राष्ट्रवाद संस्थाओं से बनता है, विरोधियों के खिलाफ हथियार बनाकर नहीं
राष्ट्रवाद संस्थाओं से बनता है, विरोधियों के खिलाफ हथियार
बनाकर नहीं
भारत का राष्ट्र
केवल नारों से
नहीं बना। वह बना एकीकरण
से, संस्थाओं के
निर्माण से, और संवैधानिक जवाबदेही से।
आज़ादी के बाद भारत प्रांतों
और 500 से अधिक रियासतों में बँटा
हुआ था। सरदार
वल्लभभाई पटेल ने
बातचीत और दृढ़ निर्णयों के माध्यम
से उन क्षेत्रों
को भारतीय संघ
में जोड़ा। जवाहरलाल
नेहरू ने संसदीय
लोकतंत्र, वैज्ञानिक संस्थानों और
दीर्घकालिक आर्थिक योजना
की नींव रखी।
और इस पूरी संरचना के
केंद्र में थे डॉ. भीमराव
अंबेडकर, जिन्होंने ऐसा संविधान
रचा जिसने मौलिक
अधिकार, शक्तियों का
विभाजन और स्वतंत्र
संस्थाओं की गारंटी
दी।
इन
नेताओं ने संसद में तीखी
बहसें कीं। उन्होंने
विरोध, आलोचना और
राजनीतिक चुनौतियों का सामना
किया। लेकिन उन्होंने
असहमति जताने वालों
को रोज़-रोज़
“राष्ट्रविरोधी” कहकर खारिज
नहीं किया। वे
समझते थे कि असहमति राष्ट्र
के खिलाफ नहीं
होती, वह लोकतंत्र
का हिस्सा होती
है। इंदिरा गांधी का
दौर जटिल और बहसों से
भरा रहा। फिर
भी बैंक राष्ट्रीयकरण
और प्रिवी पर्स
की समाप्ति जैसे
उनके फैसले संरचनात्मक
बदलाव के रूप में प्रस्तुत
किए गए, जिनका
उद्देश्य आर्थिक और
राजनीतिक शक्ति-संतुलन
को बदलना था।
1971 में जब भारत
पर बाहरी दबाव
पड़ा, तब उनकी सरकार पीछे
नहीं हटी। उस समय राष्ट्रवाद
का प्रदर्शन रोज़ाना
के राजनीतिक आरोपों
से नहीं, बल्कि
निर्णायक नीतिगत फैसलों
से हुआ।
आज
के राजनीतिक माहौल
से यह अंतर साफ दिखता
है। मोदी सरकार राष्ट्रवाद
को अपने केंद्रीय
राजनीतिक संदेश के
रूप में बार-बार सामने
रखती है। सरकारी
नीतियों की आलोचना
करने वालों को
अक्सर देश को कमजोर करने
वाला बताया जाता
है। व्यापार समझौतों,
आर्थिक आँकड़ों या
आंतरिक सुरक्षा से
जुड़े निर्णयों पर
सवाल उठाने वाले
विपक्षी नेताओं को
कई बार राष्ट्रीय
हित के खिलाफ
खड़ा दिखाया जाता
है। लेकिन विरोधियों को “राष्ट्रविरोधी”
कह देने से राष्ट्रवाद साबित नहीं
होता। उसका आकलन
शासन से होता है।
हाल
ही में अमेरिका
के साथ एक महत्वपूर्ण व्यापार समझ
के बाद, विपक्ष
के सवालों के
दौरान प्रधानमंत्री संसद
में मौजूद नहीं
थे। संसद वह संवैधानिक मंच है जहाँ कार्यपालिका
को अपने फैसलों
का जवाब देना
होता है। सीधे
संवाद से बचना लोकतांत्रिक जवाबदेही को
कमजोर करता है। इसी
दौरान भाजपा के
नेताओं ने सार्वजनिक
रूप से विपक्ष
के आरोपों को
झूठ बताया। लेकिन
जब राहुल गांधी
प्रेस के सामने
आकर उन्हीं दावों
को सीधे चुनौती
देने पहुंचे, तो
कई नेता खुली
बहस में अपने
बयान का बचाव करने के
बजाय पीछे हटते
दिखे। यदि सरकार
का पक्ष मजबूत
है, तो उसे जांच और
सवालों का सामना
करने में संकोच
नहीं होना चाहिए।
असल
मुद्दा संस्थागत मजबूती
का है। संविधान ने
स्वतंत्र स्तंभ बनाए:
निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित
करने के लिए चुनाव आयोग,
संवैधानिक मूल्यों की रक्षा
के लिए न्यायपालिका,
और बिना पक्षपात
नीति लागू करने
के लिए तटस्थ
नौकरशाही। जब इन
संस्थाओं की स्वतंत्रता
पर सवाल उठते
हैं या उनमें
राजनीतिक झुकाव की
आशंका दिखती है,
तो राष्ट्रवाद के
दावे कमजोर पड़ते
हैं। सच्चा राष्ट्रवाद रेफरी को
मजबूत करता है।
वह अदालतों को
दबाव से बचाता
है। वह संसद की बहस
का सम्मान करता
है। वह निगरानी
और सवालों को
दुश्मनी नहीं मानता। पाखंड
तब सामने आता
है जब सरकार
देशभक्ति की बात
तो लगातार करती
है, पर जवाबदेही
से बचती है।
जब असहमति को
राष्ट्रविरोध कह दिया
जाता है, जबकि
महत्वपूर्ण संस्थाएं दबाव में
दिखती हैं। जब नारे ऊंचे
होते जाते हैं
और संस्थाओं की
स्वतंत्रता कमजोर पड़ती
जाती है।
भारत
के निर्माताओं ने
विविधताओं को जोड़कर
एक संवैधानिक गणराज्य
खड़ा किया। उन्होंने
पहचान की राजनीति
नहीं, बल्कि संस्थाओं
पर भरोसा किया। राष्ट्रवाद
बार-बार दोहराने
से साबित नहीं
होता। वह आचरण से साबित
होता है। यदि नेता सच
में राष्ट्र के
साथ खड़े हैं,
तो उन्हें संसद
में खड़ा होना
होगा, अपने फैसलों
का खुलकर बचाव
करना होगा, और
उन संस्थाओं की
रक्षा करनी होगी
जो उनसे भी लंबी उम्र
वाली हैं।
इसके
अलावा जो कुछ है, वह
शक्ति नहीं। वह
केवल प्रदर्शन है।
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