जब आस्था बन जाए उन्माद: कट्टरता को सामान्य मानना धर्म और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरा है

 

जब आस्था बन जाए उन्माद: कट्टरता को सामान्य मानना धर्म और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरा है

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2025/10/when-faith-becomes-fury-why-normalizing.html

जब एक वकील ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई पर जूता फेंका, तो यह सिर्फ एक क्षणिक उन्माद नहीं था यह हमारे समाज में उग्रता और कट्टरता को सामान्य मानने की खतरनाक प्रवृत्ति का एक साफ़ संकेत था। और आश्चर्य की बात यह है कि इस घटना के बाद किसी भी संस्था, मीडिया चैनल या राजनीतिक नेता ने यह सवाल नहीं उठाया: क्या यह व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ है?

मैं वह बात कहूंगा जो बाकी लोग कहने से कतराते हैं: यह असहमति नहीं है, यह मानसिक विकृति है। और हम, एक समाज के रूप में, इसे "धार्मिक भावना" या "संस्कृति की रक्षा" की आड़ में छिपाकर, इस खतरे को बढ़ावा दे रहे हैं।

हमें बताया गया कि यह वकील सनातन धर्म की रक्षा कर रहा था। कि यह कोई पवित्र प्रतिरोध था।
सीधे कहें: यह झूठ है। किसी न्यायाधीश पर जूता फेंकना सनातन धर्म नहीं है। संविधान की रक्षा करने वाले व्यक्ति पर हमला करना तो धार्मिक है, ही वीरता का प्रतीक। यह आस्था नहीं, यह अहंकार, उन्माद और मानसिक अस्थिरता का घातक मिश्रण है।

फिर भी इस व्यक्ति को उपचार की बजाय सम्मान मिल रहा है। मीडिया उसे नायक बना रही है। राजनेता चुप हैं। यूट्यूबर्स उसे "संस्कृति रक्षक" कहकर महिमामंडित कर रहे हैं।

दिक्कत सिर्फ एक आदमी की नहीं है। ये एक पैटर्न है और यह लगातार दोहराया जा रहा है। और सबसे डरावनी बात यह है कि ये व्यवहार उसी विचारधारा से आता है जो संस्थागत ताक़त और जातीय विशेषाधिकारों से पोषित है।

हरियाणा में एक दलित आईपीएस अधिकारी ने आत्महत्या कर ली। वो लगातार अन्याय की ओर इशारा कर रहा था। उसने सुसाइड नोट में नाम, घटनाएँ और आरोप तक लिखे। फिर भी कोई राष्ट्रीय शोक नहीं, कोई न्याय की मांग नहीं।

बरेली में एक दलित व्यक्ति को पीट-पीटकर मार डाला गया हमलावर खुद को "योगी सेना" बता रहे थे।
कहाँ है वो गुस्सा, जो कभी छोटे-छोटे मुद्दों पर सड़कों पर उतर आता है?

अगर यही सब किसी मुस्लिम, दलित या आदिवासी ने किया होता, तो पूरा देश "राष्ट्रद्रोह" और "कानून-व्यवस्था" की दुहाई दे रहा होता। लेकिन जब उच्च वर्ग के, हिंदुत्व के नाम पर हिंसा करने वाले लोग ऐसा करते हैं, तब पूरा सिस्टम या तो चुप रहता है या बहाने बनाने लगता है।

अब सोचिए, हम किस दिशा में जा रहे हैं? क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहाँ धार्मिक कल्पनाओं के नाम पर कोई भी हिंसक हो सकता है, और हम उसे "संस्कृति" मानकर चुप रहें?

अब और बहाने नहीं चलेंगे। अब और "श्रद्धा" की आड़ में पागलपन को महिमामंडित नहीं किया जा सकता।
ये एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट है, और जिन्हें कल्पना और कानून, कथा और संविधान में फर्क नहीं समझ आता उन्हें किसी भी सार्वजनिक मंच या पद पर रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

अगर अमेरिका में कोई व्यक्ति "सुपरमैन मेरा भगवान है" कहकर जज पर हमला करता, तो उसे सीधा मानसिक अस्पताल भेजा जाता। लेकिन भारत में जब कोई व्यक्ति काल्पनिक धार्मिक कथा के नाम पर हिंसा करता है, तो हम उसे "धार्मिक व्यक्ति" कहकर बचा लेते हैं? नहीं। ये आस्था नहीं है। ये मानसिक बीमारी है। ये लोग इलाज के हक़दार हैं, सम्मान के नहीं। इन्हें महिमामंडित नहीं, निर्वासित और मूल्यांकन किया जाना चाहिए। क्योंकि जब हम इस व्यवहार को नज़रअंदाज़ करते हैं, हम अपनी सभ्यता को खोखला कर रहे होते हैं।

सोचिए कौन हैं वो लोग जो इस पागलपन को आगे बढ़ा रहे हैं? कौन हैं वो जिन्हें ये उन्माद सूट करता है?
और कब तक हम इन धार्मिक" मुखौटों के पीछे के अपराधों को अनदेखा करते रहेंगे? आस्था में कोई बुराई नहीं है। लेकिन मानसिक अस्थिरता को आस्था कह देना, समाज के लिए जहर है। अगर हमें एक सभ्य, लोकतांत्रिक और सुरक्षित भारत चाहिए तो हमें अब स्पष्ट रूप से कहना होगा: यह आस्था नहीं है, यह संकट है।

क्योंकि आज अगर सिर्फ जूता फेंका गया है, तो कल शायद हम ये कह पाएं कि "हम बच गए।


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