सत्ता के गलियारों में डर: दहाड़ते शेर से चीखते चूहे तक

 

सत्ता के गलियारों में डर: दहाड़ते शेर से चीखते चूहे तक

1947 के बाद से भारतीय संसद ने कई तरह का राजनीतिक ड्रामा देखा है, लेकिन कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि संसद के भीतर प्रधानमंत्री को खुलेआम वोट चोर गद्दी छोड़ कहा गया हो। यह नारा बार-बार गूंजता रहा और मोदी अपने लटकते हुए चेहरे के साथ चुपचाप बैठे रहे, कुछ कर नहीं पाए। अगर उनमें ज़रा भी शर्म या आत्मसम्मान होता तो वे तुरंत पुनर्गणना की मांग करते ताकि साबित कर सकें कि उनकी जीत असली थी। लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि वे खुद जानते हैं कि जिस कुर्सी से वे चिपके बैठे हैं, वह जनादेश से नहीं बल्कि हेरफेर से हासिल की गई है।

विडंबना देखिए, भाजपा ने कभी हारने की गरिमा का अनुभव भी किया है कम से कम एक बार। 2013 में दिल्ली चुनाव में बहुमत मिलने पर भाजपा ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया। इसने आप और कांग्रेस को मौका दिया कि वे मिलकर सरकार बना लें। उस फैसले ने आप को पंजाब तक पहुंचा दिया और आगे बढ़ा दिया। भाजपा ने उस गलती से सीख ली, लेकिन लोकतंत्र की नहीं। इस बार मोदी और शाह ने विनम्रता नहीं बल्कि चालबाज़ी को चुना।

फिर भी, डर छिपाया नहीं जा सकता। मोदी का नया शौक है छिपना: संसद से गायब, जनता से दूर, सिर्फ़ मंचित आयोजनों में झलक। शाह ने एक और रास्ता चुना है कानूनों को फिर से लिखकर विपक्ष की आवाज़ बंद करना। मगर उनका तथाकथित शौर्य भी डर से लथपथ है। जब वे अपना नयापावर ग्रैबबिल पेश करने आए तो बीस मार्शलों जी हाँ, बीस के घेरे में, चौथी पंक्ति में जाकर बैठे। संसद में अपने ही साथियों से डरकर सेना बुलानी पड़े तो यह शौर्य नहीं, लाचारी कहलाती है।

इसी बीच विपक्ष को खून की गंध चुकी है। एनडीए के कुछ सहयोगी भी अगर पाला बदल दें तो सरकार रातों-रात गिर सकती है। बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की सभी के लिए मताधिकार बचाओ यात्रा में उमड़ती भीड़ साफ़ बता रही है कि इंडिया गठबंधन सिर्फ़ ज़िंदा है बल्कि ताक़तवर हो रहा है। यही बढ़ती लहर है जो मोदी और शाह की नींद उड़ा रही है।

शेर जैसी दहाड़ का ढोंग करने वाले मोदी अब ज़्यादा चूहे नज़र आते हैं तभी बाहर निकलते हैं जब माहौल सुरक्षित हो, और उन चापलूसों पर टिके रहते हैं जिनकी जेब जनता के पैसों से भरी गई है। 21 अगस्त 2025 को मानसून सत्र के आख़िर में उनकी मौजूदगी ने उन्हें राहत नहीं बल्कि और अपमान ही दिलाया। कोई भी नेता जिसमें ज़रा भी आत्मसम्मान होता, ढह जाता। लेकिन मोदी वही शख़्स हैं जो अपनी पत्नी को छोड़ चुके हैं, अपनी माँ को किनारे कर चुके हैं, और अब सवालों से बचने के लिए खुद कोग़ैर-जैविकबताते हैं।

15 अगस्त को लाल क़िले से उनका भाषण और भी ज़्यादा चौंकाने वाला था। उन्होंने आरएसएस को श्रेय दिया वही संगठन जिसने भारत की आज़ादी का विरोध किया था। एक प्रधानमंत्री जिसने उस संविधान पर शपथ ली है जिसे स्वतंत्रता सेनानियों ने लिखा था और जिसने रियासतों को जोड़कर एक भारत बनाया, वही प्रधानमंत्री आज़ादी के दुश्मनों का महिमामंडन कर रहा है। और भाजपा-आरएसएस के बीच झगड़े की जो कहानियाँ मीडिया में गढ़ी गईं? वह महज़ नाटक है। सच तो यह है कि भाजपा और आरएसएस एक ही नस में बहते हैं।

पैसे की राह पकड़िए तो तस्वीर और साफ़ हो जाती है: गुजरात और महाराष्ट्र की भ्रष्ट कंपनियाँ आरएसएस को मोटी रकम देती हैं। आरएसएस उसी से भाजपा और एनडीए को मज़बूत रखता है। यह शासन नहीं है, यह सत्ता का कार्टेल है।

लेकिन इस बार माहौल बदला हुआ है। कभीपप्पूकहकर मज़ाक उड़ाए गए राहुल गांधी आज वह नेता बन चुके हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है। उनके जोशीले भाषण और भ्रष्टाचारियों को खुली चेतावनी सीधे दिल में चुभ रही है। तेजस्वी यादव इस लहर को और मज़बूत कर रहे हैं। यहाँ तक कि कभी भाजपा के भोंपू रहे गोदी मीडिया अब सावधानी से कदम रख रहे हैं उनकी चुप्पी ही डर को उजागर करती है।

सच सामने है: भाजपा, ईसीआई और उनकी पूरी मशीनरी घिर चुकी है। पानी सर से ऊपर जा चुका है। और इस बार सिर्फ़ विपक्ष नहीं, बल्कि जनता भी खून की गंध महसूस कर रही है।

क्योंकि जब शेर चूहों की तरह भागने लगें, तो जनता बिल्लियों को बुलाने में देर नहीं करती।


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