आज़ादी: अब शर्तों के साथ बिक रही है सिर्फ़ कुछ ख़ास के लिए उपलब्ध

 आज़ादी: अब शर्तों के साथ बिक रही है सिर्फ़ कुछ ख़ास के लिए उपलब्ध

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हम आज़ादी को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं सोचने की आज़ादी, बोलने की आज़ादी, और काम करने की आज़ादी। जैसे कि ये तीनों चेकबुक की तरह हर भारतीय को मुफ्त में मिलते हैं। बस वोट डालो और समझो सब कुछ तुम्हारा। लेकिन हक़ीक़त इससे कोसों दूर है। आज़ादी अब सीमित नहीं है, उसे फिर से लिखा जा रहा है, पॉलिश किया जा रहा है, और डिजिटल एल्गोरिदम से छाना जा रहा है ताकि वही निकले जो सत्ता को पसंद हो।

विडंबना देखिए भारत, जो वैदिक विचारों का जनक है, जहां वेदों ने खुले विमर्श की वकालत की, उपनिषदों ने आत्मचिंतन को पूजा और सभाओं ने असहमति को स्वीकृति वही देश अब उन लोगों के हाथों में है जिन्हें आज़ादी से सबसे ज़्यादा डर लगता है।

सोचने की आज़ादी फिलहाल अब भी बची है क्योंकि कोई अभी तक दिमाग़ के अंदर घुस नहीं पाया। सरकारें किताबें बैन कर सकती हैं, दफ्तरों पर छापे मार सकती हैं, सोशल मीडिया को हिंदुत्व से भर सकती हैं, पर सोच को जंजीर नहीं पहना सकतीं। यही आख़िरी बचा किला है, जहां तर्क, यादें और अंतःकरण सत्ता से ज़्यादा मज़बूत हैं।

बोलने की आज़ादी अब सिर्फ़ पावरफुल लोगों की जागीर बन गई है। बीजेपी का नेता खुलकर गाली देगा, झूठ बोलेगा, नफ़रत फैलाएगा तो उसे 'राष्ट्र भक्त' कहा जाएगा। विपक्ष के किसी नेता ने सवाल पूछ लिया, तो उसे देशद्रोही, 'अर्बन नक्सल' या जेल का मेहमान बना दिया जाएगा। लोकतंत्र अब माइक पर बोले जाने वाला वन वे भजन बन गया है जिसमें सत्ता बोले, जनता सिर्फ़ तालियाँ बजाए।

जानवरों का जंगल भी ज़्यादा संतुलित होता है। वहाँ शेर तभी दहाड़ता है जब ज़रूरत हो। भारत के राजनीतिक जंगल में जो सबसे ज़्यादा छाती पीटता है, वही टीवी पर छाया रहता है चाहे उसकी बातों में रत्ती भर सच्चाई हो। और सबसे बड़ी बात शेर कम से कम साधु का नकाब तो नहीं पहनता।

कर्म की आज़ादी का हाल और भी बुरा है। जहाँ यह कानूनों की सीमा में रहनी चाहिए, वहाँ इसे नीलाम कर दिया गया है। चुनाव आयोग अब स्वतंत्र नहीं, सत्ता के हिसाब से सजाया गया शोपीस है। इलेक्टोरल बॉन्ड्स के ज़रिए लगभग पूरा चंदा गुपचुप तरीके से बीजेपी की जेब में चला गया। सरकारी संपत्तियाँ अम्बानी-अडानी को डिस्काउंट में बाँटी जा रही हैं, और जो सवाल उठाए, उन्हें जेल में डाल दिया जाता है। मीडिया को खरीद लिया गया है, जो नहीं बिके, उन्हें डराया गया है, और जो चुप हुए, उनके चैनल बंद कर दिए गए।

और अब सत्ता ने जो सबसे खतरनाक खेल खेला है, वो है वैध वोटरों को मिटा देना। हां, आपने सही पढ़ा।
विपक्ष समर्थक इलाकों में लाखों नाम मतदाता सूची से गायब कर दिए गए ना कोई SMS, ना कोई नोटिस, ना कोई अपील का हक़। SIR (Systematic Integrated Roll revision) जैसे डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल कर लोगों की वोट देने की आज़ादी को ही सिस्टम से डिलीट कर दिया गया। ये तकनीकी गलती नहीं है यह सुनियोजित, डिजिटल नागरिक हत्या है।

लोकतंत्र में वोट देना सिर्फ़ अधिकार नहीं आपकी सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है। और जब वही अधिकार छीन लिया जाए, वो भी चुपचाप तो ये सिर्फ़ चुनावी धांधली नहीं, ये पूरे लोकतंत्र का गला घोंटना है।

जो सत्ता में हैं, उनके पास आज़ादी अनलिमिटेड है बोलने की, लूटने की, झूठ बोलने की। क्योंकि उन्होंने पूरे सिस्टम को अपने मुताबिक़ मोड़ लिया है। चीन, रूस और उत्तर कोरिया में अधिनायकवाद का चेहरा क्रूर होता है। भारत में वो चेहरा हाथ जोड़ता है, मुस्कुराता है और गीता के श्लोक पढ़ता है।

और सबसे बड़ा मज़ाक ये है कि भारत ने आज़ादी का विचार किसी से उधार नहीं लिया था हमने उसे गढ़ा था। जब बाकी दुनिया जंगलों में घूम रही थी, तब भारत संवाद, धर्म और कर्तव्य की बात कर रहा था। आज वही विचार उन लोगों के हाथ में है जो उसकी आत्मा को कुचलकर, उसका नाम अपने भाषणों में बेच रहे हैं।

आज़ादी कभी असीमित नहीं थी, पर वो समान थी। वो न्याय के लिए थी, सबके लिए थी।

और जब सिर्फ़ शासकों को आज़ादी हो, और आम जनता की आवाज़ मिटा दी जाए, उसे जेल में डाला जाए या वोटर लिस्ट से ही मिटा दिया जाए तो समझिए, आज़ादी अब अधिकार नहीं, बस एक ड्रामा बन चुकी है।

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