जब नेतृत्व गरीबों के साथ खड़ा था: और आज भारत को इसकी फिर क्यों ज़रूरत है
जब नेतृत्व गरीबों के साथ खड़ा था: और आज भारत को इसकी फिर क्यों ज़रूरत है
एक समय था जब एक साधारण से वस्त्र में लिपटा हुआ व्यक्ति दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को हिला कर रख देता था। महात्मा गांधी के पास लगभग कुछ भी नहीं था, फिर भी पूरी दुनिया ने उनकी ओर ध्यान दिया। कुछ लोगों ने उन्हें दुनिया का सबसे ख़तरनाक आदमी कहा, इसलिए नहीं कि उनके हाथ में हथियार थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने भौतिक शक्ति और कॉरपोरेट दबाव को ठुकरा दिया था। ब्रिटिश सरकार को उनसे निपटना इसलिए असंभव लगता था क्योंकि गांधी का विश्वास साफ़ था कि किसी भी भौतिक लाभ से बढ़कर एक राष्ट्र की गरिमा होती है। गांधी ने यह सिद्ध किया कि नेतृत्व इस बात से नहीं आँका जाता कि कोई नेता अमीरों और ताकतवरों के बीच कितनी सहजता से उठता-बैठता है, बल्कि इस बात से आँका जाता है कि वह गरीबों और कमज़ोरों के साथ कितनी मज़बूती से खड़ा रहता है।
आज वही मानक बहुत दूर और धुंधला सा लगता है। भारत आज ऐसे नेतृत्व में है जो अपने आपको शून्य से उठकर आने वाला बताता है, लेकिन शासन प्रदर्शन और अति-भोग की भाषा में करता है, और गरीबों के साथ सामान्य मानवीय निकटता से भी असहज दिखाई देता है। सत्ता अब सेवा नहीं रही, वह एक मंच बन चुकी है। धन योग्यता का प्रमाण बन गया है। आम लोगों से दूरी को अधिकार समझ लिया गया है। ऐसे माहौल में राहुल गांधी का मज़ाक उड़ाना और उन्हें अप्रभावी बताना आसान ही नहीं, बल्कि फैशन बन गया है। कभी मैं भी इस सोच का हिस्सा था। लेकिन पिछले तीन वर्षों में, विशेषकर देश भर में की गई उनकी लंबी यात्रा के दौरान उन्हें नज़दीक से देखने के बाद, यह स्पष्ट हो गया है कि राहुल गांधी एक राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी जगह पहले ही बना चुके हैं।
वह महात्मा गांधी नहीं हैं, और न ही ऐसा दावा करते हैं। फिर भी उनमें एक शांत सरलता है, जो आज की भारतीय राजनीति में दुर्लभ होती जा रही है। जब राहुल गांधी लोगों के साथ चलते हैं, मज़दूरों के साथ ज़मीन पर बैठते हैं, या बिना कैमरों के दबाव के किसानों की बात सुनते हैं, तो वह जुड़ाव बनावटी नहीं लगता। उनकी यात्रा के दौरान न कोई सुरक्षा की दीवार थी, न काँच के घेरे, न ही चुनी हुई भीड़। लोग उनसे खुलकर बोले, और उससे भी ज़्यादा अहम बात यह थी कि उन्हें सुना गया। भरोसा किसी बड़े वादे से नहीं बना, बल्कि इसलिए बना क्योंकि वह वहाँ मौजूद थे, धैर्य से सुन रहे थे, और समझने को तैयार थे। वह विरोधियों को नीचा दिखाकर या नागरिकों को दुश्मन बनाकर सुर्खियाँ नहीं बटोरते। उनकी राजनीति डर के बजाय भरोसे पर, धमकी के बजाय समावेशन पर टिकी है। यह कमज़ोरी के संकेत नहीं हैं, यह परिपक्व नेतृत्व के संकेत हैं।
लेकिन असली विफलता किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने खुद को कमज़ोर किया, जब उसने उन भ्रष्ट चेहरों को पकड़े रखा जिनकी नैतिक विश्वसनीयता बहुत पहले खत्म हो चुकी थी। निष्ठा को ईमानदारी से ऊपर रखा गया, और जवाबदेही को लगातार टाल दिया गया। पार्टी को भीतर से नुकसान पहुँचाने के बावजूद, इन्हें विरासत या सुविधा के नाम पर बचाया जाता रहा। कांग्रेस का पुनर्निर्माण कोई जटिल काम नहीं है, लेकिन इसके लिए साहस चाहिए। कुछ रिश्ते तोड़ने होंगे। कुछ फैसले बिना डर के लेने होंगे। अगर राहुल गांधी को प्रभावी नेतृत्व करना है, तो पार्टी को उन लोगों को ढाल देना बंद करना होगा जो जनता के भरोसे को खोखला करते हैं, और स्पष्ट रूप से नैतिक शासन के साथ खड़ा होना होगा।
बौद्धिक क्षमता और मानवीय संभावनाओं के लिहाज़ से भारत दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। संसाधन, प्रतिभा और आकार के बल पर वह जो चाहे हासिल कर सकता है। फिर भी नेतृत्व का बड़ा हिस्सा आज भी नियंत्रण की एक पुरानी सोच में फँसा हुआ है, जहाँ कुछ अमीर तबके फलते-फूलते हैं और करोड़ों लोगों को निर्भर और आज्ञाकारी बनाए रखते हैं। फासीवाद का यह आधुनिक रूप किसी राष्ट्र को मज़बूत नहीं करता, बल्कि उसे भीतर से खोखला करता है। जवाहरलाल नेहरू इन जमी हुई शक्ति संरचनाओं से सीधे टकराने में हिचके, जबकि वल्लभभाई पटेल ने उनके ख़तरे को समझा और निर्णायक कार्रवाई की। यही कारण है कि आज भी कई लोग मानते हैं कि अगर इतिहास ने अवसर दिया होता, तो पटेल एक अधिक मज़बूत प्रधानमंत्री साबित होते।
भारत का विशाल आकार और जनसंख्या केंद्रीकृत घमंड को और भी ख़तरनाक बना देती है। दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश को डर, निगरानी और गढ़ी हुई सहमति के ज़रिये चलाना नेतृत्व नहीं है, वह सिर्फ़ नियंत्रण है। आज की सत्तारूढ़ पार्टी इसलिए सत्ता में नहीं है कि उसने जनता का अपार विश्वास अर्जित किया है, बल्कि इसलिए है क्योंकि चुनावी प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से कमज़ोर किया गया है। लोकतंत्र की रक्षा करने वाली संस्थाएँ प्रभावित की गई हैं, विपक्ष की आवाज़ों को परेशान किया गया है, और चुनावों को इस तरह मोड़ा गया है कि नतीजे पहले से तय दिखें। अगर लोकतांत्रिक मानदंडों का यह क्षरण न होता, तो मौजूदा सरकार केवल अपने प्रदर्शन के बल पर टिक नहीं पाती।
विडंबना यह है कि भारत आज फिर एक ऐसे दौर का सामना कर रहा है जो औपनिवेशिक शासन से डरावनी समानता रखता है। तब विदेशी शासक देश की संपत्ति निकाल ले जाते थे। आज वही काम घरेलू कॉरपोरेट हित कर रहे हैं, अक्सर सरकार के खुले समर्थन के साथ। पैसा बाहर जाता है, मुनाफ़ा विदेशों में खर्च होता है, और बोझ आम भारतीयों के कंधों पर छोड़ दिया जाता है। समाज का एक मुखर और वफ़ादार हिस्सा जानबूझकर नज़र फेर लेता है, और सरकार को खुली छूट दे देता है। ऐसे समय में चुप्पी तटस्थता नहीं होती, वह सहभागिता होती है।
अन्ना हज़ारे का इस्तेमाल भले ही राजनीतिक ताकतों ने किया हो, लेकिन उनके मूल संदेश को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए था। भ्रष्टाचार संस्थाओं, अर्थव्यवस्था और जनता के भरोसे को भीतर से सड़ा देता है। INDIA गठबंधन को बिना किसी झिझक के भ्रष्टाचार-मुक्त भारत की प्रतिबद्धता दिखानी होगी, भले ही उसका अपना अतीत इसे असहज बनाता हो। देर से ही सही, पर शुरुआत ज़रूरी है। अगर भारत अपनी विशाल छिपी हुई अर्थव्यवस्था को पारदर्शी और ईमानदार तरीके से औपचारिक व्यवस्था में ले आए, तो बदलाव अभूतपूर्व होगा। कुछ ही वर्षों में अर्थव्यवस्था का आकार आठ से नौ ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। यह कोई कल्पना नहीं है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, विश्वसनीय अर्थशास्त्री और प्रचार के बजाय तथ्यों पर काम करने वाले नेता चाहिए।
जो देश केवल कच्चा माल बेचते हैं, वे जल्दी ताकतवर नहीं बनते। जो देश कच्चे माल को तैयार उत्पादों में बदलते हैं, वही वैश्विक अर्थव्यवस्था को दिशा देते हैं। अगर भारत ऐसा देश बनता है जो केवल संसाधन निकालने के बजाय निर्माण, नवाचार और मूल्य-वर्धन पर ध्यान देता है, तो गरीबी पीछे हटने लगेगी और भारत का उत्थान निर्विवाद होगा। देश के पास न प्रतिभा की कमी है, न संसाधनों की। कमी है ऐसे नेतृत्व की, जो दिखावे पर गरिमा को, सुविधा पर न्याय को, और सत्ता पर जनता को प्राथमिकता दे। राहुल गांधी ने यह दिखाया है कि वह इस ज़िम्मेदारी को समझते हैं।
यह वही सबक था जो एक साधारण से वस्त्र में लिपटे व्यक्ति ने दुनिया को सिखाया था। अब भारत को तय करना है कि वह उस सबक की रक्षा करने को तैयार है या नहीं, तब भी जब सत्ता उसे मिटाने की कोशिश करे।
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