कॉकरोच जनता पार्टी: जिस दिन भारत का “56 इंच का शेर” हकीकत से टकरा गया
कॉकरोच जनता पार्टी: जिस दिन भारत का “56 इंच का शेर” हकीकत से टकरा गया
सालों
तक बीजेपी ने देश को
एक सुपरहीरो की कहानी बेची।
“56 इंच का सीना।” “विश्वगुरु
नेता।” “राष्ट्र का शेर।” ऐसा
आदमी जिसे देखकर टीवी
एंकरों की आवाज़ में
खुद-ब-खुद बैकग्राउंड
म्यूजिक बजने लगता था।
देश
को बताया गया कि यही
ताकत है।
लेकिन
असली ताकत आलोचना से
नहीं डरती। असली ताकत पत्रकारों की
आवाज़ बंद नहीं करवाती।
असली ताकत को 24 घंटे गोदी मीडिया
की ज़रूरत नहीं पड़ती। असली ताकत
छात्रों, कॉमेडियनों, एक्टिविस्टों और आम लोगों
पर ट्रोल सेना नहीं छोड़ती।
डर
के सहारे चलने वाली राजनीति
कभी ताकत की निशानी
नहीं होती। वो हमेशा अंदर से खोखले
लोगों की पहचान होती
है। और फिर आया भारतीय
राजनीति का सबसे मज़ेदार
अध्याय:
“कॉकरोच
जनता पार्टी।” ना कोई असली
पार्टी। ना चुनाव आयोग में रजिस्ट्रेशन।
ना कोई कार्यालय। बस एक मज़ाक। एक मीम।
एक ऑनलाइन तंज।
लेकिन
उस छोटे से मज़ाक
ने बीजेपी की पूरी “अजेय”
छवि की हवा निकाल
दी।
यही
इस व्यंग्य की असली खूबसूरती
है।
जिस
“कागज़ी शेर” को बेरोज़गारी
नहीं हिला पाई… महंगाई
नहीं डरा पाई… किसानों
का गुस्सा नहीं झुका पाया,
विपक्ष के भाषण नहीं
गिरा पाए, उसे कॉकरोचों
ने हिला दिया।
सोचिए
ज़रा…
जिस
नेता को इतिहास का
सबसे ताकतवर नेता बताकर बेचा
गया, उसकी पूरी मशीनरी
इंटरनेट पर उड़ते कॉकरोच
मीम देखकर बेचैन हो गई। कहीं विपक्ष
के नेता अब बैठकर
सिर पकड़कर सोच रहे होंगे:
“हमने यात्राएँ निकालीं…” “हमने रैलियाँ कीं…”
“हमने घोटाले उजागर किए…”
और
तभी इंटरनेट पर कोई आदमी
बोला: “भाई… कॉकरोच वाला
मीम डालो।” खेल खत्म।
राजनीति
विज्ञान पढ़ाने वालों को इस घटना
पर रिसर्च करनी चाहिए। बारह साल
की विपक्षी राजनीति जो नहीं कर
पाई, वो एक कॉकरोच
मीम ने कर दिया।
क्यों?
क्योंकि
डर पर टिकी राजनीति
की सबसे बड़ी दुश्मन
हँसी होती है। जिस दिन
जनता डरना छोड़कर हँसना
शुरू कर देती है,
उसी दिन “मजबूत नेता”
की ब्रांडिंग टूटने लगती है।
इसीलिए
तानाशाही मानसिकता वाले लोग कॉमेडियन
से डरते हैं। इसीलिए व्यंग्य
सत्ता को चुभता है।
इसीलिए मीम्स प्रचार से तेज़ चलते
हैं।
आत्मविश्वासी
नेता आलोचना पर हँसता है।
खोखला नेता मज़ाक से घबरा जाता
है। और घबराहट साफ दिखाई दे
रही है।
जो
लोग सालों तक दूसरों को
“देशद्रोही”, “अर्बन नक्सल”, “टुकड़े-टुकड़े गैंग” कहते रहे, वही
अब कॉकरोच वाले मज़ाक से
परेशान दिखाई दे रहे हैं।
यही तो सबसे बड़ा व्यंग्य
है। कॉकरोच जनता पार्टी का
प्रतीक इतना सटीक क्यों
बैठता है?
क्योंकि
कॉकरोच हर चीज़ में
बच जाते हैं:
- खराब
सरकारों में,
- प्रचार
तंत्र में,
- महंगाई
में,
- टीवी
की चीख-पुकार में,
- और
राजनीतिक पाखंड में।
कई
मायनों में तो वो
भारत के विपक्ष से
भी ज़्यादा मज़बूत निकले।
सबसे
मज़ेदार दृश्य तो बीजेपी की
मीटिंग का होगा:
“सर,
बेरोज़गारी बढ़ रही है।”
“कोई
बात नहीं।”
“सर,
महंगाई बढ़ रही है।”
“कोई
बात नहीं।”
“सर…
लोग कॉकरोच मीम शेयर कर
रहे हैं।”
“…सभी
मंत्रियों की इमरजेंसी मीटिंग
बुलाओ।”
इस
रफ्तार से तो जल्द
ही पेस्ट कंट्रोल कंपनियों को “राष्ट्रीय सुरक्षा
साझेदार” घोषित कर दिया जाएगा।
लेकिन
मज़ाक के पीछे एक
गंभीर सच्चाई छिपी है:
सत्ता
तब तक ही बड़ी
दिखती है, जब तक
जनता उससे डरती रहती
है।
जिस
दिन जनता डरना छोड़
देती है, उसी दिन
“56 इंच का सीना” भी
मीम बन जाता है।
क्योंकि
अंत में सबसे ज़्यादा
शोर मचाने वाले नेता अक्सर
अंदर से सबसे ज़्यादा
डरे हुए होते हैं।
और
कभी-कभी एक कागज़ी
शेर की सच्चाई दिखाने
के लिए सिर्फ एक
कॉकरोच ही काफी होता
है।
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