जब कॉमन सेंस मरता है, तब लोकतंत्र का पोस्टमार्टम होता है (और मूर्ख राज करते हैं)
जब कॉमन सेंस मरता है, तब लोकतंत्र का पोस्टमार्टम होता है (और मूर्ख राज करते हैं)
लोकतंत्र
एक दिन में नहीं टूटता।
ये धीरे-धीरे
मरता है हर उस फैसले
से जो जनता बिना दिमाग
लगाए लेती है।
असली खतरा बाहर
से नहीं आता,
वो अंदर से उठता है
जब लोग सोचने-समझने की
ताकत खो देते हैं और
नेताओं की नाटकबाज़ी
को देशभक्ति समझने
लगते हैं। और फिर शुरू
होता है सर्कस
झूठ, नफरत, और
झूठ को सुनहरा
लपेटा देकर बेचना।
2014 से पहले भारत कोई
स्वर्ग नहीं था,
लेकिन इतना ज़रूर
था कि उसमें
शांति की उम्मीद
बाकी थी। फिर सत्ता पर
कब्ज़ा हुआ, और आए वो
लोग जिनका एजेंडा
सीधा था लोगों
को धर्म, जाति,
रंग, नस्ल के नाम पर
बाँटो और राज करो। एक
आम आदमी को समझाने की
ज़रूरत नहीं पड़ी,
बस डर और नफरत का
इंजेक्शन लगाओ, और
बाकी काम भीड़
कर देती है।
अमेरिका
का हाल भी कोई अलग
नहीं। वहां एक ऐसा शख्स
सत्ता में आया जिसने अपने
कारोबार में गरीबों
और मज़दूरों को
लूटा, और फिर उन्हीं के
नाम पर नाटक करके सत्ता
हथिया ली। फिर चाल चली
हर अपराध को
एक खास रंग और धर्म
का बना दो। अपराध तो
हर जगह होते
हैं, लेकिन नेता
वही चालाक होता
है जो उन्हें
पहचान और जाति का रंग
चढ़ा देता है।
जब
जनता टीवी पर बोले गए
झूठ को सच मानने लगती
है, तो सरकारें
फेल नहीं होतीं
वो और ताकतवर
हो जाती हैं।
मीडिया तमाशा बन
जाती है, और
"विकास" के नाम
पर कुछ चुने
हुए लोगों को
चमकाया जाता है,
बाकियों को खामोश
कर दिया जाता
है। सरकारी पैसा,
सरकारी मशीनरी और
मीडिया all in one package सिर्फ उन्हीं
लोगों के लिए जो सत्ता
के करीबी हैं।
सबसे
ख़तरनाक चाल वही होती है
जो ऊपर से सच्ची लगे,
लेकिन अंदर से सड़ी हुई
हो। जब प्रधानमंत्री
की कुर्सी से
झूठ बोला जाता
है, तो जनता सोचती है
"क्या पता ये
सच हो?" बस
यहीं से जाल बिछ जाता
है। और कॉमन सेंस? वो
तो कब का नीलाम हो
चुका होता है।
पर
हाँ, पूरी जनता
अभी पागल नहीं
हुई है। भारत
में विपक्ष ने
आखिरकार समझ लिया
है कि झूठ को चुप
रहकर नहीं हराया
जा सकता। अब
वो भी मैदान
में हैं तथ्यों
के साथ, वीडियो
के साथ, और यहाँ तक
कि AI से बने वीडियो के
साथ जो असली लगते हैं।
मोदी की माँ वाला वीडियो
हो या ECI के
वोट चोरी की बात कम
से कम वो लोगों को
सोचने पर मजबूर
तो कर रहे हैं।
सबसे
बड़ा खतरा नेता
के लिए वो वोटर होता
है जिसे न खरीदा जा
सकता है, न बेवकूफ़ बनाया जा
सकता है। ये वही लोग
हैं जो सोच सकते हैं,
तर्क कर सकते हैं, और
सस्ते लालच में
नहीं बिकते। और
अगर ऐसे वोटर
ज़्यादा हुए, तो सत्ता की
नींव हिलती है।
अब
चलिए दुनिया के
"विकसित" देशों की
बात करते हैं
जो अब इंसानों
को मशीनों से
बदलने में जुटे
हैं। पर मकसद प्रगति नहीं
है, मकसद है इंसानों को बेकार
साबित करके उन्हें
सिर्फ भावना से
कंट्रोल करना। और
मज़े की बात? ये सब
इंसान खुद कर रहे हैं।
बड़ी कंपनियाँ सरकारों
को हाइजैक कर
चुकी हैं, और अगर आप
इसका विरोध करें,
तो आपको "एंटी-प्रोग्रेस" कह दिया
जाता है। अगर आप चुप
रहें, तो सीधा एक डिजिटल
तानाशाही में कदम
रख रहे हैं।
इसलिए
हाँ, निष्पक्ष सरकारें
ज़रूरी हैं। लेकिन
निष्पक्ष सरकारें तभी बनती
हैं जब जनता बेवकूफ़ नहीं होती।
जब जनता खुद
सोचती है, सवाल
करती है, और हर चमकती
चीज़ को सोना नहीं मानती।
अगर आप बस दूसरों को
दोष देते रहेंगे
और खुद से कोई सवाल
नहीं करेंगे, तो
तैयार रहिए तबाही
आपकी ही बनाई होगी।
तो फिर लगे रहिए नफरत में, झूठ में, और उस झूठ को सच मानते रहिए जो आपको कंफर्टेबल लगता है। लेकिन जब लोकतंत्र मर जाए और तानाशाही आपके दरवाज़े पर दस्तक दे, तो आश्चर्य मत कीजिए। क्योंकि आपने ही कॉमन सेंस को मार दिया था झंडा लहराते हुए।
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