जब बयानबाज़ी शासन की जगह ले लेती है: नेतृत्व की वह परीक्षा जिसे भारत नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया टिप्पणी को लेकर उठा विवाद किसी एक शब्द तक सीमित नहीं है। यह उस शैली की ओर इशारा करता है जिसमें नीति और जवाबदेही की जगह उकसावे और तमाशे ने ले ली है। पिछले एक दशक में, आलोचकों के अनुसार, भारत के सार्वजनिक जीवन का स्तर नीचे गया है और यह गिरावट शीर्ष से शुरू होती दिखती है।

ताज़ा विवाद की पृष्ठभूमि दिल्ली में आयोजित कृत्रिम बुद्धिमत्ता सम्मेलन से जुड़ी है। वहाँ युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने शर्ट उतारकर विरोध जताया। उनका आरोप था कि सरकार तकनीकी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है और अमेरिका–भारत व्यापार समझौते पर जवाब दे। सम्मेलन की विश्वसनीयता तब और प्रभावित हुई जब प्रस्तुतकर्ताओं ने स्वीकार किया कि भारत की उपलब्धि बताकर प्रदर्शित किया गया रोबोटिक कुत्ता दरअसल चीन में बना था। जो आयोजन नवाचार का प्रदर्शन बनना था, वह प्रामाणिकता पर सवाल खड़े कर गया।

इसके बाद जो हुआ, उसने चिंता और गहरी कर दी।

मेरठ की एक यात्रा, जिसे आधिकारिक कार्यक्रम बताया गया था, राजनीतिक रैली में बदल गई। वहीं प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पार्टी को “नंगी” कहा। हिंदी में यह शब्द अपमानजनक और अवमाननापूर्ण अर्थ रखता है। ऐसी भाषा आमतौर पर सड़क की झड़पों में सुनाई देती है, न कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के मुख से। जब प्रधानमंत्री इस स्तर की भाषा का सहारा लेते हैं, तो वे अपने पद की गरिमा को कम करते हैं और सार्वजनिक जीवन के मानकों को गिराते हैं।

यह कोई एक घटना नहीं है।

संसद के भीतर सत्तारूढ़ दल के सदस्यों द्वारा “कटवा” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, जिसे व्यापक रूप से मुसलमानों के प्रति अपमानजनक माना जाता है, और उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखी। एक अन्य मौके पर एक भाजपा नेता ने कहा कि प्रधानमंत्री “सवालों से ऊपर” हैं यह कथन संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के खिलाफ है, जहाँ कार्यपालिका जनता के प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह होती है।

संसदीय नियमों के असमान पालन को लेकर भी शिकायतें उठी हैं। विपक्ष का आरोप है कि जब नेता प्रतिपक्ष दस्तावेज़ पढ़ने की कोशिश करते हैं तो उन्हें रोका जाता है, जबकि सत्तापक्ष के सदस्यों को लंबे समय तक तैयार भाषण पढ़ने की अनुमति दी जाती है। चाहे इन दावों पर मतभेद हों, लेकिन ऐसी धारणा भी संस्थानों की विश्वसनीयता को कमजोर करती है।

व्यक्तिगत उपहास भी सामान्य होता दिख रहा है। राहुल गांधी को “अनपढ़ बच्चा” कहकर संबोधित किया गया। मुद्दा उनकी डिग्री का नहीं है। मुद्दा यह है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति अपमानजनक भाषा सामान्य बना दी गई है। जब संसद तर्क का मंच बनने के बजाय तानों का अखाड़ा बन जाए, तो लोकतांत्रिक संस्कृति आहत होती है।

आलोचक यह भी कहते हैं कि कानूनी कार्रवाई में दोहरा मापदंड दिखता है। विपक्षी नेताओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियाँ अक्सर बिना परिणाम के रह जाती हैं, जबकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं के विरुद्ध कही गई बातों पर तुरंत प्राथमिकी दर्ज हो जाती है। निष्पक्षता पर ज़रा सा भी संदेह जनविश्वास को कमजोर करता है।

समर्थक कहते हैं कि राजनीति स्वभावतः तीखी होती है और कठोर भाषा समर्थकों को उत्साहित करती है। लेकिन तीखी बहस और संस्थागत गिरावट में फर्क होता है। संसद सवालों के लिए है, तालियों के लिए नहीं। प्रधानमंत्री से अपेक्षा होती है कि वे सवालों का सामना करें, उनसे ऊपर घोषित न किए जाएँ। नेतृत्व का अर्थ संयम, अनुशासन और पद की गरिमा की रक्षा है खासकर विवाद के समय।

मूल प्रश्न विचारधारा का नहीं है। यह शासन की परिपक्वता का है।

जब उग्र भाषा सामान्य बन जाए, जब जवाबदेही को दुश्मनी बताया जाए, और जब आलोचना का जवाब तथ्यों से नहीं बल्कि तमाशे से दिया जाए, तो लोकतांत्रिक मानक कमजोर पड़ते हैं। भारत जैसा विशाल और विविध देश ऐसे नेतृत्व का जोखिम नहीं उठा सकता जो गंभीर संस्थागत प्रश्नों को चुनावी नारों में बदल दे।

लोकतंत्र परिपक्व नेतृत्व की मांग करता है। वह ऐसे नेताओं की अपेक्षा करता है जो दलगत आवेग से ऊपर उठकर अपने पद की गरिमा की रक्षा करें। भारत की ताकत हमेशा उसके संस्थानों में रही है, व्यक्तियों में नहीं। उस ताकत को बनाए रखने के लिए सार्वजनिक जीवन में गंभीरता लौटानी होगी और यह याद रखना होगा कि सत्ता जिम्मेदारी है, छूट नहीं।

किसी लोकतंत्र का आकलन इस बात से नहीं होता कि उसके नेता कितनी ऊँची आवाज़ में बोलते हैं, बल्कि इस बात से होता है कि वे कितनी जिम्मेदारी से नेतृत्व करते हैं।


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