कुदरत का नज़ारा
कुदरत का
नज़ारा
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Taken by Rakesh Sharma
(Poem by Rakesh Sharma)
मैं देख रहा
हूँ उन सबको
कुदरत ने जिन्हें बनाया है
अब आग लगी थी इतनी यहाँ
कुदरत ने खेल दिखाया है
अंधेरों में
डाल के हम सबको
कुछ बातें कुदरत ने की हमसे
तूफ़ान बन कर जब आ गई वो
तब सब कुछ कहा उसने खुल के
मैं आँसू रोती
हूँ तुम पे
पर बाज़ ना आते हो तुम सब
क्यों ज़हर फैलाते हो दुनिया में
क्यों नहीं दिखता तुमको ये रब
अंधेरों से
जुदा कर तुम सबको
मैं लाती हूँ इस दुनिया में
तुम भूल जाते हो सब दुख मेरे
फिर कहर मचाते हो दुनिया में
जंगल को तुमने
ख़त्म किया
छीना है हक तुमने उन सबका
जो बोल न पाएँ खुल के यहाँ
घर-बार छीना तुमने उन सबका
जब कुदरत से
टकराते हम
एक बात समझनी है हमको
जो भी यहाँ हम करते हैं
वो देख रही है हम सबको
जन्नत से क़यामत
में घड़ियाँ
कुछ पल में बदल जाती हैं सब
ख़ामोश पड़ी उस कुदरत में
जब देख नहीं पाते हम उसमें रब
Very nice poem 😊
ReplyDeleteThanks for the compliment
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