एकता में शक्ति: क्यों भारत को आज सच्ची मीडिया की सबसे अधिक जरूरत है
एकता में शक्ति: क्यों भारत को आज सच्ची मीडिया की सबसे अधिक जरूरत है
आज
जब हम कई राजनीतिक नेताओं को
देखते हैं, तो मन में
कई कठोर शब्द
आते हैं। ये शब्द हवा
में नहीं बने।
ये जनता की उस नाराज़गी
से पैदा हुए
हैं जो महसूस
करती है कि जिन्हें सत्ता दी
गई थी, उन्होंने
ही देश का साथ छोड़
दिया। यह दर्दनाक
है कि राजनाथ
सिंह, नीतीश कुमार,
चंद्रबाबू नायडू, ललन
सिंह और ऐसे कई नेता
अपने निजी फायदे
के लिए देश के हित
से मुँह मोड़
रहे हैं। इनमें
से कई पूरी तरह जानते
हैं कि देश के साथ
क्या हो रहा है। उनके
पास उसे रोकने
की ताकत है।
फिर भी उन्होंने
आँखें बंद कर रखी हैं।
नीतीश
कुमार और चंद्रबाबू
नायडू ने तो हद ही
पार कर दी। दोनों जानते
हैं कि देश को किस
तरह लूटा जा रहा है,
फिर भी उन्हीं
ताकतों के साथ खड़े हो
गए जिन्हें रोकने
का कर्तव्य उनका
था। यह मजबूरी
नहीं, सोची-समझी
राजनीति है, जिसके
नतीजे करोड़ों लोगों
को भुगतने होंगे।
एक
स्वस्थ लोकतंत्र में
स्वतंत्र मीडिया आख़िरी
दीवार होती है।
पर आज के स्वतंत्र सोशल मीडिया
पत्रकार अनजाने में
कई गलतियाँ दोहरा
रहे हैं। वे हर खबर
के साथ अपनी
भावनात्मक टिप्पणी जोड़ देते
हैं, मानते हुए
कि इससे खबर
मजबूत होती है।
कभी-कभी उनकी
सुर्खियाँ ही उनके
बयान से उलट होती हैं।
इससे विश्वसनीयता घटती
है, दर्शक उलझते
हैं और लोग ऐसे चैनलों
से दूर हो जाते हैं।
इस प्रक्रिया में
वे अनजाने में
उसी “ग़ोदी मीडिया”
की मदद कर देते हैं,
जिसके खिलाफ लड़ने
का दावा करते
हैं।
जनता
को कहानी नहीं
चाहिए। कहानी तो
झूठे मीडिया में
भरपूर है। जनता
को सच्चाई चाहिए।
साफ, सीधी और बिना नाटक
के।
स्वतंत्र
मीडिया को अपनी नींव बदलनी
होगी तथ्यों पर
टिके रहना होगा,
कमेंटरी बाद में करनी होगी,
भावनाएँ हटानी होंगी,
टीआरपी जैसा ड्रामा
छोड़ना होगा और जनता को
खुद सोचना देना
होगा। पर इतना काफी नहीं।
स्वतंत्र आवाज़ों को सच को इकट्ठा
करने, जाँचने और
एक साथ फैलाने
की व्यवस्था बनानी
होगी।
सच
तो यह है कि स्वतंत्र
मीडिया के पास ताकत पहले
से है। सरकार
दिनभर जानकारी जारी
करती है PIB, मंत्रालयों
के अपडेट, संसद
की कार्यवाही, कोर्ट
के आदेश, RTI जवाब,
वित्तीय खुलासे। हर
रेडियो और टीवी चैनल को
यह सब मिलता
है, पर pro-government मीडिया
सिर्फ वही चुनता
है जो उनके एजेंडा को
मजबूत करे। विरोधी
जानकारी गायब कर दी जाती
है। स्वतंत्र मीडिया
को इसका उलटा
करना है सब जुटाना, सब जाँचना,
और जनता को ईमानदारी से देना।
समस्या
जानकारी की नहीं।
समस्या तालमेल की
है।
छोटे
चैनल RTI डाल सकते
हैं, पब्लिक डेटा
निकाल सकते हैं,
एक-दूसरे से
जानकारी साझा कर सकते हैं
और सत्यापन नेटवर्क
बना सकते हैं।
अकेला चैनल संघर्ष
करता है, पर दस चैनल
साथ हों तो बड़े नेटवर्क
को चुनौती देते
हैं।
और
यहाँ सबसे बड़ा
डर आता है कि मिलकर
काम करने से दर्शक और
कमाई बाँटनी पड़ेगी।
यह सोच गलत है। जब
मीडिया एक साथ बोलता है,
उसकी पहुँच घटती
नहीं, कई गुना बढ़ती है।
झूठ इसलिए जीतता
है क्योंकि उसे
बार-बार, जोर
से और एकसाथ
दोहराया जाता है।
सोचिए, अगर सच को भी
उसी तरीके से
दोहराया जाए दसों
चैनलों द्वारा, दिन
दर दिन तो उसका असर
कितना शक्तिशाली होगा।
सच जब कई आवाज़ों से निकलता
है, तो वह भारी हो
जाता है। मजबूती
लेता है। उसे अनदेखा करना
नामुमकिन हो जाता
है।
और
यह संकट सिर्फ
भारत में नहीं
है। दुनिया के
कई देशों में
मीडिया का इस्तेमाल
जनता को गुमराह
करने के लिए हुआ है।
अमेरिका में सिनक्लेयर
ब्रॉडकास्ट ग्रुप इसका
सबसे बड़ा उदाहरण
है, जिसने सैकड़ों
स्टेशनों पर एक
ही स्क्रिप्ट चलाकर
करोड़ों लोगों की
सोच प्रभावित की।
वहीं फ़ॉक्स न्यूज़
से चिपके लाखों
अमेरिकी यह समझ ही नहीं
पा रहे कि जिस पार्टी
को वे बचा रहे हैं,
वह सिर्फ अमीरों
के हित में काम करती
है, गरीबों के
लिए कुछ नहीं।
पिछले पच्चीस सालों
से अमेरिका को
लूटा जा रहा है, और
जनता सोई हुई है क्योंकि
मीडिया ने झूठ को इतने
अनुशासन से दोहराया
कि वह सच जैसा लगने
लगा। यही होता
है जब झूठ को मशीन
की तरह फैलाया
जाता है।
एकजुट
मीडिया कहीं बड़ा
दर्शक जुटाता है।
राजस्व बढ़ता है,
और वह कमाई बहुत छोटी
लगने लगती है जो आज
मिल रही है। और इस
बढ़े हुए राजस्व
को बाँटना घाटा
नहीं, बल्कि लाभ
है। जब जनता देखती है
कि कई ईमानदार
चैनल एक जैसे सत्य को
तथ्य सहित रिपोर्ट
कर रहे हैं,
तो लोगों का
भरोसा बढ़ता है,
सम्मान बढ़ता है
और प्रभाव भी।
सबसे
गहरा लाभ यह है सच
कहने से आत्मा
हल्की होती है।
झूठ बोलने वाले
अपनी झूठ की कैद में
जीते हैं। सच बोलने वालों
पर कोई बोझ नहीं होता।
स्वतंत्र
चैनलों को ग़ोदी
मीडिया की नकल नहीं करनी।
उन्हें अनुशासन चाहिए,
तथ्य चाहिए और
एकता चाहिए। जब
कई चैनल एक ही सत्य
पर आधारित खबर
24 घंटों में जारी
करते हैं, तो उसे दबाना
नामुमकिन हो जाता
है। जब दर्जनों
चैनल मिलकर गलत
सूचना का पर्दाफाश
करते हैं, तो झूठ टिकता
नहीं। जब सच्चाई
को एकजुट होकर
फैलाया जाता है,
तो राष्ट्रीय कथा
बदल जाती है।
क्रांतियाँ
सिर्फ अच्छे इरादों
से नहीं होतीं।
योजना चाहिए। रणनीति
चाहिए। एकजुटता चाहिए।
भूखे और गरीब लोग क्रांति
नहीं करते। यह
भार उन पर पड़ता है
जिनके पास ज्ञान
है, संसाधन हैं
और हिम्मत है।
अगर
भारत को बदलाव
चाहिए, तो उसे उस संरचनात्मक
असमानता से टकराना
होगा जिसने बहुसंख्यक
को निर्भर, मौन
और अनजान बनाए
रखा है। पहला
कदम स्पष्ट है:
अज्ञान की रस्सी
को तोड़कर ऐसी
एकजुट आवाज़ तैयार
करना, जो सत्ता
के झूठों को
चुनौती दे सके।
सच
को जीतने के
लिए अनुमति नहीं
चाहिए। बस दोहराव
चाहिए। एकता चाहिए।
और वे लोग चाहिए जो
चुप रहने से इनकार करें।
भैंस के आगे बीन बजाना, अरे भाई तुम किनसे कह रहे हो, जो खुद टुकड़ों के मोहताज हैं। चंद टुकड़े फेंको इनके आगे, ये सब बिक जाएंगे। इनके बस की बात नहीं है इकट्ठा होना, यही तो इस देश का अभाग्य है।
ReplyDeleteतुम ठीक कहते हो, मगर मुझे तो बस बीन बजानी ही आती है। और मेरा मानना है कि अगर लोग कुछ बोलना शुरू कर देंगे, तो आहिस्ता-आहिस्ता सब लोग बोलना शुरू कर देंगे। और हो सकता है कि बदलाव आ जाए क्योंकि बदलाव ऐसे ही आता है।
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