जब अहंकार शासन पर हावी हो जाता है: कैसे राष्ट्र अपना नैतिक दिशा-सूचक खो देते हैं

 

जब अहंकार शासन पर हावी हो जाता है: कैसे राष्ट्र अपना नैतिक दिशा-सूचक खो देते हैं

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लोकतंत्र अक्सर एक झटके में नहीं गिरते। वे धीरे-धीरे कमजोर होते हैं, जब जिम्मेदारी की जगह अहंकार ले लेता है। सार्वजनिक पद स्वामित्व नहीं, एक जिम्मेदारी है। नेताओं को संस्थाओं को मजबूत करने और जनता की सेवा करने के लिए अस्थायी अधिकार दिया जाता है। लेकिन जब अहंकार हावी हो जाता है, तो फैसले तर्क और दीर्घकालिक जनहित से हटकर छवि, आवेग और राजनीतिक अस्तित्व के आधार पर लिए जाने लगते हैं। कानून हथियार बन जाते हैं। संस्थाएँ ढाल बन जाती हैं। आलोचना को देशद्रोह की तरह देखा जाने लगता है।

नागरिक इस बदलाव को जल्दी महसूस कर लेते हैं। वह शिक्षक, वह उद्यमी, वह छात्र जिसने योग्यता और मेहनत पर भरोसा किया था, सोचने लगता है अगर ईमानदारी से सफलता नहीं मिलती, तो क्या कोई शॉर्टकट है? यही सवाल नैतिक गिरावट की शुरुआत है।

आत्मसम्मान मेहनत, योगदान और जवाबदेही से पैदा होता है। अहंकार हक जताता है। आत्मसम्मान कहता है, “मुझे इस भरोसे के योग्य बनना है।अहंकार कहता है, “मुझे यह पद मिलना ही चाहिए।जब अहंकार शासन करता है, तो योग्यता की जगह वफादारी और परिश्रम की जगह प्रभाव ले लेता है। भ्रष्टाचार चौंकाता नहीं, व्यावहारिक लगने लगता है।

लोकतंत्र में अहंकार खुलकर सामने नहीं आता। वह वैधता खोजता है। धर्म एक आसान माध्यम बन जाता है। आस्था नैतिक अधिकार, पहचान और भावनात्मक एकता देती है और यही उसे राजनीतिक रूप से उपयोगी बनाता है।

धर्म स्वयं समस्या नहीं है। इतिहास में आस्था ने न्याय और सुधार की प्रेरणा दी है। खतरा तब शुरू होता है जब आस्था सवाल पूछना बंद कर देती है। जब धार्मिक पहचान तर्क से अलग होकर केवल भावनात्मक निष्ठा बन जाती है, तो वह नियंत्रण का साधन बन सकती है। नेता भक्ति को बढ़ाते हैं, पर सवालों को हतोत्साहित करते हैं। नीतिगत विफलताओं को आस्था पर हमला बताकर पेश किया जाता है। बहस की जगह भावनात्मक उबाल ले लेता है।

जब तर्क कमजोर पड़ता है, अहंकार मजबूत हो जाता है। सच्चे आस्थावान भी कभी-कभी अनजाने में उन कार्यों का समर्थन करने लगते हैं जो उनके ही नैतिक सिद्धांतों के खिलाफ होते हैं। तर्कहीन आस्था सत्ता की ढाल बन जाती है। विवेकपूर्ण आस्था सत्ता पर अंकुश बनती है। लोकतंत्र को दूसरी वाली आस्था की जरूरत है।

राम राज्य की कल्पना इसलिए जीवित है क्योंकि वह कर्तव्य और संतुलन पर आधारित शासन का प्रतीक है। वहीं रावण की शक्ति नैतिक सीमाओं के बिना केंद्रीकृत सत्ता का प्रतीक है। संदेश स्पष्ट है जब सत्ता नैतिकता से अलग हो जाती है, तो असंतुलन पैदा होता है। आज भारत और अमेरिका सहित कई लोकतांत्रिक देशों में संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता दिख रहा है। शक्ति के केंद्रीकरण, धन और संदेश-प्रबंधन के प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। चाहे हर आरोप सही हो या नहीं, लेकिन अविश्वास की भावना वास्तविक है। जब नागरिक मान लेते हैं कि व्यवस्था शक्तिशाली लोगों के पक्ष में झुकी है, तो वे खुद को ढालना शुरू कर देते हैं। कुछ विरोध करते हैं। कुछ त्याग करते हैं। बहुत से लोग समझौता कर लेते हैं।

ऊपर का अहंकार नीचे तक फैलता है। भ्रष्ट अधिकारी अपने हक को सही ठहराता है। अवसरवादी नेता स्वार्थ को रणनीति कहता है। धीरे-धीरे आत्मसम्मान कम होता है और सिद्धांतों की जगह जीवित रहने की मानसिकता ले लेती है। अहंकार का सबसे बड़ा नुकसान किसी एक नीति की विफलता नहीं है। वह नैतिक भ्रम पैदा करता है। जब ईमानदारी अव्यवहारिक लगने लगे, तो राष्ट्र का चरित्र बदलने लगता है। इमारतें दोबारा बनाई जा सकती हैं। नैतिक विश्वास को फिर से खड़ा करना कहीं कठिन है।

हर लोकतंत्र के सामने एक ही विकल्प है। यदि हम प्रदर्शन और व्यक्तित्व को पुरस्कृत करेंगे, तो अहंकार फलेगा-फूलेगा। यदि हम जवाबदेही और सेवा को महत्व देंगे, तो आत्मसम्मान संस्थाओं को मजबूत करेगा। जब अहंकार शासन पर हावी हो जाता है, राष्ट्र केवल संतुलन नहीं खोते वे अपना चरित्र खो देते हैं। और चरित्र को पुनः स्थापित करने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।


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