बिना जवाबदेही की सत्ता: जब डर और लालच लोकतंत्र को खोखला कर दें
बिना जवाबदेही की सत्ता: जब डर और लालच लोकतंत्र को खोखला कर दें
पिछले
एक दशक में एक बात
साफ़ तौर पर सामने आई
है। भारतीय जनता
पार्टी की सरकार
ने जनता के लिए नए,
ठोस और दूरगामी
सुधार लाने के बजाय ज़्यादा
समय पिछली सरकारों
की नीतियों को
बदलने, उनका नाम
बदलने और सत्ता
को दिल्ली में
केंद्रित करने में
लगाया है। योजनाएँ
दोबारा पैक की जाती हैं,
फैसले ऊपर से थोपे जाते
हैं और संस्थागत
नियंत्रण धीरे-धीरे
कमजोर कर दिए जाते हैं।
नतीजा
यह है कि आम नागरिक
के जीवन को साफ़ तौर
पर बेहतर बनाने
वाली कोई एक भी ऐतिहासिक
नीति सामने नहीं
आती।
इसके
बदले सरकार ध्रुवीकरण
को अपना सबसे
भरोसेमंद हथियार बनाए
हुए है। धार्मिक
पहचान को बार-बार उछाला
जाता है। मुसलमानों
और ईसाइयों को
खतरे के रूप में पेश
किया जाता है और असहमति
को देशद्रोह का
नाम दे दिया जाता है।
इससे जनता का ध्यान असली
मुद्दों से भटकता
है और बड़े फैसले बिना
बहस के पारित
कर दिए जाते
हैं। केंद्र से
थोपे गए ऐसे कानून और
योजनाएँ जानबूझकर अपारदर्शी
रखी जाती हैं,
ताकि उनका दुरुपयोग
आसान हो।
आँकड़े
इस सच्चाई की
पुष्टि करते हैं।
भारत के नियंत्रक
एवं महालेखा परीक्षक
की 2022 और 2023 की
रिपोर्टों के अनुसार
₹20 लाख करोड़ से
अधिक की सार्वजनिक
राशि या तो बेहिसाब है या फिर तय
सीमा से कहीं ज़्यादा खर्च की गई है।
परियोजनाओं की लागत
बिना किसी ठोस
वजह के कई गुना बढ़ा
दी जाती है।
स्वास्थ्य, बुनियादी ढाँचे, खाद्य
सुरक्षा और कल्याण
योजनाओं के लिए रखा गया
पैसा गायब हो जाता है।
निगरानी काग़ज़ों में
मौजूद है, ज़मीन
पर नहीं।
अब
सरकार मनरेगा को
कमजोर करने की ओर बढ़
रही है, जिसे
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
ने शुरू किया
था। यह योजना
ग्रामीण परिवारों को
100 दिनों का रोज़गार
देती है और न्यूनतम मज़दूरी तय
करती है, ताकि
शोषण न हो सके। मनरेगा
सिर्फ़ रोज़गार नहीं
देता, बल्कि मज़दूरों
को सौदेबाज़ी की
ताकत देता है।
अगर
प्रस्तावित बदलाव वाकई
बेहतर हैं, तो उनसे डर
क्यों?
उन्हें
भारत की संसद में क्यों
नहीं लाया जाता?
खुली बहस क्यों
नहीं होती? सरकार
यह क्यों नहीं
बताती कि नए नियम गरीबों
की ज़िंदगी कैसे
सुधारेंगे? यही लोकतंत्र
की बुनियादी शर्त
है।
लेकिन
यहाँ बहस से जानबूझकर बचा जाता
है। संसद सत्र
हंगामे में डुबो
दिए जाते हैं।
फैसले ऊपर से थोपे जाते
हैं। नीतियाँ तर्क
से नहीं, संख्या
बल से पास कराई जाती
हैं।
अब
जिम्मेदारी सिर्फ़ प्रधानमंत्री
तक सीमित नहीं
रही।
नीतीश
कुमार और एन. चंद्रबाबू नायडू जैसे
नेता खुद को मजबूर दर्शाने
का नाटक नहीं
कर सकते। वे
दर्शक नहीं हैं,
वे सत्ता के
संतुलन को तय करने वाले
खिलाड़ी हैं। राष्ट्रीय
जनतांत्रिक गठबंधन में
उनकी भूमिका निर्णायक
है। चाहें तो
वे इस सरकार
को जवाबदेह बना
सकते हैं। चाहें
तो समर्थन वापस
लेकर सब कुछ रोक सकते
हैं।
उन्होंने
ऐसा न करने का फैसला
किया है।
नरेंद्र
मोदी को बिना शर्त समर्थन
देकर वे उसके हर फैसले
के भागीदार बन
जाते हैं। यह राजनीतिक चतुराई नहीं
है। यह लोकतांत्रिक
जिम्मेदारी से पलायन
है।
इस
व्यवहार के सिर्फ़
दो कारण हो सकते हैं:
डर या लालच।
और दोनों ही
लोकतंत्र के लिए
ज़हरीले हैं।
डर
तानाशाही को बढ़ने
देता है। लालच
उसे सामान्य बना
देता है। कोई नेता चुप
इसलिए रहे कि उस पर
कार्रवाई का डर
है या इसलिए
कि सत्ता और
फायदे बने रहें,
इससे जनता की तकलीफ कम
नहीं होती। नतीजा
एक ही होता है—बेलगाम
सत्ता, खोखली संस्थाएँ
और शोर में तब्दील संसद।
“अंदर
रहकर प्रभाव डालने”
का तर्क अब खोखला हो
चुका है। न कार्यपालिका की मनमानी
पर रोक लगी,
न संसदीय मर्यादा
बची, न जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग
का विरोध हुआ,
न संघीय ढाँचे
की रक्षा। जो
प्रभाव शून्य परिणाम
दे, वह प्रभाव
नहीं, बहाना होता
है।
यह
असहायता नहीं है।
यह एक सचेत चुनाव है।
संसद
के भीतर यह सड़ांध साफ़
दिखती है। विपक्ष
की आवाज़ दबाई
जाती है। बहस की जगह
हंगामा होता है।
अध्यक्ष मौन रहते
हैं। प्रधानमंत्री भाषण
देकर निकल जाते
हैं, सवालों से
बचते हैं। राहुल
गांधी जैसे नेताओं
पर व्यक्तिगत हमले
होते हैं, नीतियों
पर चर्चा नहीं।
इसकी
कीमत हमेशा वही
लोग चुकाते हैं
जिनके पास सबसे
कम ताकत है।
ग्रामीण
मज़दूर, दिहाड़ी कामगार
और हाशिए पर
खड़े समुदाय अपनी
सुरक्षा खो देते हैं। उनके
लिए रखा गया पैसा लुट
जाता है। जो योजनाएँ सम्मान देती
थीं, उन्हें कमजोर
कर दिया जाता
है। जहाँ बहस
मरती है, वहाँ
भ्रष्टाचार फलता-फूलता
है।
लोकतंत्र
सिर्फ़ उन लोगों
से नहीं मरता
जो उस पर हमला करते
हैं। वह उनसे भी मरता
है जो उसे बचा सकते
थे, लेकिन डर
या लालच के कारण चुप
रहे।
जो
नेता एक जवाबदेह
सरकार गिरा सकते
हैं और फिर भी कुछ
नहीं करते, वे
निर्दोष नहीं हैं।
वे सह-अपराधी
हैं। और इतिहास
सह-अपराधियों को
माफ़ नहीं करता।
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