भारत की कूटनीतिक पहचान: सिद्धांत आधारित नेतृत्व से राजनीतिक प्रदर्शन तक
भारत की कूटनीतिक पहचान: सिद्धांत आधारित नेतृत्व से राजनीतिक प्रदर्शन तक
भारत
एक समय विश्व
मंच पर सीमित
आर्थिक क्षमता के
बावजूद अत्यधिक नैतिक
शक्ति के साथ खड़ा था।
उसका प्रभाव सैन्य
ताक़त या वित्तीय
दबदबे से नहीं,
बल्कि नेतृत्व की
स्पष्टता, चरित्र और
विश्वसनीयता से आता
था। जवाहरलाल नेहरू,
इंदिरा गांधी और
राजीव गांधी जैसे
दूरदर्शी नेताओं के
मार्गदर्शन में भारत
ने एक ऐसा उद्देश्यपूर्ण स्वर प्रस्तुत
किया जो उसकी सीमाओं से
बहुत आगे तक गूंजता था।
इन
नेताओं ने कूटनीति
की बारीकियों को
समझा। उनकी विदेश
यात्राएँ दिखावे के
लिए नहीं, बल्कि
सार्थकता पर आधारित
थीं। जब राजीव
गांधी ने विश्व
की राजधानियों का
दौरा किया, तो
उन्हें केवल एक राष्ट्राध्यक्ष के रूप
में नहीं, बल्कि
भारत के लोकतांत्रिक
वादे और प्रगतिशील
दृष्टिकोण के प्रतीक
के रूप में स्वीकार किया गया।
जनता ने उन्हें
प्रशंसा के साथ स्वागत किया
और वैश्विक नेताओं
ने उन्हें सम्मान
दिया। उनकी यात्राएँ
आत्म-प्रचार नहीं,
बल्कि रणनीतिक संवाद
थीं—सोची-समझी,
उद्देश्यपूर्ण और हमेशा
राष्ट्रीय हितों पर
आधारित।
सबसे
महत्वपूर्ण बात यह
थी कि पूर्व
भारतीय नेताओं ने
अपने पद की गरिमा और
राष्ट्र की संप्रभुता
को बनाए रखा।
उन्होंने विदेशी शक्तियों
को घरेलू विमर्श
को प्रभावित करने
या भारत की वैश्विक स्थिति को
कमजोर करने की अनुमति नहीं
दी। वार्ताएँ भारत
की शर्तों पर
होती थीं, अक्सर
भारतीय धरती पर।
विश्व नेता केवल
औपचारिकता से नहीं,
बल्कि भारत को एक समान
भागीदार के रूप में मान्यता
देने के लिए नई दिल्ली
आते थे। राष्ट्रीय
हित सर्वोपरि थे
और इसे हर कोई स्पष्ट
रूप से समझता
था।
इसके
पूर्ण विपरीत, वर्तमान
सरकार ने भारत की कूटनीतिक
शैली को नया रूप दिया
है। पिछले ग्यारह
वर्षों में प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने विदेश यात्राओं
को अपने नेतृत्व
की पहचान का
केंद्रीय हिस्सा बना
दिया है। यद्यपि
अंतरराष्ट्रीय संपर्क किसी
भी आधुनिक शासन
का एक अनिवार्य
पहलू है, लेकिन
इन दौरों की
आवृत्ति और उनका स्वर गंभीर
चिंताओं को जन्म देते हैं।
प्रधानमंत्री
का तरीका अक्सर
एक कूटनीतिक मिशन
की बजाय मीडिया
अभियान जैसा प्रतीत
होता है। व्यक्तिगत
इशारे, गले मिलना,
अचानक वॉकअबाउट, और
बारीकी से तय किए गए
फ़ोटो अवसर उनके
अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव की
पहचान बन गए हैं। किंतु
इन दिखावटी पहलुओं
के पीछे इन प्रयासों की रणनीतिक
गहराई और दीर्घकालिक
मूल्य को लेकर संदेह लगातार
बढ़ रहा है।
आलोचकों
का कहना है कि इस
सरकार के दौरान
हुए कई समझौते
और सौदे व्यापक
राष्ट्रीय लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के
बजाय सीमित व्यापारिक
हितों के एक छोटे समूह
को असंगत रूप
से लाभान्वित करते
हैं। भारत की विदेश नीति,
जो कभी गुटनिरपेक्षता
और रणनीतिक स्वायत्तता
पर आधारित थी,
अब लेन-देन आधारित और
प्रतिक्रियात्मक प्रतीत होने
लगी है।
बदलाव
केवल तरीक़े में
ही नहीं, बल्कि
धारणा में भी है। जब
प्रधानमंत्री मोदी शी
जिनपिंग, व्लादिमीर पुतिन या
अमेरिका के पूर्व
राष्ट्रपतियों जैसे वैश्विक
नेताओं के साथ खड़े होते
हैं, तो उनके स्वर, तैयारी
और कूटनीतिक परिपक्वता
में अंतर स्पष्ट
दिखाई देता है।
उच्च-स्तरीय अंतरराष्ट्रीय
मंचों पर केवल दिखावा नीति
की गहराई या
कूटनीतिक सूझ-बूझ
की कमी की भरपाई नहीं
कर सकता।
यह
गंभीरता की कमी परिणाम लेकर
आती है। यह केवल सरकारों
द्वारा ही नहीं,
बल्कि वैश्विक संस्थानों,
निवेशकों और नागरिक
समाज द्वारा भी
भारत की धारणा
को प्रभावित करती
है। जो कभी भारतीय नागरिकों
के लिए गर्व
और पड़ोसी देशों
के लिए प्रशंसा
का स्रोत था,
अब व्यक्तिवादी राजनीति
और दिखावटी कूटनीति
की दृष्टि से
अधिक देखा जाने
लगा है।
यह
वैश्विक रुख घरेलू
पैटर्न को भी दर्शाता है। प्रधानमंत्री
की व्यापक विदेश
यात्राएँ अक्सर संसद
से लंबे समय
तक अनुपस्थिति और
घरेलू विधायी जिम्मेदारियों
में सीमित भागीदारी
के साथ मेल खाती हैं।
ऐसे समय में जब भारत
जटिल आंतरिक चुनौतियों—आर्थिक असमानता,
सामाजिक अशांति और
पर्यावरणीय संकट—का
सामना कर रहा है, कई
नागरिक नेतृत्व की
प्राथमिकताओं पर सवाल
उठाने लगे हैं।
भारत
की विदेश नीति
उसकी घरेलू शक्ति
का विस्तार होनी
चाहिए, उससे ध्यान
भटकाने वाली नहीं।
एक मजबूत वैश्विक
छवि समावेशी शासन,
पारदर्शी संस्थानों और ऐसे नेतृत्व से अर्जित
होती है जो देश और
विदेश दोनों में
विश्वास को प्रेरित
करे।
नेतृत्व
का आकलन इस आधार पर
नहीं होना चाहिए
कि कितने देशों
का दौरा किया
गया या कितने
सम्मेलनों में भाग
लिया गया। इसका
आकलन उन परिणामों
से होना चाहिए
जो सुरक्षित किए
गए, उस ईमानदारी
से जो कायम रखी गई,
और उस भविष्य
से जो संरक्षित
किया गया। भारत
को ऐसे नेताओं
की आवश्यकता है
जो केवल राष्ट्र
के हितों का
नहीं, बल्कि उसके
मूल्यों का प्रतिनिधित्व
करें—ऐसे नेता
जो समझते हों
कि कूटनीति रंगमंच
नहीं, बल्कि राज्यकला
है।
जैसे-जैसे भारत
21वीं सदी में और आगे
बढ़ रहा है, उसे ऐसी
वैश्विक उपस्थिति की
आवश्यकता है जो
उसकी क्षमता को
प्रतिबिंबित करे, न
कि उसे कमजोर
करे। चुनौती अधिक
दिखाई देने की नहीं, बल्कि
अधिक प्रभावी ढंग
से सुने जाने
और गहरे सम्मान
पाने की है।
व्यंग्य कविता
जो झूठ की दुनिया रचता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो नालियों से गैस निकलवाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो सर उठाकर जनता से बात न कर पाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जनता के सवालों से जो छिप जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो अपने आप को सच्चा न साबित कर पाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो झूठ के सहारे नेता बन जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो मुसीबत में जनता के काम न आ पाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो जनता का हक भी खा जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो एक पल में ही फ़क़ीर बन जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
एक पल चाय बेचने लग जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो संसद में आकर चुप हो जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो दस लाख के सूट में सज जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो गुफ़ा में जाकर छुप जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
फिर लाखों कैमरों पर ख़ुद को दिखाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो रावण की तरह साधु बन जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो राम के नाम पे भी ठग जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो वोटों की हेरा-फेरी करवाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जिसे वोट चोर कहा जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
फिर ख़ुद ही कहीं जाकर छुप जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो अपनी माँ को अपमानित करवाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
फिर उसी को मुद्दा बनवाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो खुद को ईश्वर बतलाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो देश को सौदे पे लगाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो अनपढ़ बनकर दिखलाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
फिर पढ़ा-लिखा कहलवाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो अपनी डिग्री छुपाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
और जनता को यूँ भरमाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो पढ़े-लिखों को भी मूर्ख बनाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो देश का मान न रख पाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो दुनिया के आगे झुक जाता है,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो अपनों को ही ज़लील करवा डाले,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो राम के नाम को बेच डाले,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो चंद पैसों में ही बिक जाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
जो देश का गौरव न बन पाए,
वो कोई और नहीं… बस मोदी है।
यह कविता और भी लंबी हो सकती थी, क्योंकि सत्ता में बैठे मोदी की करतूतों की गिनती आसान नहीं है। झूठ और दिखावे पर खड़ा यह तंत्र अब सबके सामने बेनकाब हो चुका है। गरीबी का मुखौटा पहनकर ऐशो-आराम की सारी सुविधाएँ लूट लेना, अच्छा खाना, अच्छे कपड़े पहनना और जनता को अंधेरे में रखना यही इनकी असली पहचान है। अफ़सोस इस बात का है कि कुछ पढ़े-लिखे लोग भी इस सच्चाई को समझ नहीं पा रहे।
ReplyDeleteजो पढ़े-लिखे लोग हैं, वे असल में 'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' के विद्यार्थी बन गए हैं। और 'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' का जो झूठ है, वह कभी-कभी किसी को भी मूर्ख बना देता है ख़ासकर उन्हें, जो पहले से ही कमज़ोरों से नफ़रत करते हैं, कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर।
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