लोकतंत्र पर संकट: चुनावी हेरफेर और संस्थागत चुप्पी के गंभीर आरोप
लोकतंत्र
पर संकट: चुनावी हेरफेर और संस्थागत चुप्पी के गंभीर आरोप
भारत
एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है। हर चुनाव के साथ लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता
कमजोर होती दिख रही है किसी एक गलती की वजह से नहीं, बल्कि उन लगातार सामने आ रहे गंभीर
आरोपों के कारण, जो चुनावी प्रणाली की नींव को ही हिला देते हैं।
एक
बार फिर सत्तारूढ़ पार्टी पर यह आरोप लगे हैं कि वह चुनावी फायदा उठाने के लिए संदिग्ध
तरीकों का इस्तेमाल कर रही है खासतौर पर उन राज्यों में, जहां वह राजनीतिक रूप से कमजोर
है। आरोप है कि बड़े पैमाने पर फर्जी या डुप्लीकेट मतदाताओं को मतदाता सूची में जोड़ा
जा रहा है। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनता
की इच्छा को जानबूझकर प्रभावित करने की कोशिश है।
लेकिन
असली चिंता सिर्फ आरोप नहीं हैं बल्कि उन संस्थाओं की चुप्पी है, जो इस पूरी प्रक्रिया
की निगरानी और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं।
चुनाव
आयोग, जिसे संविधान ने निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी है, अब खुद
सवालों के घेरे में है। उसकी निष्क्रियता या चयनात्मक सक्रियता यह संकेत दे रही है
कि वह अब एक स्वतंत्र संस्था की तरह काम नहीं कर रहा, बल्कि या तो मूकदर्शक बन चुका
है या फिर किसी दबाव में है।
न्यायपालिका
से आ रहे संकेत और भी चिंताजनक हैं। यदि देश के सर्वोच्च न्यायिक पद से यह कहा जाता
है कि चुनाव कराना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, तो यह न केवल तथ्यात्मक रूप से
गलत है, बल्कि संवैधानिक स्पष्टता को कमजोर करता है। चुनाव पूरी तरह चुनाव आयोग का
अधिकार क्षेत्र है। इस तरह के बयान यह सवाल उठाते हैं कि क्या संस्थाओं की सीमाएं जानबूझकर
धुंधली की जा रही हैं।
जब
न्यायपालिका के भीतर से ही असहमति के संकेत मिलने लगते हैं, तो यह सार्वजनिक विश्वास
को और कमजोर करता है।
कर्नाटक
में चुनावी गड़बड़ियों को लेकर उठाए गए सवालों पर सख्त और पारदर्शी कार्रवाई होनी चाहिए
थी। लेकिन प्रतिक्रिया धीमी और अस्पष्ट रही। यही वह तरीका है जिससे संस्थाओं की साख
धीरे-धीरे खत्म होती है एक बड़े हादसे से नहीं, बल्कि बार-बार की चूक से।
इससे
भी ज्यादा गंभीर आरोप अब खुलकर सामने आ रहे हैं कि चुने हुए प्रतिनिधियों को खरीदा
जा रहा है। यह अब कोई छुपी हुई बात नहीं रही कि विधायकों और नेताओं की निष्ठा की कीमत
तय होती है। और बड़े कॉर्पोरेट समूहों के लिए यह सौदा बेहद सस्ता पड़ सकता है। सैकड़ों
करोड़ खर्च कर राजनीतिक प्रभाव हासिल करना, जब बदले में लाखों करोड़ के फायदे नीतियों,
ठेकों और सरकारी संरक्षण के रूप में मिल सकते हों, तो यह एक निवेश बन जाता है।
इसी
के साथ, चुनाव से पहले नेताओं का बार-बार पार्टी बदलना अब सामान्य होता जा रहा है।
सवाल यह नहीं रह गया कि वे क्यों बदलते हैं, बल्कि यह है कि क्या ऐसे नेताओं पर भरोसा
किया जा सकता है? जो व्यक्ति एक बार अवसर देखकर पार्टी बदल सकता है, वह फिर से भी ऐसा
कर सकता है। जिन पार्टियों को ऐसे लोग स्वीकार्य हैं, उनके लिए यह सिर्फ नैतिक समझौता
नहीं, बल्कि एक रणनीतिक जोखिम भी है। आज का सहयोगी, कल बोझ बन सकता है।
यह
सब मिलकर एक गहरी समस्या को उजागर करता है राजनीति अब विचारधारा या जनसेवा से नहीं,
बल्कि व्यक्तिगत लाभ और अवसरवाद से संचालित हो रही है।
इसके
प्रभाव साफ दिख रहे हैं। आम नागरिक खुद को असहाय महसूस कर रहा है। छोटे व्यापारी और
मजदूर यह मानने लगे हैं कि सिस्टम उनके लिए काम नहीं करता। स्वतंत्र आवाजें खासतौर
पर मीडिया में या तो दबाई जा रही हैं या हाशिए पर धकेली जा रही हैं। जो बोलने की हिम्मत
करते हैं, उन्हें चुप कराने की कोशिश होती है।
यही
लोकतंत्र के धीरे-धीरे खत्म होने की असली तस्वीर है। चुनाव होते रहते हैं, लेकिन उनका
अर्थ खो जाता है।
भारत
को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। लेकिन सिर्फ आकार से लोकतंत्र मजबूत
नहीं होता। उसकी ताकत इस भरोसे में होती है कि वोट मायने रखते हैं, संस्थाएं स्वतंत्र
हैं, और सत्ता निष्पक्ष तरीके से बदल सकती है।
इस
समय, यही भरोसा टूट रहा है।
अगर
संस्थाएं इसी तरह टालमटोल करती रहीं, तो नुकसान जल्द ही अपूरणीय हो सकता है। क्योंकि
जब जनता का विश्वास खत्म होता है, तो वह चुपचाप स्वीकार नहीं करती या तो वह सिस्टम
से दूर हो जाती है, या फिर किसी समय उसके खिलाफ खड़ी हो जाती है।
अब
सवाल यह नहीं है कि समस्या है या नहीं। सवाल यह है कि इसे कब तक नजरअंदाज किया जाएगा।
और इसकी कीमत क्या होगी।
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