नेतृत्व के लायक नहीं, सत्ता के भूखे: कैसे अज्ञानी नेता बना रहे हैं आज्ञाकारी नागरिकों का राष्ट्र

 

नेतृत्व के लायक नहीं, सत्ता के भूखे: कैसे अज्ञानी नेता बना रहे हैं आज्ञाकारी नागरिकों का राष्ट्र

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2025/10/unfit-to-lead-desperate-to-rule-how.html

आज मैंने अजय प्रकाश का एक यूट्यूब वीडियो देखा, जिसने एक खतरनाक सच्चाई को बेनकाब किया: भारत का पुनर्निर्माण उन नेताओं के हाथों हो रहा है जो सिर्फ शासन करने के अयोग्य हैं, बल्कि बुद्धिमत्ता, इतिहास और प्रगति के दुश्मन भी हैं। ये दूरदर्शी नहीं हैं। ये डर और झूठ का शोर मचाने वाले प्रचारक हैं, जो समाज को अपने जैसी अंधभक्ति और अज्ञानता में ढालना चाहते हैं।

ये सत्ता सिर्फ इतिहास नहीं बदल रही ये नया इतिहास गढ़ रही है। ये पौराणिक कथाओं को इतिहास की किताबों में ठूंसना चाहते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जानने की बजाय सिर्फ मानें। चमत्कारों में विश्वास हो, विज्ञान में नहीं। सवाल उठाने की जगह सिर झुकाना हो। क्योंकि जनता जितनी अज्ञानी होगी, उसे चलाना उतना ही आसान होगा।

नरेंद्र मोदी को ही लीजिए। यह वही व्यक्ति है जोगटर से गैस बनाकर खाना पकानेजैसे जालसाज़ी भरे ड्रामे पर विश्वास कर बैठा था। क्योंकि उसने कभी भी यह सीखने की जहमत नहीं उठाई कि सामने जो दिख रहा है, उस पर सवाल कैसे उठाया जाता है। जब कोई इतना सरल-विश्वासी देश का प्रधानमंत्री हो और करोड़ों लोग उसकी पूजा करें, तो यह सिर्फ एक मज़ाक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकट है। यह केवल घटिया निर्णय नहीं है, यह उस नेतृत्व वर्ग की निशानी है जो ज्ञान से डरता है और भ्रम की पूजा करता है।

यह अज्ञानता कोई संयोग नहीं है यह एक रणनीति है। ये सिर्फ शिक्षा को नज़रअंदाज़ नहीं कर रहे ये उस पर हमला कर रहे हैं। ये सिर्फ तथ्यों से दूर नहीं हैं ये उन्हें झूठ से बदल रहे हैं। क्योंकि एक अज्ञानी समाज बगावत नहीं करता। वह सिर झुकाकर चलता है।

और फिर आता है अमित शाह का नाम।

24 सितंबर, 2025 को लद्दाख में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने आम नागरिकों पर गोलियां चलाईं। चार लोगों की मौत हुई, दर्जनों घायल हुए। और गिरफ्तार कौन हुआ? कोई उग्र नेता नहीं, बल्कि सोनम वांगचुक, जो हमेशा से शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए जाने जाते हैं। वहीं भारत का गृह मंत्री, जो असली जिम्मेदार है आज़ाद घूम रहा है।

अब ज़रा सोचिए, अमित शाह और जनरल डायर में क्या फर्क है? सिर्फ वर्दी। सोच तो एक ही है अगर जनता बोले, तो उसे चुप कराओ। अगर वो इकट्ठा हो, तो उस पर गोली चलाओ।

तो फिर देश सड़कों पर क्यों नहीं है? शाह की गिरफ्तारी की मांग क्यों नहीं हो रही? एक ऐसा आदमी जो निर्दोष नागरिकों पर राज्य द्वारा हिंसा को मंज़ूरी देता है उसे कानूनी सजा क्यों नहीं मिल रही? अगर संविधान शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, तो लद्दाख में जो हुआ, वो कानून-व्यवस्था नहीं था वो हत्या थी।

लोकतंत्र तानाशाही में तब्दील तब होता है जब लोग तालियाँ बजाने लगते हैं। जब वे चुप रहने लगते हैं। जब नागरिक यह तय कर लेते हैं कि झूठ सच से आसान है, सुरक्षा न्याय से ज़्यादा ज़रूरी है, और आस्था ज्ञान से बेहतर है।

भारत यहाँ संयोग से नहीं पहुँचा है। भारत ने एक ऐसा आदमी चुना जो शासन करने की बौद्धिक क्षमता नहीं रखता, और फिर उसे ऐसे सहयोगी मिले जो सत्ता को ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि ढाल मानते हैं। और दुखद यह है कि करोड़ों लोगों को इसमें कोई दिक्कत नहीं दिखती। वे अज्ञान को ताक़त और क्रूरता को नेतृत्व मान बैठे हैं।

जब तक जनता उठेगी नहीं, जब तक वह अमित शाह जैसे नेताओं की जवाबदेही नहीं मांगेगी, और मोदी जैसे लोगों को ऊपर उठाना बंद नहीं करेगी यह देश एक ऐसे अंधेरे में उतरता रहेगा जहाँ सवाल करना गुनाह होगा, शिक्षा खतरा बन जाएगी, और आज्ञाकारिता ज़िंदा रहने की शर्त होगी।

हमें यह भ्रम तोड़ना होगा कि जो सबसे ज़्यादा चिल्लाता है वही नेता होता है। या जो सबसे पुराना है वही सच होता है। एक सच्चा लोकतंत्र अपने नागरिकों पर गोली नहीं चलाता उन्हें बचाता है। और जो नेता शांतिपूर्ण जनता पर हिंसा का आदेश देता है, उसका लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है।

ना अब।` ना कभी।

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