. It is a good and well meaning attack on one of the most exploitative institutions which have hurt humankind, perhaps the most.

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  2. But for a long time now, people are also responsible for adhering to this injurious belief belying all logic and knowledge.

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