जब खबरें शोर बन जाएं: भारतीय पत्रकारिता की मौत
जब खबरें शोर बन जाएं: भारतीय पत्रकारिता की मौत
https://www.youtube.com/watch?v=EYYkb92LQvA
https://www.youtube.com/shorts/ppyhXqocG9Y
https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2025/08/when-news-becomes-noise-death-of-indian.html
भारत
का राष्ट्रीय मीडिया
अब लोकतंत्र का
चौथा स्तंभ नहीं
रहा। यह एक ऐसा औज़ार
बन चुका है जिसे सख़्ती
से नियंत्रित किया
जा रहा है, प्रबंधित किया जा रहा है
और अब यह सत्ता के
साथ मिला हुआ
है। इसकी विश्वसनीयता
तेजी से गिर रही है
क्योंकि अब खबरों
का मक़सद सच्चाई
नहीं, बल्कि नियंत्रण
है।
कोई
भी बड़ा न्यूज़
चैनल चला लीजिए।
देश के प्रमुख
अख़बारों की सुर्ख़ियाँ
पढ़ लीजिए। आपको
पत्रकारिता नहीं, एक
दिखावा मिलेगा। जो
खबरें वाकई मायने
रखती हैं, जो सत्ता से
सवाल पूछती हैं
वे या तो दबी रह
जाती हैं या पूरी तरह
नज़रअंदाज़ की जाती
हैं। वोट अधिकार
यात्रा जैसी ऐतिहासिक,
जन-नेतृत्व वाली
रैली भी कवरेज
से बाहर है।
किसी असली लोकतंत्र
में यह पहले पन्ने की
खबर होती। लेकिन
आज के भारत में यह
मुश्किल से ही कहीं दिखती
है।
यह
अज्ञानता की नाकामी
नहीं है। यह एक सुनियोजित
विफलता है।
आज
भारत के मीडिया
का बड़ा हिस्सा
उन निजी कंपनियों
के हाथों में
है जिन्हें सत्ता
के करीब रहने
से लाभ मिलता
है। इन कॉर्पोरेट
हितधारकों के सत्तारूढ़
बीजेपी से गहरे वित्तीय और राजनीतिक
रिश्ते हैं। नतीजा:
न्यूज़ रूम अब गूंजने वाले
खोखले कमरों में
बदल चुके हैं।
संपादक दबाव में
हैं। पत्रकारों को
चुप कराया जा
रहा है। और असहमति को
देशद्रोह कहा जा
रहा है।
मक़सद
सीधा है: जो खबरें सरकार
को कटघरे में
खड़ा करती हैं
उन्हें दबा दो, और जो
नैरेटिव सरकार के
पक्ष में हों उन्हें ज़ोर
से फैलाओ। चुप्पी
के ज़रिए सहमति
पैदा करो।
यही
वजह है कि जब लोग
चुनावों में धांधली,
सरकारी एजेंसियों के
दुरुपयोग, या संविधान
के उल्लंघन जैसे
गंभीर आरोप लगाते
हैं मीडिया की
प्रतिक्रिया या तो
बेहद हल्की होती
है या पूरी तरह गायब।
यह चुप्पी तटस्थ
नहीं है यह रणनीतिक है।
उधर,
टीवी स्क्रीन पर
छाए रहते हैं
ध्यान भटकाने वाले
मुद्दे: भड़काऊ बहसें,
अंतरराष्ट्रीय तनाव, सांस्कृतिक
उग्रवाद ताकि देश
के भीतर लोकतंत्र
के पतन से लोगों का
ध्यान हटा रहे।
इस
माहौल में, न्यायपालिका
भी सवालों से
अछूती नहीं है।
हाल के कुछ फैसले राजनीतिक
हितों के बेहद करीब दिखते
हैं, जिससे यह
चिंता और बढ़ती
है कि क्या संस्थागत संतुलन अब
भी काम कर रहा है।
लेकिन यहाँ भी राष्ट्रीय मीडिया या
तो मुद्दे को
हल्का कर देता है या
पूरी तरह टाल देता है।
यह
पत्रकारिता नहीं है।
यह नैरेटिव कंट्रोल
है और बेहद ख़तरनाक है।
एक
स्वस्थ लोकतंत्र एक
स्वतंत्र मीडिया पर
निर्भर करता है जो जनता
को सच बताए,
सत्ता से सवाल पूछे, और
जिन्हें आवाज़ नहीं
मिलती उन्हें मंच
दे। लेकिन जब
मीडिया सत्ता का
प्रचार उपकरण बन
जाए, तो लोकतंत्र
अंदर से सड़ने
लगता है।
और
हम यह सब अपनी आँखों
के सामने होते
देख रहे हैं।
अब
ज़िम्मेदारी स्वतंत्र पत्रकारों, डिजिटल
प्लेटफ़ॉर्म्स और आम
नागरिकों पर आ
गई है जो सच को
दर्ज करें और हर संभव
माध्यम से उसे फैलाएं। अगर आपको
लोकतंत्र से फर्क
पड़ता है, तो सिर्फ़ ख़बरों
को पढ़ना या
देखना काफ़ी नहीं
है। अब आपको वही मीडिया
बनना होगा जो देश ने
खो दिया है।
इसे
साझा कीजिए। इस
पर बात कीजिए।
इस ख़तरनाक चुप्पी
के खिलाफ आवाज़
उठाइए।
और
अगर आप असहमत
हैं तो इसे ग़लत साबित
कीजिए। लेकिन अगर
ये सही है, तो खुद
से पूछिए: एक
ऐसा लोकतंत्र जिसमें सच्चाई बताने
वाली प्रेस ना हो,
वो कितना टिक पाएगा?
🤎
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