अंधभक्ति: देश की सबसे खतरनाक लत

 

अंधभक्ति: देश की सबसे खतरनाक लत

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अंधा होना और अंधभक्ति में डूब जाना, दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क है। दुनिया ने ऐसे अनगिनत नेत्रहीन लोगों को देखा है जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा से इतिहास रचा है। किसी ने पहाड़ फतह किए, किसी ने संगीत में नाम कमाया, किसी ने विज्ञान और साहित्य में दुनिया बदल दी। लेकिन अंधभक्ति में डूबे लोग? उन्होंने समाज जलाए, नफ़रत फैलाई, और फिर उसी बर्बादी को “संस्कृति,” “धर्म,” और “राष्ट्रवाद” का नाम दे दिया।

इतिहास इंसानों की सबसे बड़ी सुविधा है। जो हिस्सा अच्छा लगे, उसे गर्व से कोट करो। जो हिस्सा अपने नेताओं, अपनी भीड़, या अपने धर्म की क्रूरता दिखाए, उसे तुरंत “प्रोपेगेंडा” घोषित कर दो। हर विचारधारा के पास अपना वॉशिंग मशीन विभाग है, जो खून के धब्बों को “भावनाओं” से साफ कर देता है।

सबसे खतरनाक चीज़ यह है कि अंधभक्ति इंसान से सोचने की क्षमता छीन लेती है। सबूत बेकार हो जाते हैं। तर्क अपमान लगने लगता है। तथ्य “देश विरोधी एजेंडा” बन जाते हैं। आप दस्तावेज़ दिखाइए, आँकड़े दिखाइए, वीडियो दिखाइए, अदालत की रिपोर्ट दिखाइए, लेकिन अगर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ने कुछ और पढ़ा दिया है, तो सच की कोई औकात नहीं बचती।

आज का भारत इसी बीमारी की जीती-जागती प्रयोगशाला बन चुका है। सरकार से सवाल पूछो, तो आपको देशद्रोही घोषित कर दिया जाएगा। नीतियों पर सवाल उठाओ, तो कहा जाएगा कि “तुम्हें हिंदुओं से समस्या है।” लोकतंत्र अब ऐसा ग्राहक सेवा केंद्र बन चुका है जहाँ सिर्फ तारीफ़ स्वीकार की जाती है। शिकायत करते ही लाइन काट दी जाती है।

और इस सड़ी हुई व्यवस्था का सबसे बड़ा उदाहरण है परीक्षा पेपर लीक का अंतहीन खेल। आज फिर NEET परीक्षा लीक होने की खबर सामने आई। एक और साल। एक और घोटाला। एक और पीढ़ी, जिसे कहा जाएगा कि “मेहनत करो,” जबकि असली खेल तो परीक्षा शुरू होने से पहले ही बिक चुका होता है।

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद दर्जनों नहीं, बल्कि 90 से अधिक भर्ती और परीक्षा पेपर लीक होने की बातें सामने आई हैं। करोड़ों छात्रों का भविष्य मज़ाक बन चुका है। बच्चे सालों तक पढ़ाई करते हैं, परिवार अपनी जमा पूँजी कोचिंग में झोंक देते हैं, और अंत में पता चलता है कि इस देश में मेरिट नहीं, “सेटिंग” काम करती है। जिसके पास पेपर पहुँचाने वाला नेटवर्क है, वही असली टॉपर है।

और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह सब अब सामान्य माना जाने लगा है। छात्र सड़क पर उतरते हैं। परिवार रोते हैं। मीडिया दो दिन तक चिल्लाता है। कुछ छोटे-मोटे लोगों की गिरफ्तारी होती है। फिर मामला ठंडा पड़ जाता है। जैसे करोड़ों युवाओं का भविष्य बर्बाद होना कोई बड़ी बात ही नहीं।

इससे भी ज़्यादा शर्मनाक बात यह है कि बार-बार आरोप लगते हैं कि इन गिरोहों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है। लेकिन चुनाव आते ही वही जनता फिर लाइन में लगकर वोट देती है, क्योंकि “हिंदुत्व खतरे में है।” आपका भविष्य चोरी हो जाए, नौकरी चली जाए, शिक्षा व्यवस्था सड़ जाए, लेकिन अगर नेता मंच से धर्म का नाम जोर से ले ले, तो सब माफ़।

यही पहचान की राजनीति का असली जादू है। भविष्य चुराओ, फिर धर्म के नाम पर पीड़ितों को ही भावुक बना दो।

“ड्रग-फ्री इंडिया” का नाटक भी कुछ ऐसा ही है। भाषण बड़े-बड़े। पोस्टर विशाल। वादे आसमान छूते हुए। हर चुनाव में नेता खुद को नशे के खिलाफ योद्धा घोषित कर देते हैं। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि आखिर ये ड्रग्स समाज में पहुँचा कौन रहा है। यह ऐसा है जैसे मच्छर खुद मलेरिया के खिलाफ अभियान चला रहा हो।

गुजरात को “ड्राई स्टेट” बताकर नैतिकता का ब्रांड बनाया जाता है। आधिकारिक तौर पर शराब बंद है। अनौपचारिक तौर पर शराब इतनी आसानी से मिलती है कि लगता है सरकार ने सिर्फ टैक्स छोड़ दिया है, शराब नहीं। नतीजा? सरकार को हजारों करोड़ का नुकसान, काला बाज़ार फलता-फूलता हुआ, और जहरीली शराब से लोगों की मौतें।

फिर वही सरकारी स्क्रिप्ट शुरू होती है: दुख व्यक्त करो। जांच बैठाओ। दो दिन टीवी पर चिल्लाओ। फिर सब भूल जाओ।

लेकिन असली कीमत आम लोग चुकाते हैं। अस्पताल दुर्घटनाओं और जहरीली शराब के मामलों से भरते रहते हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था पर बोझ बढ़ता है। फिर भी सरकारें समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नैतिक भाषण बेचती रहती हैं।

हार्ड ड्रग्स का मामला तो और भी दिलचस्प है। कभी-कभी हजारों करोड़ की ड्रग्स पकड़ी जाती है। टीवी एंकर ऐसे चिल्लाते हैं जैसे देश बचा लिया हो। दो दिन बाद खबर गायब। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। बड़े नाम आते ही जांच की रफ्तार अचानक लकवाग्रस्त हो जाती है।

और फिर आता है “गोडी मीडिया”। देश का वह मीडिया जो पत्रकारिता कम और सरकारी पीआर एजेंसी ज़्यादा लगता है। इनका काम सत्ता से सवाल पूछना नहीं, सत्ता की रक्षा करना है। प्राइम टाइम डिबेट अब पत्रकारिता नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद का रियलिटी शो बन चुकी हैं। बेरोजगारी, पेपर लीक, भ्रष्टाचार, ड्रग नेटवर्क, शिक्षा व्यवस्था की बर्बादी जैसे मुद्दे गायब कर दिए जाते हैं। उनकी जगह हर रात धर्म, नफरत, पाकिस्तान और नकली गुस्से का तमाशा परोसा जाता है।

आज के भारत में पत्रकारिता का मतलब शायद यही रह गया है: “सर, आप देश के लिए इतना काम कैसे कर लेते हैं?”

चुनावों में वोट चोरी, चुनावी गड़बड़ियों और लंबित मामलों पर भी शोर उठता है। लेकिन अदालतों में सैकड़ों मामले सालों तक पड़े रहते हैं। और जैसा हमेशा कहा जाता है, “Justice delayed is justice denied.” जब तक फैसला आता है, सरकारें बन चुकी होती हैं, करियर बर्बाद हो चुके होते हैं, और जनता का ध्यान किसी नए धार्मिक मुद्दे पर भटका दिया जाता है।

सबसे दुखद बात भ्रष्टाचार नहीं है। भ्रष्टाचार तो हमेशा से था। सबसे दुखद बात यह है कि लोग उसी व्यवस्था की रक्षा कर रहे हैं जो उनका भविष्य खा रही है। छात्र अवसर खो रहे हैं। परिवार उम्मीद खो रहे हैं। युवा अपना आत्मविश्वास खो रहे हैं। फिर भी लोग तालियाँ बजा रहे हैं, क्योंकि नेता मंच से धर्म की बात कर रहा है।

कब लोग समझेंगे कि उन्हें विकास नहीं, भावनात्मक नशा बेचा जा रहा है? कब समझेंगे कि असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धर्म और नफरत का इस्तेमाल किया जा रहा है? कब समझेंगे कि जिस व्यवस्था को वे देशभक्ति समझ रहे हैं, वही उनके बच्चों का भविष्य बेच रही है?

अंधभक्ति राजनीति का सबसे खतरनाक हथियार है, क्योंकि यह जवाबदेही खत्म कर देती है। सोचने वाला नागरिक सवाल पूछता है। अंधभक्त सवाल पूछने वाले पर हमला करता है।

और यही आज की राजनीति की सबसे बड़ी जीत है।

सच अब सच नहीं रहा। तथ्य अब “प्रोपेगेंडा” हैं। और जो लोग सबसे ज़्यादा ठगे जा रहे हैं, वही सबसे ज़ोर से तालियाँ बजा रहे हैं।



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