भारत का सर्कस लायन प्रधानमंत्री: राजा की तरह पूजे गए, कलाकार की तरह प्रशिक्षित
भारत का सर्कस लायन प्रधानमंत्री: राजा की तरह पूजे गए, कलाकार की तरह प्रशिक्षित
भारत
ने अपने इतिहास
में नरेंद्र मोदी
जैसा डरपोक, टालमटोल
करने वाला और बाहरी ताकतों
के इशारों पर
चलने वाला प्रधानमंत्री
कभी नहीं देखा।
बारह साल से ज़्यादा सत्ता में
रहने के बावजूद
उन्होंने एक बार
भी खुली, बिना
स्क्रिप्ट की प्रेस
कॉन्फ़्रेंस का सामना
नहीं किया। एक
बार भी नहीं।
कोई भी सच्चा
लोकतांत्रिक नेता दस
साल से ज़्यादा
समय तक सवालों
से नहीं भागता।
यही एक सच्चाई
उनकी सावधानी से
गढ़ी गई छवि की कमजोरी
उजागर करने के लिए काफ़ी
है।
ताक़त
को जांच से डर नहीं
लगता। मोदी को लगता
है।
फिर
भी उनकी पार्टी
और अंधभक्ति में
डूबे समर्थक उन्हें
“वह शेर बताते
हैं जिससे पूरी
दुनिया डरती है।”
इस दावे का ज़बरदस्त मज़ाक उड़ाया
गया, क्योंकि आम
लोग भी सच्चाई
देख सकते हैं।
अगर मोदी शेर
हैं, तो वह जंगल का
शेर नहीं है।
वह सर्कस का
शेर है। शोर मचाने वाला।
प्रशिक्षित। सजावटी। ताक़तवर सिर्फ़
तब, जब उसे निर्देश दिया जाए।
जो पट्टा पकड़ने
वालों की आज्ञा
मानता है।
यह
कोई प्रभाव जमाने
के लिए गढ़ा
गया रूपक नहीं
है। यह उनके शासन
का सबसे सटीक
वर्णन है।
सर्कस
का शेर शिकार
नहीं करता। वह
प्रदर्शन करता है।
संकेतों पर चलता है। अपने
मालिकों को खुश रखकर ज़िंदा
रहता है। मोदी
की ताक़त साहस,
बहस या नीतिगत
सफलता से नहीं आती। वह
तमाशे, प्रचार और
डर के ज़रिये
थोपी गई चुप्पी
से आती है। सवाल उठते
हैं तो वह पानी पीते
हैं। जवाबदेही मांगी
जाती है तो ग़ायब हो
जाते हैं। संसद
में चुनौती मिलती
है तो संवाद
से भागते हैं।
असहमति तेज़ होती
है तो संस्थाओं
को हथियार बना
दिया जाता है।
इस
सर्कस के संचालक
छिपे नहीं हैं।
देश के भीतर मोदी का
राजनीतिक अस्तित्व गौतम अडानी
और मुकेश अंबानी
जैसे कॉरपोरेट दिग्गजों
की आर्थिक और
संस्थागत मदद से
जुड़ा हुआ है। चुनाव महंगे
होते हैं। मीडिया
पर क़ब्ज़ा महंगा
होता है। जांच
को दबाना महंगा
होता है। यह पैसा हवा
से नहीं आया।
यह उन कंपनियों
से आया जिन्हें
बाद में सार्वजनिक
संपत्तियाँ, ढीले नियम
और करदाताओं के
पैसे से बने अवसर इनाम
में मिले।
यह
शासन नहीं है। यह
सौदा है।
सर्कस
का शेर अपना
प्रदर्शन खुद नहीं
चुनता। वह वही करता
है, जो उसे करने को
कहा जाता है।
अंतरराष्ट्रीय
मंच पर भी यही कमजोरी
दिखती है। विपक्षी
नेताओं ने खुले तौर पर
मोदी को डोनाल्ड
ट्रंप के प्रति
झुका हुआ बताया
है, और वैश्विक
मंच पर उनका व्यवहार इस बात को और
मज़बूत करता है।
यह भारत के पुराने नेतृत्व
से शर्मनाक तुलना
है। 1971 में बांग्लादेश
मुक्ति युद्ध के
दौरान इंदिरा गांधी
ने पश्चिमी दबाव
के सामने झुकने
से इनकार कर
दिया था, भले ही रिचर्ड
निक्सन उनसे खुलकर
नफरत करता था।
भारत को सम्मान
इसलिए मिला क्योंकि
उसका नेता झुका
नहीं।
मोदी
चुपचाप झुक जाते
हैं और फिर ऐसे दिखाते
हैं जैसे कुछ
हुआ ही नहीं।
चीन
के साथ सीमा
तनाव के समय भी उन्होंने
यही किया, एक
ऐसा विषय जिसे
बीजेपी पूरी कोशिश
से चुप्पी में
दबाए रखना चाहती
है। भारत की परमाणु क्षमता
और सैन्य ताक़त
के बावजूद सरकार
ने पारदर्शिता और
जवाबदेही से परहेज़
किया। एक मज़बूत
नेता मुश्किल फ़ैसलों
को जनता को समझाता है।
एक कमज़ोर नेता
नारे और नियंत्रित
मीडिया के पीछे छिप जाता
है।
आर्थिक
मोर्चे पर, मोदी
का कार्यकाल बड़े
वित्तीय अपराधों के
उछाल के साथ जुड़ा रहा।
अरबपति अरबों रुपये
लेकर देश से भाग गए
और जांच एजेंसियाँ
सोती रहीं। जब
राहुल गांधी ने
सार्वजनिक रूप से
भ्रष्टाचार के पैटर्न
पर सवाल उठाए
और “मोदी” उपनाम
को लूटे गए धन से
जोड़ा, तो जवाब तर्क का
नहीं बल्कि बदले
का था। क़ानूनी
कार्रवाई तभी शुरू
हुई जब राहुल
गांधी की राजनीतिक
पकड़ मज़बूत होने
लगी। यह संयोग
नहीं था। यह डर था।
यह
शेर का व्यवहार
नहीं है। यह उस
कलाकार का व्यवहार
है जो तालियाँ
बंद हो जाने से डरता
है।
मोदी
एक ही चीज़ में माहिर
हैं: उपदेश देने
में। वह बिना संवाद किए
बोलते रहते हैं।
धुंधले बयान देते
हैं, जिन्हें गोदी
मीडिया बाद में महान विचारों
में बदलने की
कोशिश करता है।
लेकिन भाषण नेतृत्व
नहीं होते। एकालाप
शासन नहीं होते।
और प्रचार ताक़त
नहीं होता।
जब
इतिहास पार्टी के
प्रवक्ताओं के बजाय
स्वतंत्र इतिहासकार लिखेंगे, तो
मोदी को एक निर्णायक राजनेता के
रूप में याद नहीं किया
जाएगा। उन्हें उस
प्रधानमंत्री के रूप
में याद किया
जाएगा जिसने प्रेस
से दूरी बनाई,
लोकतांत्रिक संस्थाओं को खोखला
किया, राष्ट्रीय संपत्तियाँ
दोस्तों को सौंपीं,
विरोधियों को डर
से चुप कराया,
और पैसे, हेरफेर
व नफ़रत के
ज़रिये सत्ता में
बना रहा।
उन्हें
किसी जागरूक राष्ट्र
ने स्वतंत्र रूप
से नहीं चुना। उन्हें
कुछ लोगों ने
चुना और बनाए रखा, जिन्होंने
उनके चुनाव, उनका
पैसा और उनकी चुप्पी संभाली।
शेर
सम्मान अपने दम पर कमाता
है। सर्कस का शेर
आदेश मानकर ज़िंदा
रहता है।
भारत को एक नेता चाहिए था। उसे एक प्रदर्शन मिला।
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