अंधभक्ति और खोखला गर्व: जब सवाल करना गुनाह बन जाए
अंधभक्ति और खोखला गर्व: जब सवाल करना गुनाह बन जाए
आज
के भारत में
किसी को भड़काना
हो तो देश को गाली
देने की ज़रूरत
नहीं है। बस एक
सवाल पूछिए।
सरकार
पर सवाल। सिस्टम पर
सवाल। या उस दिशा
पर सवाल जिसमें
देश जा रहा है। मैंने यह खुद अनुभव किया,
जब मेरी बहस
कुछ कट्टर मोदी
समर्थकों से हुई।
जैसे ही बातचीत
नारों से आगे बढ़ी, वह
टूट गई। बहस में नहीं
बदली रक्षात्मक आक्रोश
में बदल गई।
कोई
जवाब नहीं। सिर्फ
गुस्सा। मेरे तर्कों का
जवाब नहीं दिया
गया। मेरे तथ्यों को
नहीं काटा गया। सीधे
मुझ पर हमला हुआ। “तुम
बाहर रहते हो।”
“तुम्हें भारत की
समझ नहीं।” “तुम्हारे
संस्कार कहाँ हैं?”
यही
वह पल होता है जब
सच्चाई सामने आती
है। जब लोग सिस्टम
को बचा नहीं
पाते, तो वे अपने “हक”
को बचाने लगते
हैं कौन बोले
और कौन नहीं।
साफ
शब्दों में कहें
तो यह आत्मविश्वास
नहीं है। यह असुरक्षा
है। जो लोग “संस्कार”
की बात करते
हैं, उन्होंने ही
उसका मतलब बदल
दिया है। वेदिक परंपरा
अंधभक्ति पर नहीं
बनी थी। वह सवालों
पर बनी थी। बहस
पर बनी थी। नई
सोच को अपनाने
पर बनी थी।
आज?
सवाल पूछना “अपमान”
बन गया है। और
जब राजनीति धर्म
का सहारा लेती
है, तो तर्क खत्म हो
जाता है। हर आलोचना
“देश विरोधी” बन
जाती है। हर सवाल
“धर्म विरोधी” बन
जाता है।
अब
आप किसी व्यक्ति
से बात नहीं
कर रहे होते। आप
एक ऐसी दीवार
से बात कर रहे होते
हैं जो डर और पहचान
से बनी है। मैंने
उन्हें डोनाल्ड ट्रंप
का उदाहरण दिया। कैसे
एक नेता ने भावनाओं, धर्म और झूठ के
मिश्रण से सत्ता
हासिल की। लोगों ने
सोचा कि वह उनके लिए
काम करेगा। लेकिन सत्ता
इंसान को बदलती
नहीं उसे और बड़ा कर
देती है।
जब
मैंने समानताएँ बताईं,
तो प्रतिक्रिया क्या
थी? तर्क नहीं। गुस्सा।
क्योंकि जब राजनीति “भक्ति” बन
जाती है, तो आलोचना “पाप” लगती
है। फिर मैंने सिर्फ
तथ्य रखे। शांत तरीके
से। बिना शोर। और कुछ बदल गया। उनका आत्मविश्वास टूट
गया।
क्योंकि
समस्या यह नहीं थी कि
उन्हें सच्चाई पता
नहीं थी। समस्या यह
थी कि वे उसे स्वीकार
नहीं करना चाहते
थे।
मैंने
एक सीधा सवाल
रखा। जिस “संस्कार” की बात की जा
रही है क्या वह सच
में भारत में
बचा है? या वह ज़्यादा
दिखता है बाहर?
नियमों का पालन। अनुशासन।
दूसरों के लिए सम्मान।
ये
बातें विदेश में
रोज़मर्रा की आदत
हैं। भारत में ये
धीरे-धीरे गायब
हो रही हैं।
कोई
जवाब नहीं आया। समस्या
यह नहीं है कि लोग
समझदार नहीं हैं। समस्या
यह है कि लोग देखना
नहीं चाहते। दूसरों की
आलोचना करना आसान
है। खुद को देखना
मुश्किल। और यही सबसे
खतरनाक स्थिति है। एक
ऐसा समाज जो सत्ता
को सवालों से
बचाता है, जो चुप्पी को
वफादारी समझता है,
जो आलोचना से
ज़्यादा आहत होता
है बनिस्बत भ्रष्टाचार
के
वह
मजबूत नहीं होता। वह
धीरे-धीरे अंदर
से कमजोर होता
है। अगर एक सवाल आपको असहज
करता है, तो समस्या
सवाल में नहीं
है। समस्या उस सच्चाई
में है जिससे आप
बच रहे हैं क्योंकि
देश आलोचना से
नहीं गिरते। वे तब
गिरते हैं जब आलोचना असंभव
बना दी जाती है।
Comments
Post a Comment