जब झूठे आरोप चुनावों को आकार देते हैं, तो लोकतंत्र इसकी कीमत चुकाता है

 

जब झूठे आरोप चुनावों को आकार देते हैं, तो लोकतंत्र इसकी कीमत चुकाता है


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हाल ही में अदालत ने 23 लोगों को, जिनमें अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया शामिल हैं, बरी किया। यह केवल एक कानूनी फैसला नहीं है। यह उस बात की पुष्टि है जो बहुत पहले स्पष्ट हो जानी चाहिए थी भ्रष्टाचार के आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सबूत नहीं थे।

सालों तक जनता को बताया गया कि ये लोग भ्रष्ट हैं। गिरफ्तारियों को बार-बार प्रसारित किया गया। मीडिया के मंचों पर एक ही तर्क दोहराया गया: अगर ये अभी भी जेल में हैं, तो ज़रूर दोषी होंगे।

इस तर्क ने जनमत को आकार दिया। जेल को सबूत बना दिया गया। जमानत न मिलना दोष की पुष्टि बना दिया गया। देरी को अपराध की गंभीरता का प्रमाण बताया गया। इसी दौरान न्यायिक टिप्पणियाँ मामले की मजबूती पर सवाल उठा रही थीं। अदालतें सबूत मांग रही थीं। फिर भी जमानत नहीं दी गई। आरोपों को साबित करने लायक ठोस प्रमाण अदालत में पेश नहीं किए गए, फिर भी स्वतंत्रता छीनी गई।

जनता ने कानूनी बारीकियाँ नहीं देखीं। उसने जेल देखी। इसी अवधि में चुनाव हुए। मतदाताओं ने लगातार भ्रष्टाचार के नैरेटिव के बीच अपनी राय बनाई। कई लोगों ने मान लिया कि दोष ज़रूर होगा, क्योंकि आरोपी जेल में थे। कुछ लोग भ्रमित हुए और मतदान से दूर रहे। धारणा ने भागीदारी को प्रभावित किया। भागीदारी ने परिणामों को प्रभावित किया।

अगर सबूत पर्याप्त नहीं थे, तो चुनावी प्रक्रिया एक ऐसे नैरेटिव से प्रभावित हुई जो अदालत की जांच में टिक नहीं पाया। यह नुकसान है। और यह नुकसान केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। भारत में लोग किसी को “चोर” कहने में देर नहीं लगाते। आरोपियों के बच्चों का स्कूलों में मज़ाक उड़ाया गया। परिवारों को दफ्तरों और मोहल्लों में अपमान झेलना पड़ा। जीवनसाथियों को सामाजिक कलंक उठाना पड़ा। माता-पिता को सार्वजनिक निर्णय का सामना करना पड़ा।

यह अपमान बार-बार दोहराए गए मीडिया संदेशों से बढ़ा, जिनमें जेल को नैतिक सत्य की तरह प्रस्तुत किया गया। अब अदालत ने कहा है कि आरोप टिक नहीं पाए। तो सवाल सीधा है: अगर सरकार के पास ठोस मामला नहीं था, तो इन लोगों को जेल में क्यों रखा गया? अगर सबूत पर्याप्त नहीं थे, तो जमानत इतने लंबे समय तक क्यों नहीं दी गई? अगर आरोप साबित नहीं हो सके, तो हिरासत जारी क्यों रही?

यहीं संस्थागत विफलता को स्वीकार करना होगा। जांच एजेंसियों ने ऐसे आरोप लगाए जो टिक नहीं पाए। अदालतों ने उस अवधि में लंबी कैद की अनुमति दी जब सबूत विवादित थे। मीडिया ने यह नैरेटिव मजबूत किया कि जेल का मतलब दोष है।

फैसले ने आरोपियों को बरी कर दिया।

लेकिन बरी करना और व्यवस्था को सुधारना एक ही बात नहीं है। जब जेल चुनावों को प्रभावित करे, जब बिना सिद्ध दोष के परिवारों को अपमान झेलना पड़े, और जब सार्वजनिक धारणा उन आरोपों पर बने जो अदालत में ढह जाएं, तो मामला केवल व्यक्तियों का नहीं रह जाता।

न्याय “दोषी नहीं” कहने पर समाप्त नहीं हो सकता। अगर सजा दिलाने लायक सबूत नहीं थे, तो लंबी कैद की जांच होनी चाहिए। अगर जनता को बार-बार यह बताया गया कि दोष निश्चित है, तो उस निश्चितता को बनाने वालों से जवाब मांगा जाना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में आरोप सजा नहीं होते। जेल सबूत नहीं होती। और नैरेटिव प्रमाण नहीं होता। यह फैसला एक मुकदमे को बंद करता है। यह नुकसान को बंद नहीं करता। और उस नुकसान का सामना करना ही होगा।

 



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