रैलियों से आगे: जन आक्रोश को लोकतांत्रिक बदलाव में बदलने की ज़रूरत

 

रैलियों से आगे: जन आक्रोश को लोकतांत्रिक बदलाव में बदलने की ज़रूरत

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2025/12/beyond-rallies-turning-public-anger.html

कल INDIA गठबंधन ने वोट चोरी के मुद्दे पर एक विशाल रैली आयोजित की। लगभग दस लाख लोग इसमें शामिल हुए। रैली का आकार अपने आप में एक संदेश था और यह संदेश सत्ताधारी पार्टी को असहज करने के लिए काफी था।

ऐसी ऊर्जावान विपक्षी रैलियों में तीखे और भावनात्मक नारे असामान्य नहीं होते। रैली में एक व्यक्ति ने प्रधानमंत्री मोदी केदफ़नकी बात कही। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नागरिकों को यह अधिकार देती है कि वे अपने गुस्से और असंतोष को अपनी भाषा में व्यक्त करें। इसके बावजूद, आज संसद के भीतर बीजेपी नेताओं ने इसी एक बयान को मुद्दा बनाकर कांग्रेस से माफ़ी की मांग कर डाली।

यह प्रतिक्रिया पूरी तरह से पाखंडपूर्ण है। यही पार्टी अपने ही नेताओं द्वारा संसद के भीतर, चुनावी रैलियों में, और सत्ता के सर्वोच्च पदों से दिए गए भड़काऊ और अपमानजनक बयानों को केवल सहन करती है, बल्कि अक्सर बढ़ावा भी देती है चाहे वे बयान प्रधानमंत्री मोदी के हों या गृह मंत्री अमित शाह के। यह नैतिक आक्रोश नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ध्यान भटकाने की रणनीति है।

बीजेपी इस रणनीति में माहिर हो चुकी है। जब भी असहज सवाल सामने आते हैं, बहस को जानबूझकर गैर-मुद्दों की ओर मोड़ दिया जाता है। खासकर तब, जब ऐसे सवाल उठते हैं जिनका जवाब पार्टी पूरे देश के सामने नहीं देना चाहती।

वोट चोरी का सवाल कोई काल्पनिक मुद्दा नहीं है। कई राज्यों में बीजेपी ने सरकारें बनाई हैं, जबकि लगभग हर एग्ज़िट पोल में उसकी हार दिखाई गई थी। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने डेटा, पैटर्न और अनियमितताओं के ठोस सबूत पेश किए हैं। फिर भी बीजेपी और चुनाव आयोग दोनों में से किसी ने भी जनता को संतुष्ट करने वाला जवाब नहीं दिया। सवालों के जवाब देने के बजाय, पूरा ज़ोर बहस को भटकाने में लगाया गया।

इसी बीच, प्रधानमंत्री मोदी कथित तौर पर एक सेक्स स्कैंडल में भी फँसे हुए हैं, जिसकी रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से घूम रही है। पारदर्शिता या स्वतंत्र जांच की अनुमति देने के बजाय, रणनीति चुप्पी और टालमटोल की लगती है। लेकिन चुप्पी संदेह को खत्म नहीं करती उसे और गहरा करती है।

INDIA गठबंधन को मिल रहे स्पष्ट जनसमर्थन के बावजूद, विपक्ष अब तक उस सरकार को हटा नहीं पाया है जो ED, CBI और IT विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों का खुलेआम राजनीतिक हथियारों की तरह इस्तेमाल कर रही है। इन संस्थाओं का उपयोग विपक्ष को डराने, सहयोगी दलों को दबाव में रखने और NDA को एकजुट बनाए रखने के लिए किया जा रहा है। इस पूरे तंत्र को बड़े कॉरपोरेट समूहों का समर्थन प्राप्त है, जिन्होंने संस्थानों और मुख्यधारा मीडिया के बड़े हिस्से पर प्रभाव खरीद लिया है।

लेकिन यह मॉडल हमेशा नहीं चल सकता। जनता का धैर्य जवाब दे रहा है। गुजरात सहित कई जगहों पर पुलिस और जनता के बीच हिंसक टकराव इसी बढ़ते गुस्से का संकेत हैं। पुलिस के खिलाफ हिंसा तो सही है और ही समाधान बल्कि इससे सत्ताधारी पार्टी को दमन के नए बहाने मिलते हैं। फिर भी, यह असंतोष एक चेतावनी है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

रैलियाँ ज़रूरी हैं। जोशीले भाषण ऊर्जा देते हैं। लेकिन केवल रैलियों से सिस्टम नहीं बदलता।

रणनीति बदलनी होगी।

जब तक INDIA गठबंधनगोदी मीडियाके समानांतर एक विश्वसनीय वैकल्पिक मीडिया तंत्र नहीं बनाता और सीधे जनता से संवाद नहीं करता, तब तक स्थिति नहीं बदलेगी। लोगों को यह समझाना होगा कि धर्म, प्रतीकों और मूर्ति-पूजा की आड़ में जो हर समुदाय में भावनाओं को भड़काने का काम करती है उन्हें आर्थिक और राजनीतिक रूप से कैसे लूटा जा रहा है। सच को साफ़, बार-बार और निर्भीकता से कहना होगा।

जब देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी सरकारी सहायता पर निर्भर है, तब लोगों को उनकी असली ताक़त याद दिलाने का समय गया है लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि नागरिक के रूप में।

INDIA गठबंधन को कुछ साफ़ और साहसिक वादे करने होंगे:

भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। न्याय व्यवस्था को समयबद्ध बनाया जाएगा। कोई भी मुकदमा दो साल से अधिक समय तक अदालतों में नहीं लटका रहेगा। न्यायाधीशों को समय पर निर्णय देना अनिवार्य होगा। छोटे अपराधों में बिना सिद्ध आरोप के लोगों को ज़मानत का अधिकार होगा, लेकिन दोष सिद्ध होने पर राजनीतिक दबाव में सज़ा कम नहीं की जाएगी। नागरिकों को अपराध-मुक्त जीवन का भरोसा दिया जाएगा, और जो राज्य कानून-व्यवस्था में विफल होंगे, वहाँ पुलिस और न्यायिक व्यवस्था दोनों की जवाबदेही तय होगी।

किसी भी प्रकार के नरसंहार या सामूहिक हिंसा को सहन नहीं किया जाएगा। दोषी चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों हों, उन्हें न्याय का सामना करना पड़ेगा।

लक्ष्य देश को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं।

नक्सल आंदोलन जैसे संघर्षों को गरीबों और उपेक्षित लोगों का समर्थन इसलिए मिलता है क्योंकि उन्हें लगातार अनदेखा किया गया है। विकास के नाम पर इन समुदायों को कुचलना समस्या का समाधान नहीं है। समाधान है बेहतर स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएँ, बुनियादी ढांचा, और लोगों को अपनी ज़मीन, संस्कृति और जीवन पर अधिकार देना। विकास का मतलब सम्मान भी होना चाहिए।

भारत पिछले 80 वर्षों की गलतियों को दोहराने का जोखिम नहीं उठा सकता। अब समय गया है कि कठिन मुद्दों का सामना ईमानदारी और साहस के साथ किया जाए। INDIA गठबंधन को केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और संस्थागत सुधारों से यह भरोसा दिलाना होगा।

संदेश साफ़, सीधा और आम ज़िंदगी से जुड़ा होना चाहिए।

यहाँ एक नया नारा है, जिसे INDIA गठबंधन को जनता तक ले जाना चाहिए जो रोज़गार, सम्मान और साझा अवसर की बात करता है: घर घर INDIA, घर घर नौकरी।

तभी जन आक्रोश को स्थायी लोकतांत्रिक बदलाव में बदला जा सकता है।

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