भारत का नया शासन मॉडल: रिश्वत, बॉन्ड और भगवान
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का नया शासन मॉडल: रिश्वत, बॉन्ड और भगवान
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इतिहास की सबसे
"सटीक टाइमिंग" मानी जाएगी कि केंद्र की भाजपा सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये
की राशि बिहार की 1 करोड़ महिलाओं में बाँटने का फैसला किया और वो भी चुनाव से ठीक
पहले। न महाराष्ट्र, न कर्नाटक, न यूपी सिर्फ बिहार। क्योंकि शायद बाकी राज्यों की
महिलाओं को इतनी जरूरत नहीं थी या फिर शायद उनके राज्य में अभी चुनाव नहीं हैं।
अगर ये एक राष्ट्रीय
महिला सशक्तिकरण योजना होती, जो पूरे देश में लागू होती, तो इसे नीति कहा जा सकता था।
लेकिन ये नीति नहीं, ये है "प्री-पोल पार्सल", भगवा रिबन में लिपटा हुआ।
एक लोकतंत्र में इसे क्या कहते हैं? चुनावी रिश्वत। लेकिन मोदी के भारत में इसे कहते
हैं "विकास की योजना।"
खैर, कोई तो था जिसने
इस पाखंड को पहचान लिया। एक पूर्व IPS अधिकारी ने चुनाव आयोग को शिकायत भेजी, जिसमें
बिहार का चुनाव 6 महीने टालने और राष्ट्रपति शासन लागू करने की माँग की गई। साहसिक
कदम है, लेकिन सवाल ये उठता है केवल टालने से क्या होगा? अगर ये पैसा वोटों को प्रभावित
करने के लिए दिया गया है, तो गिरफ्तारी होनी चाहिए, जवाबदेही तय होनी चाहिए।
ये पैसा आया कहाँ से?
केंद्र से? राज्य से? या फिर उस PM CARES फंड से जो इतना “पवित्र” है कि कोई
उसे छू भी नहीं सकता?
और हमारे न्यायपालिका
का क्या हाल है? जब एक जज के घर आग लगने के बाद करोड़ों रुपये कैश में मिले, तब कोई
हंगामा नहीं मचा। कोई CBI रेड नहीं, कोई मीडिया डिबेट नहीं। बस चुप्पी। क्योंकि सच्चाई
अब मर चुकी है उसे RTI की राख में मिलाकर बहा दिया गया।
और ये सब उस देश में
हो रहा है जहाँ 25–35% जनता मानती है कि पंडित पत्थर में जान डाल सकते हैं, और BJP
को भगवान का एजेंट समझती है। यहाँ आप खजाना लूट लो, लेकिन अगर आप "जय श्री राम"
चिल्ला रहे हैं, तो आप राष्ट्रभक्त कहलाओगे।
मीडिया? अब चौथा स्तंभ
नहीं रहा। अब ये एक प्रोपेगैंडा स्पीकर बन चुका है, जो सरकार के हर अपराध को
"विकास" की पैकेजिंग में जनता के सामने परोसता है। सवाल पूछना पाप है, चाटुकारिता
करना धर्म।
लेकिन अब मज़ा आ रहा है।
क्योंकि अब “वोट चोर” सिर्फ एक नारा नहीं रहा ये
जनता का ब्रांडिंग हथियार बन गया है। और ये ब्रांडिंग अब फैल रही है:
- वोट चोर – चोरी हुए जनादेशों के लिए।
- जॉब्स चोर – बेरोज़गारी छिपाने के लिए।
- एजुकेशन चोर – पेपर लीक, NEET घोटाले और ढाँचा ढहाने के लिए।
- PM CARES चोर – बिना ऑडिट वाला खजाना।
- लैंड चोर – कॉर्पोरेट दोस्तों को ज़मीनें बाँटने के लिए।
- डेटा चोर – निजता का उल्लंघन और सर्विलांस स्टेट बनाने के लिए।
- मीडिया चोर – पत्रकारिता को PR एजेंसी में बदलने के लिए।
- अडानी चोर / क्रोनी चोर – “दोस्तों” को देश सौंपने के लिए।
अब ये सिर्फ शब्द नहीं हैं ये सच की धार
हैं। और ये कट रही है।
जनता अब सिर्फ चुपचाप
गुस्सा नहीं है वो खुलकर गुस्सा ज़ाहिर कर रही है। बिहार में BJP की रैलियों में “वोट
चोर” के नारे गूंजे हैं, नेताओं को कार्यक्रम छोटा करना पड़ा, कुछ जगह तो कुर्सियाँ
चली हैं, भाषण नहीं। अब ये गुस्सा नहीं, ये सामूहिक जागृति है।
और जब सरकार को हार
दिखती है, तो वो क्या करती है? आसान है चुनाव से पहले 1,000 एकड़ ज़मीन अपने किसी दोस्त
को सौंप देती है, वो भी 2 पैसे सालाना किराए पर। इसे सरकार नहीं कहते, इसे कहते हैं
चुनाव हारने से पहले की "लीगल डकैती"।
लेकिन अब लोग देख रहे हैं। सुन रहे हैं। और अब
वे नाम दे रहे हैं:
वोट चोर। ज़मीन चोर। नौकरी चोर। शिक्षा चोर।
एक बार जब चोरी को नाम मिल जाए उसे छुपाया नहीं
जा सकता।
बिहार में BJP नेताओं
की रैलियाँ डर के कारण रद्द हो रही हैं। क्योंकि अब जनता में वो खामोशी नहीं रही। अब
उन्हें नेपाल और बांग्लादेश के हालात याद आ रहे हैं जहाँ जनता ने नारों को विद्रोह
में बदल दिया।
तो आज हम इस मोड़ पर हैं जहाँ एक सरकार:
- जनता के पैसे से वोट खरीद रही है,
- संस्थाओं को अपने पक्ष में झुका रही है,
- न्याय को खत्म कर चुकी है,
- और अभी भी “देशभक्त” होने का दावा कर रही है।
लेकिन अब जनता जवाब दे रही है। नारे बदल चुके हैं।
बोलने की हिम्मत लौट आई है। और अब सरकार के पास भगवान के पीछे छिपने की जगह भी नहीं
बची।
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