जब आराम अंतरात्मा की जगह ले लेता है और सत्ता विभाजन सीख लेती है

 

जब आराम अंतरात्मा की जगह ले लेता है और सत्ता विभाजन सीख लेती है

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2026/01/when-comfort-replaces-conscience-and.html

पिछले कुछ दिनों में ट्विन सिटीज़ में इमिग्रेशन और कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) की गतिविधियों ने एक बार फिर इस बात की ओर ध्यान खींचा है कि सत्ता किस दिशा में आगे बढ़ रही है सिर्फ़ मिनेसोटा में, बल्कि पूरे देश में। ये कार्रवाइयाँ अलग-थलग घटनाएँ नहीं हैं। ये उस व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं जो डर, विभाजन और चुनिंदा सख़्ती के ज़रिए सत्ता को मज़बूत करती है, जबकि आम लोगों की वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाती है।

इतिहास बताता है कि समाज अक्सर अचानक नहीं गिरते। वे धीरे-धीरे अपनी नैतिक दिशा खोते हैं तब, जब लोग इतने आरामदायक हो जाते हैं कि सत्ता से सवाल करना छोड़ देते हैं। भ्रष्टाचार सामान्य लगने लगता है। अन्याय को तर्कों से ढक दिया जाता है। नागरिक जवाबदेही माँगने के बजाय पहचान की रक्षा में लग जाते हैं। यही वह जगह है जहाँ सत्ता बिना विरोध के काम करना सीख लेती है।

आज यही पैटर्न साफ़ तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत दोनों में दिखाई दे रहा है। राजनीतिक व्यवस्थाएँ अलग हैं, लेकिन नेतृत्व द्वारा अपनाई गई रणनीति लगभग एक जैसी है: लोगों को पहचान के आधार पर बाँट दो, ताकि वे शासन, असमानता और जवाबदेही जैसे कठिन सवाल पूछना बंद कर दें।

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं ने शिकायत, ग़ुस्से और डर पर टिकी राजनीति को सामान्य बना दिया है। प्रवासियों, अल्पसंख्यकों, पत्रकारों और आलोचकों को ख़तरे के रूप में पेश किया जाता है, जबकि असली समस्याएँ महँगी स्वास्थ्य सेवा, कॉरपोरेट एकाधिकार, रुकी हुई मज़दूरी और टूटता सामाजिक भरोसा हाशिये पर चली जाती हैं। सच्चाई की जगह वफ़ादारी ले लेती है। नीति की जगह आक्रोश। लोगों से कहा जाता है कि वे राष्ट्र की एक कल्पना की रक्षा करें, कि उन लोगों के व्यवहार का सामना करें जो शासन कर रहे हैं।

भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी ऐसा ही बदलाव दिखता है, जहाँ धर्म और राष्ट्रवाद का इस्तेमाल यह तय करने के लिए किया जा रहा है कि कौनअपनाहै और कौन नहीं। सरकारी नीतियों की आलोचना को राष्ट्र या आस्था पर हमला बताकर पेश किया जाता है। असहमति देशद्रोह बन जाती है। अल्पसंख्यक आसान निशाने बनते हैं। इसी दौरान असमानता बढ़ती है और लोकतंत्र की रक्षा करने वाली संस्थाएँ कमज़ोर होती जाती हैं। पहचान एक बार फिर जवाबदेही से बचने की ढाल बन जाती है।

यह सब एक गहरी मानवीय प्रवृत्ति के कारण संभव होता है। जैसे ही जीवन थोड़ा आरामदेह होता है, लोग न्याय पर ध्यान देना छोड़ देते हैं और अपने अहंकार की रक्षा में लग जाते हैं। यह अहंकार समूह पहचान से बनता है राजनीतिक दल, धर्म, जाति, नस्ल, शिक्षा या धन। जब पहचान नैतिकता की जगह ले लेती है, तब सही और ग़लत का फर्क गौण हो जाता है।

इस प्रक्रिया में धर्म विशेष रूप से ख़तरनाक भूमिका निभाता है। लगभग सभी धर्म करुणा, विनम्रता और शांति की बात करते हैं। फिर भी लोग ईश्वर के नाम पर असाधारण हिंसा करने को तैयार हो जाते हैं उस ईश्वर के नाम पर जिसे परिपूर्ण और अज्ञेय कहा जाता है। किसी की शक्ल, खाना या सफलता पर टिप्पणी कीजिए, शायद हँसकर टाल दे। लेकिन उसके भगवान पर सवाल उठाइए, और प्रतिक्रिया आक्रामक हो सकती है। आस्था आध्यात्मिकता नहीं रहती, वह प्रभुत्व का औज़ार बन जाती है। परिपूर्णता भी प्रतियोगिता में बदल दी जाती है मेरा भगवान, मेरा राष्ट्र, मेरी पहचान तुमसे बेहतर है।

प्राचीन समाजों ने कभी प्रश्न करने के मूल्य को समझा था। जब वेद जैसे ग्रंथ रचे गए, तब संवाद को ख़तरा नहीं, ज़रूरत माना गया। ज्ञान बहस, अवलोकन और तर्क से विकसित हुआ। आधुनिक तकनीक के बिना भी लोगों ने चिकित्सा, शासन, व्यापार और दर्शन में प्रगति की। आध्यात्मिक खोज डर से नहीं, समझ से होती थी। जीवन संचय के प्रति कम आसक्त था, कृत्रिम कमी से कम ग्रस्त था, और दूसरों पर हावी होने की ज़रूरत से मुक्त था।

आधुनिक व्यवस्था ने इन मूल्यों को उलट दिया है। कमी को जानबूझकर पैदा किया जाता है। लोगों को प्रतीकों पर लड़ाया जाता है, जबकि कॉरपोरेशन चुपचाप धन निकालते रहते हैं। सरकारें तब फलती-फूलती हैं जब नागरिक पहचान पर बहस करते हैं, जवाबदेही की माँग नहीं। जो नेता समाज को बाँटते हैं, वे जनता से नहीं डरते वे एकता से डरते हैं।

यहीं डर शासन का औज़ार बन जाता है।अवैध प्रवासियोंको निशाना बनाने के नाम पर अमेरिका में प्रवर्तन अब सिर्फ़ इमिग्रेशन नीति तक सीमित नहीं रहा। ICE जैसी एजेंसियाँ अब क़ानून से ज़्यादा डर का प्रतीक बनती जा रही हैं। लक्ष्य सिर्फ़ लोगों को हटाना नहीं, बल्कि आवाज़ों को चुप कराना है।

मैं यह बात सिर्फ़ खबरों के आधार पर नहीं कह रहा। मैंने इसे नज़दीक से देखा है। एक श्वेत अमेरिकी व्यक्ति, जिसने कभी ट्रंप को वोट दिया था, बाद में उनका खुलकर विरोध करने लगा और मिनियापोलिस में एक रैली में शामिल हुआ। कुछ समय बाद ICE उसके घर पहुँची। वह तो अवैध प्रवासी है, ही अप्रवासी। उसका एकमात्रअपराधअसहमति था। यह दौरा संयोग था या चेतावनी अब इसका फ़र्क़ भी कम रह जाता है। संदेश साफ़ है: विरोध की क़ीमत होती है। जब प्रवर्तन एजेंसियाँ आलोचना को दबाने का औज़ार लगने लगती हैं, तो डर तेज़ी से फैलता है। लोग खुद को चुप करने लगते हैं सहमति से नहीं, भय से।

इसी तरह नैतिकता टूटती है। सिर्फ़ खुले दमन से नहीं, बल्कि उस ख़ामोश डर से जो लोगों को नज़रें फेरने पर मजबूर कर देता है। जब नागरिक सिद्धांत के बजाय भय के कारण सत्ता की रक्षा करने लगते हैं, तब लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाता है।

एक सच्चाई से बचा नहीं जा सकता। कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों हो जाए, इंसान होने की बुनियाद नहीं बदलती। दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति भी वही खाता है, वही साफ़ करता है, वही सोता है और वही प्रेम करता है जो बाकी लोग करते हैं। सत्ता माहौल बदलती है, मनुष्य नहीं। कोई नेता ईश्वर नहीं होता। कोई राष्ट्र त्रुटिहीन नहीं होता।

अमेरिका और भारत के सामने असली ख़तरा असहमति नहीं है। ख़तरा है आत्मसंतोष। जब लोग सरकार से सवाल करना छोड़ देते हैं और नेताओं को अपनी पहचान का विस्तार मानने लगते हैं, तब अंतरात्मा की जगह आराम ले लेता है। आस्था हथियार बन जाती है। राष्ट्रवाद बहाना बन जाता है। डर नीति बन जाता है।

समाज इसलिए नहीं गिरते कि लोग बुरे होते हैं। वे इसलिए गिरते हैं क्योंकि लोग इतने आरामदेह हो जाते हैं कि परवाह करना छोड़ देते हैं।

अब सवाल यह नहीं है कि नेता लोगों को बाँट रहे हैं या नहीं। वे बाँट रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या नागरिक इस विभाजन की रक्षा करते रहेंगे या इसे उसी रूप में पहचानेंगे जैसा यह है: जवाबदेही से डरने वालों द्वारा इस्तेमाल किया गया नियंत्रण का औज़ार।

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