महामानव का अनोखा मामला

 

महामानव का अनोखा मामला

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2026/04/the-curious-case-of-mahamanav-it-is.html

यह देखना दिलचस्प है कि “महामानव”  नरेंद्र मोदी के चारों ओर बनाई गई यह विशाल छवि   जितनी बड़ी होती जा रही है, उतनी ही उनकी वास्तविकता से दूरी भी बढ़ती जा रही है।

पश्चिम बंगाल की उनकी रैलियों को ही देख लीजिए। हमें बताया जाता है कि भीड़ उमड़ रही है, ऐतिहासिक जनसमूह है, ज़मीन हिल रही है। लेकिन तस्वीरें कुछ और ही कहानी कहती हैं। वहाँ वे दिखते हैं दूर, ऊँचाई पर, सुरक्षा के घेरे में, इतने फासले पर कि तालियाँ तो पहुँच जाएँ, लेकिन सवाल नहीं।

तो सवाल यह है: यह भीड़ का प्रबंधन है या जोखिम का?

क्योंकि यही वह नेता हैं जिन्होंने 2014 से पहले कहा था कि अगर वे अपना काम ठीक से नहीं करेंगे, तो जनता को पूरा हक है कि वह उन्हें कहीं भी रोककर अपना गुस्सा जाहिर करे। कहीं भी यही वादा था।

आजकहीं भीका मतलब शायदमेरे आसपास कहीं नहींहो गया है।

सड़कों की बात छोड़िए। आम लोगों से सीधा संवाद छोड़िए। एक साधारण चीज़ की बात करते हैं प्रेस कॉन्फ्रेंस। कोई रैली, भाषण, एकतरफा संवाद। बस सीधे सवाल और जवाब।

ऐसा एक भी मौका नहीं मिला।  एक भी बार ऐसा नहीं हुआ कि महामानव ने स्वतंत्र मीडिया के सामने बैठकर बिना तय सवालों के जवाब दिए हों। सोचिए, एक अरब से ज्यादा लोगों का देश चलाना और फिर भी सीधे सवालों से बचते रहना यह भी एक तरह कीउपलब्धिही है।

फिर आता है संसद जहाँ सवाल पूछना सिर्फ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है। जब विपक्ष सवाल उठाता है, तो उम्मीद होती है जवाब की, बहस की, संवाद की।

लेकिन अक्सर जो दिखता है, वह है चुपचाप निकल जाना, अनुपस्थित रहना, या फिर दूसरों के पीछे छिप जाना। जब सिस्टम ही सवालों को संभाल सकता है, तो खुद जवाब देने की क्या ज़रूरत?

आखिरकार, कार्यकुशलता भी तो कोई चीज़ होती है। लेकिन शायद महामानव की सबसे बड़ीकलासवालों से बचना नहीं है बल्कि असफलताओं को उपलब्धि में बदल देना है।

आर्थिक समस्याएँ? दीर्घकालिक दृष्टि। सामाजिक तनाव? सांस्कृतिक जागरण। विभाजन? पहचान का गर्व।

जो बातें चिंता पैदा करनी चाहिए थीं, उन्हें तालियों में बदल देना यह आसान काम नहीं है। और उससे भी बड़ा काम है यह सुनिश्चित करना कि लोग सिर्फ इसे मानें, बल्कि उसका बचाव भी करें।

और वे करते हैं। इस बीच, देश में एक अलग तरह की ऊर्जा भी उभर रही है। ऐसी आवाज़ें जो शासन से ज्यादा धर्म की बात करती हैं। ऐसे लोग जो मानते हैं कि उनकी आस्था उन्हें अधिकार देती है जैसे भगवान उनके पड़ोस में रहते हों और उनके हर व्यवहार को मंजूरी देते हों। संयोग है? शायद। या शायद यह ऊपर से तय होने वाला स्वर है। क्योंकि नेतृत्व सिर्फ नीतियों से नहीं बनता। यह तय करता है कि क्या सामान्य है, क्या स्वीकार्य है, और क्या चुपचाप बढ़ने दिया जाता है।

और अभी जो बढ़ता दिख रहा है, वह है सवाल नहीं नारे। जवाबदेही नहीं भक्ति। सोच नहीं समर्थन।

महामानव को सवालों का जवाब देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, अगर सवाल पूछे ही जाना बंद हो जाएँ।

और शायद यही उनका सबसे सफल सुधार है।



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