जब खेल भावना बन जाती है असली जवाब
जब खेल भावना बन जाती है असली जवाब
हर
विवाद स्वाभाविक नहीं
होता। कुछ विवाद
ऐसे होते हैं
जिन्हें जानबूझकर हवा
दी जाती है,
बढ़ाया जाता है,
और इस तरह पेश किया
जाता है कि असली मुद्दे
पीछे छूट जाएं।
हाल के वर्षों
में खेल के साधारण शिष्टाचार
को भी राजनीतिक
रंग देने की कोशिश की
गई है।
ऐसे
माहौल में जब रोहित शर्मा
ने श्रीलंका में
ICC के ब्रांड एंबेसडर
के रूप में अपनी यात्रा
के दौरान वसीम
अकरम से हाथ मिलाया, तो यह एक सामान्य
बात होनी चाहिए
थी। दो महान क्रिकेटरों का आपसी सम्मान। यही खेल है। यही
परंपरा है।
लेकिन
आज के माहौल
में एक साधारण
हैंडशेक भी “संदेश”
बना दिया जाता
है।
वसीम
अकरम सिर्फ पाकिस्तान
के पूर्व खिलाड़ी
नहीं हैं। वे क्रिकेट इतिहास के
महानतम तेज गेंदबाजों
में से एक हैं, हॉल
ऑफ फेमर हैं,
और विश्व कप
जैसे बड़े टूर्नामेंटों
में सम्मानित कमेंटेटर
हैं। उन्हें सिर्फ
पाकिस्तान में नहीं,
भारत और पूरी दुनिया में
सराहा जाता है।
रोहित शर्मा आधुनिक
भारतीय क्रिकेट का
चेहरा हैं सफल
कप्तान, शानदार बल्लेबाज
और संयमित व्यक्तित्व।
जब
रोहित ने अकरम से सम्मानपूर्वक
मुलाकात की, तो उन्होंने वही किया
जो एक सच्चा
खिलाड़ी करता है।
उन्होंने खेल भावना
दिखाई।
इसके
उलट, हाल के वर्षों में
भारत-पाकिस्तान मुकाबलों
से पहले या बाद में
खिलाड़ियों द्वारा हाथ
न मिलाने की
घटनाएं देखने को
मिली हैं। इसे
“राष्ट्रीय गर्व” का
नाम दिया जाता
है। लेकिन हाथ
न मिलाना किसी
देश को मजबूत
नहीं बनाता। यह
खेल को छोटा करता है।
खेल
भावना कमजोरी नहीं
होती। यह गरिमा
होती है।
चिंता
की बात यह है कि
अब खेल का व्यवहार भी राजनीतिक
संकेतों से जोड़ा
जाने लगा है। क्रिकेट प्रशासन और
सत्ता के बीच की दूरी
पहले जितनी स्पष्ट
नहीं दिखती। मीडिया
का एक हिस्सा
भी हर छोटी बात को
राजनीतिक चश्मे से
देखने लगता है।
ऐसे में एक साधारण शिष्टाचार
भी बहस का विषय बना
दिया जाता है।
रोहित
शर्मा का यह कदम किसी
विद्रोह की तरह नहीं देखा
जाना चाहिए। यह
सामान्य व्यवहार है।
लेकिन जब सामान्य
शालीनता भी असामान्य
लगने लगे, तो समझना चाहिए
कि माहौल कितना
बदल चुका है।
खेल
का उद्देश्य इंसानों
को जोड़ना है,
बांटना नहीं। मैदान
पर खिलाड़ी प्रतिद्वंद्वी
होते हैं, दुश्मन
नहीं। चार घंटे
की कड़ी टक्कर
के बाद भी आपसी सम्मान
बना रहना चाहिए।
यही खेल की आत्मा है।
जब
खिलाड़ी हाथ मिलाने
से इनकार करते
हैं, तो संदेश
यह जाता है कि दुश्मनी
मैदान के बाहर भी जारी
रहनी चाहिए। कि
राजनीति, पेशेवर शिष्टाचार
से बड़ी है।
कि प्रतीक, खेल
भावना से ज्यादा
महत्वपूर्ण हैं।
रोहित
ने अलग रास्ता
चुना। उन्होंने कोई
बयान नहीं दिया।
कोई नारा नहीं
लगाया। उन्होंने बस
एक महान खिलाड़ी
का सम्मान किया।
और
उसी में असली
ताकत है।
यही
सच्ची खेल भावना
है। यही वह व्यवहार है जो खेल को
ऊंचा रखता है और हमें
भी।
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