लोकतंत्र घेराबंदी में: भारत का संकट अब सिर्फ एक पार्टी का नहीं, बल्कि गणराज्य के भविष्य का है
लोकतंत्र घेराबंदी में: भारत का संकट अब सिर्फ एक पार्टी का नहीं, बल्कि गणराज्य के भविष्य का है
हर
लोकतंत्र एक ऐसे मोड़
पर पहुँचता है जहाँ नागरिकों
को एक कठिन सवाल
पूछना पड़ता है: क्या सत्ता
अब भी जनता के
हाथ में है, या
धीरे-धीरे वह कुछ
ऐसे राजनीतिक लोगों और संस्थाओं के
हाथों में चली गई
है जो अब स्वतंत्र
रूप से काम नहीं
कर रहीं?
आज
कई भारतीयों को लगता है
कि देश उसी मोड़
की ओर बढ़ रहा
है।
लोकतंत्र
केवल चुनावों से नहीं चलता।
अगर जनता की रक्षा
के लिए बनी संस्थाएँ
धीरे-धीरे सत्ता की
रक्षा करने लगें, तो
लोकतंत्र अंदर से कमजोर
होने लगता है, भले
ही बाहर से उसकी
संरचना वैसी ही दिखाई
दे। जब अदालतें, जांच
एजेंसियाँ, मीडिया और संवैधानिक संस्थाएँ
राजनीतिक रूप से प्रभावित
दिखने लगें, तब लोकतंत्र का
वास्तविक अर्थ खतरे में
पड़ जाता है।
सबसे
बड़ी चिंता यह है कि
न्यायपालिका की वैधता का
इस्तेमाल राजनीतिक फैसलों को अंतिम सत्य
की तरह प्रस्तुत करने
के लिए किया जा
रहा है। विवादित फैसलों
को संविधान या नैतिकता के
आधार पर नहीं, बल्कि
केवल इस आधार पर
सही ठहराया जाता है कि
“सीजेआई ने कहा है।”
जनता से अपेक्षा की
जाती है कि वह
सवाल पूछना बंद कर दे।
लेकिन
कोई भी लोकतंत्र तब
तक स्वस्थ नहीं रह सकता
जब तक उसकी संस्थाओं
पर सवाल पूछने का
अधिकार जनता के पास
बना रहे।
इतिहास
बताता है कि लोकतंत्र
एक दिन में खत्म
नहीं होते। वे धीरे-धीरे
संस्थागत कब्जे के कारण कमजोर
पड़ते हैं। अमेरिका इसका
बड़ा उदाहरण है। 1776 में ब्रिटिश साम्राज्य
से आज़ादी के बाद वहाँ
के संस्थापकों ने ऐसा संविधान
बनाया जिसमें राष्ट्रपति, कांग्रेस, सीनेट और सुप्रीम कोर्ट
के बीच शक्तियों का
विभाजन किया गया, ताकि
कोई एक व्यक्ति पूरे
देश पर नियंत्रण न
कर सके।
लेकिन
समय के साथ अमेरिका
में भी राजनीतिक ताकतों
ने संस्थाओं को प्रभावित करना
सीख लिया। आज का अमेरिका
दिखाता है कि लोकतंत्र
हमेशा सैन्य तख्तापलट से नहीं मरता।
वह कानूनी ढाँचे के भीतर रहते
हुए भी धीरे-धीरे
कमजोर किया जा सकता
है।
कई
आलोचकों का मानना है
कि भारत अब इसी
तरह के संकट का
सामना कर रहा है,
बस तरीका अलग है।
यहाँ
सत्ता बनाए रखने के
लिए पैसे, भ्रष्टाचार, राजनीतिक निर्भरता और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा
का इस्तेमाल किया जाता है।
जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के
आरोप होते हैं, उन्हें
ताकतवर पद दिए जाते
हैं क्योंकि कमजोर और समझौता करने
वाले लोग नियंत्रण में
रखना आसान होता है।
गठबंधन राजनीति फिर जनहित की
जगह सत्ता बचाने का खेल बन
जाती है।
इससे
एक खतरनाक चक्र पैदा होता
है: संस्थाएँ सत्ता को सामान्य बना
देती हैं, विपक्ष कमजोर
होता जाता है, जवाबदेही
खत्म होती जाती है
और जनता का भरोसा
टूटने लगता है।
इसका
सबसे बड़ा असर युवाओं
पर दिखाई देता है। बेरोज़गारी,
पेपर लीक, घटते अवसर
और बढ़ती आर्थिक असुरक्षा ने करोड़ों युवाओं
को निराश कर दिया है।
जब मेहनत और योग्यता का
कोई मूल्य न दिखे, तो
गुस्सा स्वाभाविक है।
ऐसे
समय में महात्मा गांधी
की विरासत और भी महत्वपूर्ण
हो जाती है। गांधी
ने दुनिया को दिखाया कि
संगठित और नैतिक जनआंदोलन
किसी भी साम्राज्य को
चुनौती दे सकता है।
उन्होंने साबित किया कि बिना
हिंसा के भी जनता
सत्ता को झुकने पर
मजबूर कर सकती है।
इसी
कारण कई लोग मानते
हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ और भारतीय जनता
पार्टी के कुछ वर्गों
द्वारा गांधी की छवि को
कमजोर करने की कोशिश
केवल इतिहास की बहस नहीं
है। यह राष्ट्रवाद की
परिभाषा बदलने की कोशिश है।
दूसरी ओर नाथूराम गोडसे
और विनायक दामोदर सावरकर को कुछ समर्थकों
द्वारा राष्ट्रवादी नायकों की तरह प्रस्तुत
किया जा रहा है।
कई
भारतीयों के लिए यह
केवल इतिहास का विवाद नहीं,
बल्कि भारत की आत्मा
की लड़ाई है।
भारत
का संकट केवल राजनीतिक
नहीं, सामाजिक भी है। विज्ञान
और आर्थिक प्रगति के बावजूद जाति,
वर्ग और सामाजिक असमानता
आज भी समाज में
गहराई से मौजूद है।
अब भी एक बड़ा
वर्ग मानता है कि कुछ
लोग शासन करने के
लिए पैदा होते हैं
और कुछ केवल सेवा
करने के लिए। यह
सोच लोकतंत्र के मूल सिद्धांत
के खिलाफ है, जिसमें हर
नागरिक को समान सम्मान
और अधिकार मिलने चाहिए।
फिर
भी इतिहास एक और बात
सिखाता है: कोई भी
सरकार हमेशा के लिए अजेय
नहीं रहती अगर जनता
संगठित होकर खड़ी हो
जाए।
भारत
ने यह 2011-14 के आंदोलन में
देखा, जब अन्ना हज़ारे
के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी
आंदोलन ने पूरे देश
को हिला दिया। उसी
आंदोलन ने वह राजनीतिक
माहौल तैयार किया जिसने अंततः
नरेंद्र मोदी को 2014 में
सत्ता तक पहुँचने का
रास्ता दिया।
मोदी
की सबसे बड़ी ताकत
केवल राजनीति नहीं थी। उन्होंने
लोगों को एक नया
सपना दिया। भ्रष्टाचार और निराशा से
थकी जनता को उन्होंने
विश्वास दिलाया कि भारत बदल
सकता है और आगे
बढ़ सकता है। चाहे
कोई उनके वादों से
सहमत हो या नहीं,
उनकी सफलता इस बात में
थी कि उन्होंने लोगों
को उम्मीद दी।
यहीं
आज विपक्ष सबसे कमजोर दिखाई
देता है।
सिर्फ
सरकार की आलोचना करना
काफी नहीं है। जनता
केवल गुस्से के पीछे नहीं
चलती, वह उम्मीद के
पीछे चलती है। आज
भी विपक्ष के बड़े हिस्से
को लोग पुराने भ्रष्टाचार,
परिवारवाद और कमजोर नेतृत्व
से जोड़कर देखते हैं।
अगर
वास्तविक परिवर्तन लाना है, तो
या तो एक नया
नेता उभरना होगा जो पुराने
राजनीतिक ढाँचे से अलग दिखाई
दे, या फिर पुराने
नेतृत्व को खुलकर अपनी
गलतियों को स्वीकार करते
हुए देश के सामने
एक नई दृष्टि रखनी
होगी। ऐसी दृष्टि जिसमें
जवाबदेही हो, संस्थाओं की
स्वतंत्रता हो, आर्थिक अवसर
हों और लोकतांत्रिक सुधार
हों।
क्योंकि
असली लड़ाई अब केवल राजनीतिक
दलों के बीच नहीं
है।
यह
लड़ाई उस जनता की
है जो अब भी
लोकतंत्र में विश्वास बनाए
रखने की कोशिश कर
रही है, और उस
व्यवस्था की है जिसे
लोग धीरे-धीरे जनता
से ज्यादा सत्ता की सेवा करते
हुए देख रहे हैं।
अंततः
लोकतंत्र तभी बचता है
जब नागरिक चुप रहने से
इंकार कर दें। इतिहास
बार-बार साबित करता
है कि कोई भी
सरकार, चाहे कितनी भी
शक्तिशाली क्यों न हो, एक
जागरूक और संगठित जनता
के सामने हमेशा टिक नहीं सकती।
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