जब अव्यवस्था शासन की नीति बन जाती है: भारत की आज की हालत को समझना
जब अव्यवस्था शासन की नीति बन जाती है: भारत की आज की हालत को समझना
तानाशाही
सोच कभी स्थिरता
पर नहीं चलती।
ऐसे नेता हमेशा
डर, उलझन और लगातार चलती
समस्याओं पर टिके
रहते हैं। जितनी
ज़्यादा परेशानी जनता
झेलती है, उतना
आसान हो जाता है लोगों
का ध्यान भटकाना
और सत्ता में
बने रहना। भारत
में पिछले कुछ
सालों की घटनाएँ
यही दिखाती हैं।
इंडिगो
एयरलाइन का हालिया
संकट इसका एक बड़ा उदाहरण
है। विशेषज्ञ पहले
से सरकार को
चेतावनी दे चुके थे, लेकिन
सरकार ने कोई कदम नहीं
उठाया। संकट सामने
आया, हजारों लोग
फँस गए और कई लोग
भारी तनाव में
आ गए। दुख की बात
यह है कि इनमें से
ज़्यादातर लोग उसी
सरकार को वोट देते हैं
और फिर भी सरकार से
सवाल नहीं करते।
जब लोग कहते
हैं “मोदी नहीं
तो कौन?”, यह
दिखाता है कि उन्होंने समस्याओं की
असल वजह समझना
ही नहीं चाहा।
लेकिन
इंडिगो की समस्या
अकेली नहीं है।
भारत में बड़ी-बड़ी ग़लतियाँ
और हादसे लगातार
बढ़े हैं। ट्रेनें
पटरी से उतरती
हैं, नए पुल कुछ महीनों
में गिर जाते
हैं, एयरपोर्ट की
छतें टूट जाती
हैं, बारिश में
सड़कें बह जाती हैं, और
बड़े-बड़े सरकारी
प्रोजेक्ट समय से
पहले खराब हो जाते हैं।
ये सब हादसे
किसी किस्मत का
खेल नहीं हैं।
ये खराब काम,
भ्रष्टाचार और बिना
सही जाँच के दिए गए
ठेकों का नतीजा
हैं। जब कोई पुल गिरता
है या सड़क टूटती है,
यह सिर्फ ईंट-पत्थर का
नहीं, बल्कि जनता
के मेहनत के
पैसे का नुकसान
है।
सरकारी
सेवाओं की हालत भी खराब
होती गई है। सरकारी स्कूल
बंद हो रहे हैं या
खराब हालत में
पहुँच गए हैं। सरकारी अस्पतालों
में डॉक्टर, स्टाफ
और दवाइयों की
कमी है। जहाँ
सरकार को ज़िम्मेदारी
निभानी चाहिए, वहाँ
लोगों को निजी स्कूलों और निजी अस्पतालों तक धकेला
जा रहा है। इससे इलाज,
दवाइयाँ और शिक्षा
सभी महँगी हो
गई हैं।
यही
जगह है जहाँ सरकार की
चाल साफ़ दिखती
है: पहले सरकारी
सेवाओं को कमज़ोर
करो, फिर गरीबों
के लिए बड़ी-बड़ी योजनाओं
का प्रचार करो,
और फिर वही योजनाएँ निजी कंपनियों
को पैसा दिलाने
का ज़रिया बना
दो। उदाहरण के लिए,
गरीबों के लिए 5
लाख रुपए तक की स्वास्थ्य
बीमा योजना को
“बड़ी मदद” बताकर
शुरू किया गया,
लेकिन बाद में
CAG की रिपोर्ट में
खुलासा हुआ कि इस योजना
में भारी गड़बड़ियाँ
हुईं और सरकारी
खज़ाने से बहुत पैसा निजी
अस्पतालों की जेब
में चला गया। उधर
सरकारी अस्पताल बंद
होते गए, और लोग मजबूर
होकर निजी अस्पतालों
में महँगा इलाज
कराते रहे। इसका
नुकसान सबसे ज़्यादा
गरीबों, मजदूरों और
मिडिल क्लास को
हुआ।
यह
पैटर्न हर जगह दिखता है:
पहले जनता की सेवा वाली
चीज़ें कमजोर करो फिर
निजी कंपनियों को
आगे लाओ
और फिर सरकारी
पैसा उन कंपनियों
तक पहुँचाओ
यानी
लोगों के लिए बनाई गई
योजनाएँ असल में कॉर्पोरेट कमाई का ज़रिया बन
जाती हैं।
इस
तरह की शासन व्यवस्था में अव्यवस्था
कोई गलती नहीं
है यह एक तरीका है।
जब जनता ट्रेन
हादसे, उड़ानों की
गड़बड़ी, टूटते पुल,
अनियंत्रित महंगाई, अस्पतालों की
कमी, बेरोजगारी और
रोजमर्रा की परेशानियों
से जूझती है,
तब उनके पास
सवाल करने की ताकत नहीं
बचती। सरकार छोटे-छोटे समाधान
दिखाकर खुद को “उद्धारकर्ता” साबित करती
है, जबकि बड़ी
समस्या वही बनाती
है।
इसी
बीच, बड़े कॉर्पोरेट
घरानों का असर बढ़ता जाता
है। कई कानून
और नीतियाँ अब
जनता के लिए नहीं, बल्कि
कुछ बड़े उद्योगपतियों
के फ़ायदे के
लिए बनाई जाती
हैं। छोटे व्यापार
बंद होते जाते
हैं, आम लोगों
की जेब ढीली
होती रहती है और देश
कुछ चुनिंदा लोगों
की पकड़ में
आता जाता है। भारत
का नागरिक धीरे-धीरे एक
“ग्राहक” बनता जा
रहा है जहाँ हर चीज़
महँगी है और कोई विकल्प
नहीं।
पिछले
लेख में मैंने
बताया था कि ऐसी शासन
व्यवस्था का असर
अर्थव्यवस्था और रुपये
की कीमत पर कैसे पड़ता
है। लेकिन यह
लेख रुपये के
बारे में नहीं
है। यह उस शासन के
बारे में है जिसकी वजह
से देश की हालत बिगड़ती
जा रही है। जब संस्थाएँ
कमजोर होती हैं,
जब भ्रष्टाचार बढ़ता
है, जब सरकार
जनता की बजाय कॉर्पोरेट हितों को
प्राथमिकता देती है,
तब कोई भी देश मज़बूत
नहीं रह सकता।
अंत
में जिम्मेदारी जनता
की होती है।
लोकतंत्र सिर्फ वोट
देने से नहीं चलता। यह
सवाल पूछने, जवाब
मांगने, और गलत को गलत
कहने से चलता है। अगर
जनता आँखें बंद
रखेगी, सिर्फ प्रचार
पर यकीन करेगी,
और सरकार की
ग़लतियों पर भी
ताली बजाएगी, तो
देश कभी आगे नहीं बढ़
सकता।
भारत
दो रास्तों के
सामने खड़ा है एक
रास्ता जवाबदेही, ईमानदारी
और मज़बूत संस्थाओं
की तरफ जाता
है,
दूसरा रास्ता अव्यवस्था,
निजी हितों और
दबाव की राजनीति
की तरफ।
कौन
सा रास्ता चुना
जाएगा यह जनता तय करेगी।
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