गाली कांड: हार का डर इतना कि माँ की मिट्टी भी बेच डाली
गाली कांड: हार का डर इतना कि माँ की मिट्टी भी बेच डाली
किसी
भी माँ के लिए असली गाली तब होती है जब जनता उसके बेटे को चोर कहती है, और वह अपनी
बेगुनाही साबित करने के लिए कुछ नहीं करता जबकि सरकार की हर शाखा उसके नियंत्रण में
है और उसकी निर्दोषता साबित करने में सक्षम है अगर वह सचमुच चोर नहीं है।
लगता
है मोदी और उनकी मीडिया
टीम ने वही हासिल किया
जो वे चाहते
थे देश की बातचीत को
वोट अधिकार यात्रा
से भटकाकर गाली
कांड के तमाशे
पर मोड़ देना।
यहाँ तक कि सोशल मीडिया,
जो अक्सर राजनीतिक
चालबाज़ियों को तुरंत
पकड़ लेता है,
इस बार पूरे
जाल में फँस गया। इस
भटकाव का एक गहरा उद्देश्य
था। जनता की नज़रें छोटे-मोटे नाटकों
पर टिक जाएँ,
ताकि चुनाव आयोग
और न्यायपालिका को
साँस लेने की जगह मिल
सके और शायद चुनावी परिणामों
में और हेरफेर
करने के नए तरीके निकाले
जा सकें। पर
खेल हमेशा योजना
के मुताबिक़ नहीं
चलता। इस बार विपक्ष ने
बचाव की मुद्रा
में रहने के बजाय आक्रामक
रुख़ अपनाना शुरू
कर दिया। विडंबना
यह है कि जिस भटकाव
को बीजेपी ने
विपक्ष को कमजोर
करने के लिए रचा था,
वही उनके अपने
नैरेटिव पर भारी पड़ने लगा।
सबसे
चौंकाने वाली बात
थी बीजेपी नेता
रविशंकर प्रसाद का
अजीबोगरीब प्रयास गाली
की “मात्रा” नापने
और उसकी तुलना
करने की। सवाल
उठता है कि आखिर ये
नाटक किसके लिए
था? यह सोचते
हुए मुझे अपनी
एक कविता याद
आई, जिसमें मैंने
कल्पना की थी कि अगर
मोदी की माँ ज़िंदा होतीं,
तो बार-बार अपने बेटे
द्वारा अपनी छवि
का राजनीतिक शोषण
देखकर कैसा महसूस
करतीं। जीवन में
उन्हें बलिदान और
नैतिकता का प्रतीक
बनाकर प्रचार में
घसीटा गया। मृत्यु
के बाद भी उन्हें राजनीति
में घसीटा गया,
इस बार ढाल बनाकर। ज़्यादातर
नेता, चाहे कितने
भी दोषी हों,
इतनी गिरावट तक
नहीं पहुँचते। पर
मोदी कभी “ज़्यादातर
नेताओं” जैसे नहीं
रहे। वे गुजरात
की राजनीतिक प्रयोगशालाओं
का उत्पाद हैं,
सालों की सुनियोजित
ट्रेनिंग का नतीजा,
जहाँ उन्हें मंच
पर बिना पछतावे
झूठ बोलना सिखाया
गया। उनकी सबसे
बड़ी कला है झूठ को
सच की तरह कहना और
यह हुनर किसी
हादसे से नहीं,
बल्कि सालों की
साधना से पैदा हुआ।
ख़ुद
मोदी मानते हैं
कि उन्होंने साधुओं
के बीच समय बिताया है
वो लोग जिनका
पेशा ही है दुनिया को
भ्रम बेचकर बेवकूफ
बनाना। नतीजा सामने
है। वरना भला
कोई कैसे दावा
कर सकता है कि पत्थर
में जान डाल सकते हैं
और करोड़ों लोग
उस पर विश्वास
भी कर लें?
वरना
कैसे समझाएँगे वो
दावा, जिसमें कहा
गया कि राहुल
गांधी को मोदी की माँ
के ख़िलाफ़ कथित
गाली के लिए माफ़ी माँगनी
चाहिए? गहराई से
देखने पर साफ़ हुआ कि
वह टिप्पणी मोदी
की माँ के लिए थी
ही नहीं, बल्कि
ख़ुद मोदी के लिए थी
और वो भी एक planted आदमी के मुँह से,
जिसका कांग्रेस या
राजद से कोई लेना-देना
ही नहीं था।
फिर भी मोदी ने इस
पर झपट्टा मारा,
गोदी मीडिया ने
इसे बढ़ा-चढ़ा
कर चलाया, और
प्रोपेगेंडा का चक्र
शुरू हो गया। यही है
मोदी का घिसा-पिटा प्लेबुक:
अराजकता पैदा करो,
ख़ुद को शिकार
दिखाओ, और सुर्ख़ियाँ
बदल दो। लेकिन
इस बार नकाब
फिसल गया। गाली
कांड की पूरी कहानी पर
बीजेपी की उँगलियों
के निशान साफ़
दिखाई दे गए।
भारत
के लिए कहानियों
का सत्ता के
औज़ार बनना कोई
नई बात नहीं
है। सदियों से
कथावाचकों का इस्तेमाल
जनता की सोच को मोड़ने,
बहकाने और गुमराह
करने के लिए होता आया
है। आज वही भूमिका गोदी
मीडिया निभा रही
है आधुनिक कथावाचक
बनकर जनता की नसों में
ज़हर घोल रहे हैं। मंच
पर किया गया
नाटक और मीडिया
में गढ़ा गया
नैरेटिव मिलकर समाज
को बाँटते हैं
और अंततः हिंसा
को हवा देते
हैं। बिहार में
हम यही देख रहे हैं
प्रचार और उकसावे
का खतरनाक संगम।
मक़सद शासन नहीं,
बस नियंत्रण है
किसी भी कीमत पर सत्ता
बनाए रखना, चाहे
देश को बर्बादी
की ओर ही क्यों न
धकेलना पड़े।
जब
तक भारत की जनता इस
ज़हर को पहचानकर
इसे आगे बढ़ाना
बंद नहीं करेगी,
यह चक्र चलता
रहेगा। कभी यहाँ
एक भटकाव, कभी
वहाँ एक उकसावा,
और लोकतंत्र, जवाबदेही
और न्याय जैसे
असली मुद्दे और
दूर खिसकते रहेंगे।
गाली कांड किसी
लापरवाह गाली की कहानी नहीं
है। यह उस व्यवस्था की कहानी
है जो भटकाव
पर पलती है और जो
सत्ता बचाने के
लिए देश की आत्मा तक
बेचने को तैयार
है।
माँ की पुकार
मैं किसको बताऊँ
ये दर्द अपना,
जो अपने ने ही मुझको
दे डाला।
जिसको है दिया जनम मैंने,
जनता को ही उसने बेच डाला।
शर्मिंदा हूँ मैं
उसकी हरकतों से,
ना जाने क्यों
वो करता है।
मैं भूल चुकी
थी उसको अब तक,
अब आकर मुझसे
मिलता है।
शर्मिंदा होती हूँ
जब आता वो,
हज़ारों की भीड़ लगाता है।
लगता है दिखाता
वो दुनिया को,
उसका भी मुझसे
कोई नाता है।
ग़रीबों का धन
लूट के वो,
अमीरों में जो बाँट जाता
है।
ये दानव ऐसा
क्यों करता,
ये मुझको समझ
नहीं आता है।
मुझको कहता है
माँ ये अब,
बरसों से जिसे छोड़ा था
इसने।
कभी हाल न पूछा था
मेरा,
कभी बात भी नहीं करी
थी इसने।
अब कैसा ढोंग
रचाया है,
अब दुनिया को
दिखाता है सब।
कदमों में बैठ के मेरे
ये,
हर तरह के ढोंग रचाता
है अब।
शर्मिंदा हूँ मैं
इसके कामों से,
तोड़े ये सपने ग़रीबों के।
मैं कैसे कहूँ
बेटा इसको,
जब रोते हैं
वो सब मिलके।
सत्ता के लिए
ये कुछ भी यहाँ,
कर सकता है सब अपनों
से।
मुझको ही गाली दिलवा कर
अब,
रोता है वहाँ ये ख़ुद
के लिए।
असली गाली तो
दी थी इसने,
जब मुझको माँ
न समझा था।
कहता था कि ये आया
है ऊपर से,
इसका मुझसे न कोई नाता
था।
गलियों में छुप
कर मैं भी यहाँ,
इससे मिलने को
कतराती थी।
सब बच्चों में
ये कपट निकला,
फिर दुनिया इसके
गुण क्यों गाती
थी।
फिर बच्चों ने
समझाया मुझे,
जो लोग यहाँ
इसपे मरते हैं।
ज़ालिम हैं वो सब मिलके
यहाँ,
उनसे हम सब यहाँ डरते
हैं।
ये झूठों का
सरदार बना,
जंनत़ा पे ज़ुल्म
ये करता है।
धोखे में आ गई सब
दुनिया,
उनको अब मिलकर
ये ठगता है।
माँ की आँखों
में अब आँसू हैं,
पर रोए तो अब वो
किसके लिए।
जब ही पत्नी
को छोड़ा था
इसने,
तब से ये डाकू बन
निकले।
यहाँ लोग मुझे सब कहते
हैं,
इस देश को बेचा है इसने।
इसमें क्या गुनाह है मेरा ख़ुदा,
मुझे कहीं का नहीं छोड़ा है इसने।
जब भी आता है ये मिलने
को,
मुझे डर लगता है मिलने से।
बूढ़ी अब मैं हो गई हूँ,
दर्दें हो जाती हैं हिलने से।
इसकी नौटंकी में मुझको
भी,
ये ढोंगी बहुत नचाते हैं।
ये नाम तो लेता है मेरा,
पर इसी के गीत वो गाते हैं।
भारत के रंग निराले
हैं,
यहाँ चोरों की भी पूजा होती।
बस भगवाँ पहन के आ जाओ तुम,
या पहन लो बस भगवाँ धोती।
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