महान भारतीय लूट: सत्ता, प्रोपेगेंडा और धोखे की राजनीति
महान भारतीय
लूट: सत्ता, प्रोपेगेंडा और धोखे की राजनीति
आइए एक बार फिर नरेंद्र मोदी के शासन पर लौटते हैं। आदत के कारण नहीं, न ही किसी दलगत प्रतिक्रिया के कारण, बल्कि इसलिए कि हाल की घटनाओं ने पुराने पैटर्न को फिर से साफ़ कर दिया है।
दुनिया भर में जेफ्री एपस्टीन से जुड़े दस्तावेज़ों को लेकर नई चर्चा ने कई राजनीतिक हलकों को असहज किया है। इन खुलासों ने व्यापार, शिक्षा और राजनीति से जुड़े प्रभावशाली लोगों को घेरा है। भारत में सवाल तब तेज़ हुए जब यह सामने आया कि एक वरिष्ठ नेता, जो बाद में मंत्री बने, ने मंत्री पद संभालने से पहले एपस्टीन से कई बार मुलाकात की थी। मुलाकातें उस समय की थीं जब उनके पास सरकारी पद नहीं था, लेकिन इससे पारदर्शिता की ज़रूरत कम नहीं होती। बल्कि बढ़ती है।
अब ऐसी रिपोर्टें और दावे भी सामने आ रहे हैं कि एपस्टीन से जुड़े दस्तावेज़ों में मोदी का नाम कई बार आता है, यहां तक कि उनके कुछ विदेशी दौरों का भी ज़िक्र है। अभी तक इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। यह अतिशयोक्ति भी हो सकती है। लेकिन जब धुआँ दिखता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे समय में चुप्पी स्थिति को मजबूत नहीं करती, बल्कि शक को गहरा करती है।
मुद्दा अफवाह का नहीं है। मुद्दा जवाबदेही का है।
दुनिया के कई नेताओं से एपस्टीन से जुड़े सवाल पूछे गए हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से भी उनके पुराने सामाजिक संबंधों पर सवाल हुए, जो उनके २०२४ में दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने से पहले के थे। उन्होंने इन आरोपों से इनकार किया और सार्वजनिक रूप से जवाब दिए। यहां तुलना दोष की नहीं, रवैये की है। सवाल उठे, प्रेस ने पूछे, जवाब दिए गए।
भारत में प्रधानमंत्री ने एक दशक से अधिक समय से खुले और बिना तय सवालों वाले प्रेस सम्मेलन से लगभग दूरी बनाए रखी है। भाषण होते हैं, संदेश नियंत्रित होते हैं, साक्षात्कार संरचित होते हैं। लेकिन स्वतंत्र पत्रकारों के सीधे और अप्रत्याशित सवालों का सामना कम ही हुआ है। जब विवाद उठते हैं, तो संवाद की कमी जिज्ञासा को शांत नहीं करती, बल्कि उसे और बढ़ाती है।
यहीं से अंतरराष्ट्रीय विवाद और घरेलू राजनीति के बीच की कड़ी साफ़ होती है।
एपस्टीन का मामला अलग-थलग घटना नहीं है। यह एक बड़े संचार पैटर्न का हिस्सा लगता है। जैसे ही असहज सवाल उभरते हैं, फोकस बदल जाता है। कोई बड़ा सम्मेलन। कोई विकास घोषणा। कोई उच्च दृश्यता कार्यक्रम। ध्यान दिशा बदल लेता है।
और इसी माहौल में वही पुराने चुनावी वादे लौट आते हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में हर राज्य को “नंबर वन” बनाने का वादा। तेलंगाना में यही बात। ओडिशा में वही दावा। कर्नाटक में वही आश्वासन। हर भीड़ को बताया जाता है कि वही शीर्ष पर होगा।
महत्वाकांक्षा समस्या नहीं है। गणित है। हर राज्य एक साथ नंबर वन नहीं हो सकता। जब हर जगह एक जैसा सर्वोच्च दावा किया जाता है, तो वह नीति से ज्यादा नारे जैसा लगता है।
यह २०१४ के उस वादे की याद दिलाता है जब कहा गया था कि विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जाएगा और हर नागरिक के खाते में १५ से २० लाख रुपये जमा होंगे। यह रूपक नहीं था। यह एक सटीक संख्या थी। वह राशि कभी नहीं आई। उस पैमाने की कोई सार्वजनिक जवाबदेही सामने नहीं आई।
पैटर्न साफ़ है। बड़ा ऐलान। तालियां। समय बीतता है। ऐलान गायब। जवाबदेही भी।
इसके साथ संस्थानों की स्वतंत्रता पर बहस जुड़ती है। प्रवर्तन निदेशालय ने कई उच्च प्रोफाइल मामलों में कार्रवाई की है, अक्सर विपक्षी नेताओं के खिलाफ। लेकिन उसके मामलों में सज़ा दर बेहद कम है। आम आदमी पार्टी के कई नेताओं को गिरफ्तार किया गया, लंबी जांच चली, लेकिन अदालतों से राहत भी मिली जब आरोप ठोस साबित नहीं हो सके। सुर्खियां गिरफ्तारी की बनती हैं, लेकिन सज़ा की खबर उतनी ज़ोर से नहीं आती।
कानूनी रूप से हर मामला अलग हो सकता है। लेकिन राजनीति में पैटर्न मायने रखते हैं। और जब पैटर्न बनता है, तो धारणा मजबूत होती है।
यहीं न्यायपालिका की भूमिका निर्णायक बनती है। लोकतंत्र में अदालतें कार्यपालिका पर संतुलन का काम करती हैं। जब न्यायपालिका से जुड़े लोगों के खिलाफ भारी नकदी मिलने की खबरें आती हैं, तो जांच पारदर्शी और कठोर होनी चाहिए। अगर व्यवस्था खुद को बचाती हुई दिखे, तो जनता का विश्वास कमजोर होता है। अगर फैसले लगातार ऐसे दिखें जो विपक्ष को नुकसान और सत्ता पक्ष को राहत दें, तो भले वे कानूनी हों, धारणा सिद्धांत पर भारी पड़ने लगती है।
अगर न्यायपालिका समझौता करती हुई दिखे, तो पूरा संतुलन हिल जाता है। तब सत्ता सिर्फ चलाई नहीं जाती, बल्कि केंद्रित की जाती है।
इसी संदर्भ में एक और धारणा उभरी है। आलोचकों का कहना है कि करदाताओं का विशाल पैसा, बड़े सरकारी ठेके, आधारभूत ढांचा रियायतें और वित्तीय लाभ एक सीमित दायरे के उद्योग समूहों तक केंद्रित हुए हैं, जिनकी जड़ें अक्सर गुजरात से जुड़ी मानी जाती हैं। सरकार इसे विकास और उद्योग साझेदारी कहती है। समर्थक इसे राष्ट्र निर्माण बताते हैं। लेकिन आलोचक इसे कुछ और मानते हैं।
उनके लिए यह सार्वजनिक संपत्ति का निजी हाथों में स्थानांतरण जैसा लगता है, वह भी खुले में। हवाई अड्डे, बंदरगाह, प्राकृतिक संसाधन, बड़े गलियारे सब धीरे धीरे सीमित समूहों के नियंत्रण में जाते दिखते हैं। जब सार्वजनिक संस्थान घाटा झेलते हैं और निजी समूह मुनाफा कमाते हैं, तो सवाल उठते हैं। जब जांच एजेंसियां विपक्ष के खिलाफ तेज़ और सहयोगी कॉरपोरेट समूहों के मामले में धीमी दिखें, तो शक गहराता है।
यहीं “लूट” शब्द असर करता है, खासकर युवाओं पर, जो दुनिया भर की वेब श्रृंखलाओं में लूट की कहानियां देखते आए हैं। लूट हमेशा शोर से नहीं होती। वह रणनीतिक, योजनाबद्ध और ध्यान भटकाकर की जाती है। आलोचकों का कहना है कि जब जनता को धार्मिक नारों और ऐतिहासिक बदलाव के वादों से जोड़ा जाता है, उसी समय आर्थिक ढांचे में शक्ति और संपत्ति का केंद्रीकरण चुपचाप होता है।
इसके ऊपर धार्मिक प्रतीकों और नारों का रणनीतिक इस्तेमाल। आस्था और सभ्यता की बात करना गलत नहीं है। लेकिन जब धर्म राजनीतिक ढाल बन जाए और नीतिगत सवालों से ध्यान हटाने का औज़ार बन जाए, तब बहस प्रदर्शन और जवाबदेही से हटकर भावनात्मक निष्ठा पर टिक जाती है।
पैटर्न साफ़ है: कथा पर नियंत्रण, प्रेस से दूरी, बड़े वादे, आक्रामक जांच, संस्थागत दबाव, आर्थिक केंद्रीकरण और धार्मिक लामबंदी।
लोकतंत्र नेताओं से परिपूर्ण होने की मांग नहीं करता। वह जवाबदेही की मांग करता है। आरोप हों तो सामना हो। वादे हों तो मापे जाएं। संस्थाएं काम करें तो निष्पक्ष दिखें।
आज मोदी के शासन पर फिर से लौटना अफवाह फैलाना नहीं है। यह दोहराव को पहचानना है। और जब दोहराव बार बार सामने आए, तो वह खुद एक कहानी बन जाता है।
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