ब्रेकिंग न्यूज़: मोदी फिर एक और चुनाव चुराने की कोशिश में इस बार उपराष्ट्रपति का चुनाव
ब्रेकिंग न्यूज़: मोदी फिर एक और चुनाव चुराने की कोशिश में इस बार उपराष्ट्रपति का चुनाव
बॉलीवुड
पर अक्सर यह
आरोप लगता है कि वहाँ
की कहानियाँ सतही
और घिसी-पिटी
होती हैं लड़का-लड़की मिले,
बारिश में गाना
गाया, और पचास बैकग्राउंड डांसर। लेकिन
कभी-कभी सिनेमा
ऐसी पटकथा भी
दिखा देता है जो असल
ज़िंदगी से डरावनी
हद तक मेल खाती है।
1999 की फिल्म सरफ़रोश
को ही लीजिए।
सतह पर यह कहानी पाकिस्तान
से नक्सलियों तक
हथियार पहुँचने की
थी। लेकिन इसमें
गवाहों को धमकाने,
जाँच एजेंसियों को
दबाने और डर पर टिके
सिस्टम की भी झलक थी।
सबसे अहम बात:
यह दिखाया गया
था कि असली दुश्मन तब
सफल होता है जब देश
के भीतर ही कुछ लोग
उसके साथ मिलकर
अपने ही लोगों
से गद्दारी करें।
दुर्भाग्य
से, यह अब कल्पना नहीं
रही। मोदी सरकार
ने इसी मॉडल
को पूरी तरह
अपना लिया है।
गवाहों को धमकाने
की जगह अब नेताओं, संस्थाओं और
यहाँ तक कि मतदाताओं को डराया
जाता है। दुश्मनों
से लड़ने की
जगह सरकार ने
खुद को एक ऐसा कार्टेल
बना लिया है जो जनता
को छोड़कर सिर्फ
गुजरात लॉबी की सेवा करता
है। सरफ़रोश में
जो गद्दार सिस्टम
के भीतर बैठे
दिखाए गए थे, आज वे
खुलेआम सत्ता चला
रहे हैं।
पिछले
ग्यारह सालों से
बीजेपी ने इसे रोज़मर्रा का शासन बना दिया
है। धमकी, डर
और प्रवर्तन निदेशालय
(ED) का डर दिखाकर
यह सुनिश्चित किया
जाता है कि हर नेता,
चाहे बीजेपी का
हो या विपक्ष
का, गुजरात लॉबी
की लाइन पर ही चले।
नतीजा? विकास परियोजनाएँ
जादू की तरह गुजरात पहुँच
जाती हैं, जनता
से किए वादे
गायब हो जाते हैं, और
जो भी आवाज़
उठाए उसके सिर
पर ED की तलवार
लटक जाती है।
मानो क़ानून लागू
करने वाली एजेंसी
पार्टी का प्राइवेट
बॉडीगार्ड बन गई
हो।
उपराष्ट्रपति
का चुनाव तो
औपचारिकता होना चाहिए
था। बीजेपी के
पास बहुमत था,
वोट थे, मशीनरी
थी यानी जीत
तय थी। लेकिन
इस बार कुछ नेताओं ने
अचानक हिम्मत दिखाई।
उन्होंने गुजरात लॉबी
के खिलाफ वोट
देने की हिम्मत
की, यह जानते
हुए कि मतदाता
अब “मोदी मैजिक”
पर विश्वास नहीं
कर रहे। मगर
बगावत की कीमत है बिना
गुजरात की फंडिंग
के ये नेता राजनीतिक तौर पर कंगाल हैं।
इस
बीच राहुल गांधी
ने "अकल्पनीय" कर डाला
यह कहने की जुर्रत की
कि चुनाव जनता
के वोट से तय होना
चाहिए, न कि हेराफेरी से। बड़ा
क्रांतिकारी विचार है,
है न? उनका कहना साफ
है: अगर जनता
बीजेपी के उम्मीदवारों
को वोट नहीं
देती तो चाहे गुजरात का
कितना भी पैसा बहा लो,
जीत संभव नहीं।
नीतीश कुमार, जिन्होंने
बिहार में राहुल
और तेजस्वी का
जनसमर्थन देखा है,
समझ गए हैं कि अब
“मोदी कार्ड” बिहार
में नहीं चलने
वाला।
लेकिन
कहानी यहीं खत्म
नहीं होती। ताज़ा
खबरों के मुताबिक
बीजेडी और टीएसआर
उपराष्ट्रपति चुनाव से
दूरी बना रहे हैं क्यों?
क्योंकि गृह मंत्री
ने उन्हें “याद
दिलाया” कि उनके खिलाफ ED की फाइलें
फिर से खोली जा सकती
हैं। डर से
abstain, मजबूरी से abstain लोकतंत्र की
जय हो।
असल
समस्या दो हैं। पहली, भ्रष्टाचार
हर जगह फैला
है हर दल में, हर
राज्य में। दूसरी,
बीजेपी ने इस भ्रष्टाचार को हथियार
बना लिया है।
केस कभी निपटते
नहीं, बस फाइलों
में दबे रहते
हैं, जब तक कि उनका
इस्तेमाल विपक्ष को
ब्लैकमेल करने में
न हो। यह शासन नहीं
है, यह सरकारी
लेटरहेड पर ब्लैकमेल
है।
और
इसमें हैरानी क्या?
जब बुनियाद ही
RSS की “ठग विद्या”
पर रखी गई है, तो
यही होना था।
डर का माहौल
बनाओ, धर्म की आड़ लो,
जो विरोध करे
उसे देशद्रोही और
धर्मद्रोही कहो और
खेल खत्म। मोदी
ने साधुओं की
संगति में यही ट्रेनिंग ली और ग्यारह साल
से इसे बखूबी
निभा रहे हैं।
यह शासन नहीं,
बल्कि एक सुनियोजित
डर का नाटक है।
तो
हाँ, बॉलीवुड को
सतही लव स्टोरीज़
पसंद हैं। मगर
असली ब्लॉकबस्टर तो
पिछले एक दशक से चल
रहा है भारत का लोकतंत्र
बंधक बना हुआ है, गुजरात
लॉबी निर्माता है
और मोदी मुख्य
अभिनेता। सरफ़रोश की तरह असली कहानी
सीमा पार के दुश्मन की
नहीं, बल्कि भीतर
बैठे गद्दारों की
है। फर्क बस इतना है
कि अब ये गद्दार संसद
की कुर्सियों पर
बैठे हैं।
दुख
की बात यह है कि
यह कोई फिल्म
नहीं। यह हमारी
शाम की हकीकत
है।
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