झूठ, डर और नकली पीड़ित होने की राजनीति

 

झूठ, डर और नकली पीड़ित होने की राजनीति

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2026/01/the-politics-of-lies-fear-and.html

भारतीय जनता पार्टी ने एक बेहद खतरनाक राजनीतिक कला में महारत हासिल कर ली है। सत्ता में रहते हुए खुद को पीड़ित बताना। संस्थानों पर कब्ज़ा करके भी उत्पीड़न का रोना रोना। और खुलेआम झूठ बोलते हुए ईमानदारी का दावा करना।

यह विरोधाभास कोई संयोग नहीं है। यही भारतीय जनता पार्टी की राजनीति की बुनियाद है।

पार्टी के नेता बड़े-बड़े दावे पूरे आत्मविश्वास के साथ करते हैं, चाहे उनका ज़मीनी सच्चाई से कोई लेना-देना हो। इन दावों कोसचमें बदलने का काम गोदी मीडिया करता है, जो उन्हें इतनी बार दोहराता है कि जनता उन्हें ईश्वरवाणी मानने लगती है। बार-बार बोला गया झूठ, सच जैसा सुनाई देने लगता है।

इसका सबसे शर्मनाक उदाहरण अमित शाह का वह दावा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि सोलह साल की लड़की भी अगर भारी सोने के गहने पहनकर आधी रात को सड़क पर चले, तो कोई उसे छूने की हिम्मत नहीं करेगा। वहीं योगी आदित्यनाथ ने यह तक कह दिया कि उत्तर प्रदेश में अगर कोई लड़की को नुकसान पहुँचाएगा, तो अगले चौराहे पर यमराज उसका इंतज़ार कर रहे होंगे, मानो अपराध पूरी तरह खत्म हो चुका हो।

हक़ीक़त इससे बिल्कुल उलट है।

उत्तर प्रदेश में बलात्कार और हत्या के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। कई मामलों में पीड़ितों को जला दिया गया, सबूत मिटाए गए और परिवारों को डराया-धमकाया गया। न्याय संयोग से नहीं छूटा, बल्कि जानबूझकर रोका गया। कई बार राज्य की मशीनरी अपराधियों के बजाय पीड़ित परिवारों को ही सज़ा देने में जुटी दिखी। यही सच्चाई अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के खोखले दावों को बेनकाब करने के लिए काफी है।

इसके बाद आते हैं राज्य द्वारा किए गए अपराध। हिरासत में मौतें, फर्जी मुठभेड़ और बिना सुनवाई के हत्याएँ। ये मज़बूत कानून-व्यवस्था के संकेत नहीं हैं। ये उस सरकार की पहचान हैं जो क़ानून से डरती है।

यही तस्वीर अब दिल्ली में भी दिख रही है। रेखा गुप्ता लगातार यह बताने में लगी हैं कि उनकी सरकार ने कितना काम किया है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और कहती है। चुनावी वादे पूरे नहीं हुए। जो सुविधाएँ लोगों को मिल रही थीं, उन्हें वापस ले लिया गया। बचा है तो सिर्फ़ भाषण और आत्मप्रशंसा।

भारतीय जनता पार्टी इतनी सहजता से झूठ बोलती है, जैसे सच ही बोल रही हो। इससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि अब पार्टी के भीतर से ही भ्रष्टाचार की बातें खुलकर सामने रही हैं। महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए पचास करोड़ रुपये में विधायकों की खरीद-फरोख्त की बात खुद पार्टी के नेताओं ने मानी है। यह विपक्ष का आरोप नहीं है। यह अंदरूनी स्वीकारोक्ति है।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर भी दरारें साफ़ दिखने लगी हैं। ललन सिंह जैसे नेता खुले मंच से नरेंद्र मोदी की ईमानदारी और साहस पर सवाल उठा चुके हैं। जब सहयोगी वही कहने लगें जो विपक्ष वर्षों से कहता रहा है, तो समस्या छवि की नहीं रहती, भरोसे की बन जाती है।

संवैधानिक संस्थाएँ भी गंभीर दबाव में हैं। भारत का निर्वाचन आयोग के भीतर से हो रहे इस्तीफे उन आरोपों को और मज़बूत करते हैं, जो विपक्ष लंबे समय से लगाता रहा है। वहीं चुनाव नज़दीक आते ही प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो अचानक सक्रिय हो जाते हैं। विपक्षी नेताओं पर आरोप लगाए जाते हैं, मीडिया ट्रायल चलता है, और माहौल जानबूझकर गंदा किया जाता है। यही तरीका भारतीय जनता पार्टी पिछले तीन वर्षों से लगातार अपनाती रही है।

उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और कई अन्य राज्यों में लोग सड़कों पर उतर चुके हैं। ये विरोध किसी के इशारे पर नहीं हो रहे। ये गुस्से, थकान और अपमान की आवाज़ हैं। ये उन नागरिकों की प्रतिक्रिया हैं, जो खुद को ठगा हुआ और अनसुना महसूस कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में हार की आशंका को देखते हुए पार्टी ने अभी से पीड़ित होने का नाटक शुरू कर दिया है। एक तरफ़ रोना, दूसरी तरफ़ पूरे तंत्र का दुरुपयोग। उम्मीद वही पुरानी है कि डर, भ्रम और झूठ एक बार फिर लोकतांत्रिक इच्छा को कुचल देंगे।

लेकिन अब कुछ बदल रहा है।

अब लोग खुलकर कहने लगे हैं कि देश को इस चक्र से बाहर निकालना होगा। मोदी से आगे देखने की माँग तेज़ हो रही है। भारत को किसी प्रचार से गढ़े गए नेता की ज़रूरत नहीं है। देश को ऐसे नेता की ज़रूरत है जो ऐसे परिवार से आता हो, जिसका इतिहास भारत की अखंडता और संप्रभुता पर उठी हर चुनौती के सामने डटकर खड़े रहने का रहा हो। जो बलिदान से निकला हो, नारों से नहीं।

भारत को ऐसा नेतृत्व चाहिए जो जनता के लिए काम करे, कि अडानी समूह और रिलायंस इंडस्ट्रीज़ जैसी चंद कंपनियों के लिए। जो वैश्विक ताकतों के सामने झुके नहीं, और देश के भीतर सत्ता के सामने बिके नहीं।

भारत को सच, जवाबदेही और साहस पर आधारित नेतृत्व चाहिए। प्रचार नहीं। डर नहीं। और ऐसी पार्टी बिल्कुल नहीं, जो सत्ता में रहते हुए खुद को पीड़ित बताकर पूरे देश को बंधक बना ले।

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