वैश्विक लोकतंत्र पर कॉर्पोरेट शासन के शांत उभार का सच

 

वैश्विक लोकतंत्र पर कॉर्पोरेट शासन के शांत उभार का सच

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2025/12/the-quiet-rise-of-corporate-rule-over.html

पिछले चार सौ वर्षों से भी अधिक समय से कॉर्पोरेट शक्तियों ने राजनीतिक ताकत को उन तरीकों से आकार दिया है जिन्हें आम नागरिक शायद ही कभी देख पाते हैं। यह कहानी केवल आज के प्रभाव या चुनावों पर उठते सवालों से शुरू नहीं होती। इसकी शुरुआत उस दौर से होती है जब यूरोपीय कंपनियों ने बिना चुने गए शासन की कला सीखकर पूरी दुनिया में अपना दबदबा बनाया। ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के लिए बनी थी, लेकिन जल्द ही टैक्स वसूलने लगी, सेनाएं चलाने लगी और करोड़ों लोगों पर नियंत्रण कायम करने लगी। उसने अफ्रीका से गुलाम बनाकर लोगों को अमेरिका पहुंचाया और ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और एशिया के बड़े हिस्सों पर कब्जा किया। उसकी ताकत संख्या में नहीं थी, व्यवस्था में थी। यूरोपीय औद्योगिक प्रक्रियाएं उन समाजों की तुलना में कहीं तेज थीं जिन पर वह निशाना साध रही थी। ज्यादातर जगह राजाओं या तानाशाहों का शासन था और जनता का बड़ा हिस्सा अशिक्षित था। कंपनियों को सिर्फ कुछ फैसले लेने वालों को अपने पक्ष में करना होता था। लालच, दबाव और चालों के जरिए उन्हें आर्थिक पहुंच मिलती गई और फिर वे ऐसे कानून थोपती गईं जो आने वाले दशकों तक कॉर्पोरेट हितों की रक्षा करते रहे।

वह मॉडल कभी गायब नहीं हुआ। उसने रूप बदल लिया। आज कई लोकतांत्रिक देशों में ऐसे नेता सत्ता में हैं जिनका उदय बड़े कारोबारी समूहों के समर्थन से हुआ है। 2016 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक कारोबारी को राष्ट्रपति चुना। भारत ने 2014 में नरेंद्र मोदी को चुना, जिनके उभार में देश के सबसे शक्तिशाली कॉर्पोरेट घरानों का बड़ा हाथ था। अन्य देशों में भी यही पैटर्न दिखता है। इसे अक्सर जनता की पसंद कहा जाता है, लेकिन भीतर की कहानी बताती है कि राजनीति की संरचना को धीरे धीरे इस तरह बदला गया है कि उसका केंद्र लोकतंत्र से अधिक कॉर्पोरेट हित बन जाए।

अमेरिका में यह बदलाव 11 सितंबर 2001 के बाद तेज हुआ। हमले के बाद देश डर और सदमे से घिरा था, और उसी माहौल में फैसले तेजी से लिए गए। युद्ध शुरू हुआ। निजी कॉन्ट्रैक्टर वो काम करने लगे जो पहले राज्य की जिम्मेदारी थे। सुरक्षा, खुफिया, निर्माण और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में सरकार की जगह बड़े कारोबारी समूहों ने ले ली। ट्रिलियनों डॉलर दीर्घकालिक कॉन्ट्रैक्ट्स में बंध गए। जनता आतंक और असुरक्षा में उलझी रही, और इसी दौरान देश का कर्ज तेजी से बढ़ता गया। दो दशक बाद भी उस दौर में लिए गए फैसलों का आर्थिक बोझ अमेरिकी राजनीति को प्रभावित कर रहा है, लेकिन कॉर्पोरेट भूमिका पर बहुत कम चर्चा होती है।

भारत की दिशा इस वैश्विक ढांचे की दूसरी झलक देती है। सरकार अक्सर गर्व से कहती है कि वह 85 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन देती है। अर्थशास्त्री बताते हैं कि यह व्यवस्था जनता को शांत रखती है जबकि बड़े नीति परिवर्तन कॉर्पोरेट विस्तार के लिए रास्ता खोल रहे हैं। जैसे जैसे कल्याण योजनाएं बढ़ती हैं, वैसे वैसे कारोबारी समूहों की नीतिगत पहुँच गहरी हो जाती है, चाहे वह टैक्स नियम हों, मीडिया नियंत्रण हों या व्यापार कानून। खुफिया रिपोर्टों से यह भी पता चलता है कि पश्चिमी देशों और इज़राइल ने 2010 के दशक की शुरुआत में भारत के राजनीतिक बदलाव का समर्थन किया था। कारण साफ था। एक आत्मनिर्भर भारत भविष्य में पश्चिम के लिए सीधा आर्थिक प्रतिस्पर्धी बन सकता था। चीन को रोकना पहले ही असंभव हो चुका था। भारत अगले नंबर पर था, और उसे शुरुआती चरण में प्रभावित करना आसान माना गया।

इसी वजह से जब राहुल गांधी जैसे नेता चुनावी अनियमितताओं पर सवाल उठाते हैं, दुनिया की प्रतिक्रिया कमजोर रहती है। अंतरराष्ट्रीय ताकतें मौजूदा भारतीय मॉडल को स्थिर और कारोबारी हितों के अनुकूल मानती हैं। इसलिए कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता, क्योंकि आज का ढांचा उसी ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह काम करता दिख रहा है जिसमें स्थानीय सरकार चलती है लेकिन असली डोरें कहीं और से खींची जाती हैं.

जाँच से पता चलता है कि आज सीमाएं भी दोहरी भूमिका निभाती हैं। जिनके पास कौशल है, उनके लिए दुनिया खुली है। वे कहीं भी जा सकते हैं, काम कर सकते हैं, और देश उन्हें आमंत्रित करते हैं। जिनके पास साधन नहीं, उनके लिए सीमाएं और कड़ी हो रही हैं। आधुनिक सीमा नीति का उद्देश्य सुरक्षा से अधिक आर्थिक छंटाई बन गया है।

डर भी इस व्यवस्था का अहम हिस्सा है। आतंक, नफरत और सांस्कृतिक तनाव लगातार लोगों का ध्यान भटकाए रखते हैं। जब जनता डरी और बंटी रहती है तो सत्ता से सवाल कम पूछती है। भ्रष्टाचार सामान्य लगता है। अदालतों में फैसले असमान होते हैं। ताकतवरों के गंभीर अपराध दब जाते हैं जबकि छोटे मामलों को तेज़ी से निपटाया जाता है ताकि सस्ती जेल मज़दूरी मिल सके। जजों की नियुक्ति भी अक्सर इस आधार पर होती है कि वे किन हितों की रक्षा करेंगे।

इन सबको एक साथ रखें तो तस्वीर साफ दिखती है। लोकतंत्र बचा हुआ है, लेकिन उसका ढांचा बदला जा चुका है। लोग वोट देते हैं, लेकिन चुनाव उस व्यवस्था के भीतर होते हैं जो कॉर्पोरेट धन, मीडिया नियंत्रण, एल्गोरिदमिक प्रभाव और दशकों में बने कानूनी ढांचे से संचालित होती है। चुनावी प्रक्रिया बनी हुई है, पर उसके परिणाम अक्सर उन नेताओं की ओर झुके रहते हैं जो वैश्विक कारोबारी हितों के अनुकूल हों।

लोकतंत्र खत्म नहीं हुआ। उसे दोबारा गढ़ा गया है। और जब तक नागरिक यह नहीं समझेंगे कि असली शक्ति अब चुनकर आए प्रतिनिधियों में नहीं, बल्कि उन कॉर्पोरेट नेटवर्क में है जो उन्हें दिशा देते हैं, तब तक वे उसी राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेते रहेंगे जो असल में पूरी तरह उनकी नहीं रही।

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