रुपये की गिरती कीमत भारत की गहराती आर्थिक खामियों का असली आईना
रुपये की गिरती कीमत भारत की गहराती आर्थिक खामियों का असली आईना
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भारतीय
रुपया लगातार गिर
रहा है और यह न
तो कोई बाहरी
हादसा है और न ही
कोई वैश्विक अनिवार्यता.
यह पिछले ग्यारह
वर्षों में लिए गए घरेलू
आर्थिक फैसलों का
सीधा नतीजा है.
बीजेपी सरकार के
दौरान रुपया करीब
1.786 सेंट से गिरकर
लगभग 1.1 सेंट पर
आ गया. भारत
अपनी ज़रूरतों का
बड़ा हिस्सा कच्चा
तेल, मशीनें, इलेक्ट्रॉनिक्स,
दवाओं के कच्चे
पदार्थ आयात करता
है. जब मुद्रा
कमजोर होती है तो हर
आयात महंगा होता
है. पहले उद्योग
को झटका लगता
है, फिर जनता
को. गिरता हुआ
रुपया यह साफ बताता है
कि देश की आर्थिक बुनियाद
लगातार कमजोर हो
रही है.
इसी
दौर में भारत
ने एक ऐसा आर्थिक मॉडल
अपनाया जिसमें अपार
संपत्ति देश की बहुत ही
छोटी आबादी के
हाथों में सिमट
गई. एक मामूली
अल्पसंख्यक वर्ग ने
चकित कर देने वाली संपत्ति
बना ली, जबकि
देश की विशाल
आबादी की आय ठहरी रही,
बेरोजगारी बढ़ी और
जीवन यापन महँगा
होता गया. यह असमानता खुली आंखों
से दिखाई देती
है. 2014 में गौतम
अडानी की संपत्ति
लगभग 7.1 अरब डॉलर
थी. एक दशक में उनके
मूल्य का अनुमान
60 से 90 अरब डॉलर
के बीच पहुँच
गया, और एक समय 100 अरब डॉलर
से भी ऊपर चला गया.
वहीं मुकेश अंबानी
19 अरब डॉलर से बढ़कर 110 अरब डॉलर
से ऊपर पहुँच
गए. इतनी तेज़
और असाधारण वृद्धि
पिछले 11 वर्षों में
किसी अन्य भारतीय
कारोबारी समूह में
नहीं देखी गई.
यही
आंकड़े मीडिया, निवेशक
मंचों और अंतरराष्ट्रीय
रिपोर्टों में “शाइनिंग
इंडिया” का प्रमाण
बनाकर पेश किए जाते हैं.
लेकिन कुछ परिवारों
की बढ़ती संपत्ति
140 करोड़ लोगों की
अर्थव्यवस्था की सच्चाई
नहीं बताती. यह
बस यह दिखाती
है कि अवसर,
पूंजी, लाइसेंस और
लाभ ऊपर की ओर केंद्रित
हुए और जोखिम,
महँगाई और भार नीचे के
वर्ग पर गिरा.
इसी
बीच देश का बुनियादी ढांचा भी
जनता की जेब पर खड़ा
है. सड़कें, एक्सप्रेसवे,
एयरपोर्ट इन सबका
खर्च टैक्स से
उठता है, लेकिन
फिर इन्हीं नागरिकों
से टोल और सर्विस शुल्क
लेकर उसी ढांचे
का इस्तेमाल करवाया
जाता है. देश भर में
टोल प्लाज़ा बढ़ते
गए और मूलभूत
सुविधाओं पर अतिरिक्त
शुल्क भी चढ़ता
गया, जबकि आम लोगों की
वास्तविक आय गिरती
गई. आम जनता के लिए
हर नई सड़क विकास से
ज़्यादा एक नया खर्च बन
गई.
और
यह संरचना कई
जगहों पर टिक भी नहीं
पाती. नई बन रही पुलें
कुछ महीनों में
टूट जाती हैं,
हाईवे उद्घाटन के
कुछ हफ्तों में
फट जाते हैं,
बिजली और परिवहन
परियोजनाएं वर्षों तक
लटकी रहती हैं.
इतने बड़े सार्वजनिक
निवेश के बावजूद
ठोस परिणाम नहीं
दिखते. CAG की रिपोर्टें
बार-बार वित्तीय
गड़बड़ियों, परियोजनाओं में देरी,
बजट से अधिक खर्च और
खराब निष्पादन को
उजागर करती हैं.
भारत का राष्ट्रीय
कर्ज 235 लाख करोड़
से ऊपर पहुँच
चुका है, लेकिन
ज़मीन पर रोजगार,
मजबूत उद्योग या
स्थायी विकास दिखाई
नहीं देता. जब
कर्ज बढ़े और परिणाम घटें,
तो मुद्रा का
गिरना तय है.
इस
दौरान सरकार सबसे
बड़ी उपलब्धि के
रूप में यह घोषणा करती
रही है कि 85
करोड़ लोगों को
मुफ्त अनाज दिया
जा रहा है. प्रधानमंत्री स्वयं इस
आंकड़े को गर्व से दोहराते
हैं. लेकिन कोई
भी मजबूत अर्थव्यवस्था
अपनी आधी से अधिक आबादी
को मुफ्त भोजन
नहीं कराती. यह
सफलता का नहीं,
बल्कि आर्थिक संकट
का सबसे बड़ा
संकेत है. यह बताता है
कि देश की एक विशाल
आबादी के पास भोजन खरीदने
लायक भी आय नहीं बची.
फिर
भी दुनिया के
बड़े मीडिया संस्थान,
विदेशी निवेशक और
अंतरराष्ट्रीय मंच अक्सर
भारत को उभरती
आर्थिक महाशक्ति बताते
हैं. वे अरबपतियों
की संख्या, यूनिकॉर्न
कंपनियों, स्टॉक मार्केट
रिकॉर्ड, और चमकदार
कार्यक्रमों को आधार
बनाते हैं. लेकिन
यह चमकदार तस्वीर
देश की असली स्थिति नहीं
बताती. ज़मीन पर
लोग महँगाई, बेरोजगारी
और कमजोर रुपये
से जूझ रहे हैं.
हकीकत
यह है कि भारत चमक
रहा है लेकिन
सिर्फ़ एक बहुत ही छोटे
वर्ग के लिए. देश का
अधिकांश हिस्सा उस
चमक का बोझ उठा रहा
है.
मजबूत
अर्थव्यवस्थाएं नीचे से
ऊपर की ओर बढ़ती हैं.
वे करोड़ों लोगों
की आय बढ़ाती
हैं, स्थायी रोजगार
पैदा करती हैं,
जीवन यापन की लागत घटाती
हैं और सार्वजनिक
खर्च को पारदर्शी
बनाती हैं. वे नीतियां विशेषज्ञों के
आधार पर बनाती
हैं, न कि प्रचार और
आयोजनों पर. वे ऐसा ढांचा
बनाती हैं जो दशकों तक
टिके, महीनों में
न टूटे.
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