SIR और भारत की चुनावी प्रणाली की विश्वसनीयता पर उठते सवाल

 

SIR और भारत की चुनावी प्रणाली की विश्वसनीयता पर उठते सवाल

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English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2025/12/the-fight-over-sir-and-credibility-of.html

स्पेशल समरी रिविजन को लेकर उठे सवालों ने मतदाता सूची की सटीकता और भारत की चुनावी संस्थाओं के कामकाज पर गंभीर चर्चा खड़ी कर दी है। जो प्रक्रिया तकनीकी अद्यतन के रूप में शुरू हुई थी, वह अब शासन, राजनीतिक प्रभाव और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर व्यापक बहस में बदल गई है। संसद के भीतर हुई घटनाएं, चुनाव आयोग द्वारा साझा किया गया डेटा, और सत्ता तथा विपक्ष दोनों की प्रतिक्रियाएं इस विवाद को सामान्य राजनीतिक खींचतान से आगे ले गई हैं।

संसदीय बहस के दौरान सबसे ज्यादा ध्यान स्पीकर के व्यवहार पर गया। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष को कई बार बिना किसी आवश्यक प्रक्रिया के बीच में रोका और बारबार भाषण को दिशा बदलने की कोशिश की, जबकि समय आधिकारिक रूप से विपक्ष के नाम आवंटित था। यह सब लाइव प्रसारण में साफ दिखाई दिया, और इससे यह धारणा मजबूत हुई कि कार्यवाही को सत्ता पक्ष के पक्ष में मोड़ा जा रहा है। स्पीकर, जो भाजपा पृष्ठभूमि से आते हैं, ने तटस्थता का दावा नहीं किया और ही इस आरोप को खारिज किया।

विपक्ष का मुख्य तर्क चुनाव आयोग के अपने डेटा पर आधारित था। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों के अनुसार, बिहार में मतदाता सूची में अवैध प्रवासियों के एक भी नाम की पहचान नहीं हुई, जबकि सरकार लगातार दावा कर रही थी कि एसआईआर इसी उद्देश्य से लागू किया गया। इसके बावजूद सड़सठ लाख से अधिक नाम सूची से हटा दिए गए। विपक्ष ने कहा कि यह आरोप नहीं, बल्कि आयोग द्वारा दिए गए आधिकारिक कागजी रिकॉर्ड के अध्ययन का परिणाम है।

इसी डेटा से उन्होंने कई गड़बड़ियां भी उजागर कीं। हरियाणा में एक ही नाम बाईस बार दर्ज पाया गया। एक महिला का नाम एक ही क्षेत्र में दो सौ से अधिक बार सूची में दिखाई दिया। और ऐसे पैटर्न पहचाने गए जो मतदाता सूची में कृत्रिम बदलाव के तरीकों से मेल खाते हैं। विपक्ष का कहना था कि ये तथ्य आयोग के स्वयं के दस्तावेजों से निकाले गए हैं, इसलिए इन्हें राजनीतिक कल्पना बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।

बहस के दौरान एक और जटिल मुद्दा सामने आया। जबकि आयोग को कोई रोहिंग्या या विदेशी मतदाता नहीं मिला, उसे ऐसे नाम अवश्य मिले जो कानूनी रूप से किसी अन्य राज्य के मतदाता थे लेकिन नए क्षेत्रों में मतदाता सूची में शामिल किए गए थे। विपक्ष का दावा था कि यह गलती नहीं है बल्कि एक व्यवस्थित राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसके तहत विभिन्न राज्यों से वैध मतदाताओं को स्थानांतरित कर ऐसी जगहों पर शामिल किया गया जहां चुनाव परिणाम बदल सकते थे। विपक्ष ने भाजपा को चुनौती दी कि यदि वह इन आरोपों को गलत मानती है तो अदालत में मामला दायर करे ताकि साक्ष्यों की न्यायिक जांच हो सके।

भाजपा ने इन सभी आरोपों को खारिज किया, लेकिन कोई ठोस प्रतिदस्तावेज पेश नहीं किया। प्रतिक्रियाएं भावनात्मक तो थीं, पर तथ्य आधारित नहीं। विपक्षी सांसदों का कहना था कि यह तरीका अब नियमित हो चुका है। जब भी सबूत सामने आते हैं, सत्ता पक्ष कुछ दिन तक शोर मचाता है और फिर संस्थागत खामोशियों पर भरोसा कर विवाद को ठंडा पड़ने देता है।

बहस की मीडिया कवरेज सीमित रही। विपक्ष ने पहले ही कहा था कि मुख्य धारा का मीडिया सबसे महत्वपूर्ण हिस्से नहीं दिखाएगा, और काफी हद तक यही हुआ। प्रमुख चैनलों ने राजनीतिक टकराव को दिखाया, लेकिन आयोग के दस्तावेजों से उठाए गए डेटा-आधारित सवालों पर चर्चा नहीं की। विपक्ष का कहना है कि व्यापक सार्वजनिक जानकारी होने पर यह मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श को बदल सकता है।

बहस के दौरान राहुल गांधी ने संस्थागत ढांचे को लेकर भी गंभीर मुद्दे उठाए। उन्होंने एक क्रमबद्ध विवरण पेश किया कि कैसे वर्षों में प्रमुख पदों पर वैचारिक रूप से पूर्वाग्रही नियुक्तियां की गईं। इस पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन गांधी ने अपनी बात रखी और मंत्री अंततः पीछे हट गए। अन्य विपक्षी नेताओं ने चुनिंदा कॉरपोरेट समूहों को मिली कथित रियायतों को भी इस बहस से जोड़ा, जिनमें संजय सिंह द्वारा दिया गया वह उदाहरण भी शामिल था जिसमें विशाल मूल्य की भूमि को प्रतीकात्मक कीमत पर आवंटित किया गया था। विपक्ष ने इसे शासन में व्यापक ढांचे की समस्या का हिस्सा बताया।

तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने भी सीधे चुनाव आयोग से जवाब मांगा। उन्होंने पूछा कि यदि सड़सठ लाख नाम हटाना उचित था, तो अवैध मतदाता कहां हैं। जब स्पीकर ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की, तो सांसद ने स्पष्ट रूप से अपनी बात पूरी करने का अधिकार मांगा और स्पीकर ने अंततः उन्हें बोलने दिया।

पूरी बहस के दौरान विपक्ष के वक्तव्य दस्तावेजी जानकारी पर आधारित थे, जबकि सत्ता पक्ष की प्रतिक्रियाएं सामान्य दावों तक सीमित रहीं। इस अंतर ने जनता का ध्यान और अधिक खींचा। विपक्ष का मानना है कि सत्ता पक्ष का डेटा पर प्रतिक्रिया देना इस समझ से आता है कि इन खुलासों के बाद भी कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जाएगा।

विवाद का सार यह है कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता किसी भी लोकतंत्र की नींव होती है। यदि मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर बदलाव बिना स्पष्ट और पारदर्शी कारणों के किए जाएं, तो चुनाव परिणामों पर भरोसा कमजोर पड़ता है। लोकतंत्र केवल वोट डालने पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस पर भी कि उन वोटों की सही गिनती और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व हो। एसआईआर पर उठा विवाद इस सिद्धांत को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ले आया है, और इसका समाधान यह निर्धारित करेगा कि जनता भारत की संस्थाओं को कितना विश्वसनीय मानती है।

भारत में आज भी यह क्षमता मौजूद है कि वह अपने चुनावी ढांचे को पारदर्शी और भरोसेमंद बनाए रखे। आगे का रास्ता इस पर निर्भर करेगा कि संस्थाएं किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं और जनता कितनी स्पष्टता की मांग करती है।


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