सरकार की सबसे बड़ी ताकत है बिखरा हुआ विपक्ष
सरकार की सबसे बड़ी ताकत है बिखरा हुआ विपक्ष
हर
कुछ हफ्तों में भारत में
कोई न कोई नया
विवाद सामने आता है पेपर
लीक, बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों का आंदोलन, चुनावी
पारदर्शिता पर सवाल, संस्थाओं
की निष्क्रियता या विपक्षी नेताओं
पर हमले।
कुछ
दिनों तक मीडिया में
शोर मचता है, सोशल
मीडिया गरम रहता है,
नेता बयान देते हैं,
टीवी बहसें होती हैं फिर
सब शांत हो जाता
है।
क्यों?
क्योंकि
हर समूह अपनी अलग
लड़ाई लड़ रहा है,
जबकि सरकार के सामने कोई
एकजुट चुनौती नहीं है। छात्र परीक्षा
घोटालों से लड़ रहे
हैं। किसान अपनी आजीविका के
लिए लड़ रहे हैं।
युवा रोजगार के लिए संघर्ष
कर रहे हैं।
विपक्षी
दल अपनी राजनीतिक ज़मीन
बचाने में लगे हैं।
क्षेत्रीय नेता अपने प्रभाव को
बढ़ाने में व्यस्त हैं।
हर कोई लड़ रहा है,
लेकिन साथ नहीं लड़
रहा। यही भाजपा की सबसे बड़ी
ताकत बन चुकी है।
पेपर लीक को बेरोज़गारी से
अलग देखा जाता है।
बेरोज़गारी को महंगाई से अलग। महंगाई को
शासन की विफलताओं से
अलग। जबकि आम नागरिक इन
सभी समस्याओं को एक-दूसरे
से जुड़ा हुआ देखता है।
पेपर
लीक का शिकार छात्र
अंततः उसी बेरोज़गार बाज़ार
में प्रवेश करता है। आर्थिक
संकट झेल रहा किसान
उसी व्यवस्था से प्रभावित होता
है जिससे छात्र और मज़दूर प्रभावित
होते हैं। जवाबदेही की
मांग करने वाला नागरिक
वही है जो संस्थाओं
की चुप्पी पर सवाल उठाता
है।
ये
अलग-अलग कहानियाँ नहीं
हैं। ये एक ही कहानी
के अलग-अलग अध्याय
हैं जवाबदेही की कहानी। राहुल गांधी
द्वारा चुनावी प्रक्रिया और मतदाता आंकड़ों
पर उठाए गए सवालों
को ही देख लीजिए।
यदि आरोप गलत हैं
तो उन्हें स्पष्ट रूप से गलत
साबित किया जाना चाहिए।
यदि उनमें दम है तो
उनकी जांच होनी चाहिए।
लेकिन
आज स्थिति यह है कि
सरकार आरोपों को खारिज करती
है, विपक्ष उन्हें दोहराता है और संस्थाएँ
ऐसी स्पष्टता नहीं देतीं जिससे
जनता का भरोसा बहाल
हो सके।
इससे
भी बड़ा सवाल विपक्ष
से है। यदि विपक्ष मानता है कि ये
मुद्दे लोकतंत्र के लिए खतरा
हैं, तो वह इनके
पीछे एकजुट क्यों नहीं होता? क्यों
हर दल अपनी अलग
राजनीति कर रहा है?
क्यों हर नेता बदलाव
का चेहरा बनने की कोशिश
में है, बजाय बदलाव
की लड़ाई को मजबूत करने
के? यहीं विपक्ष की
सबसे बड़ी कमजोरी दिखाई
देती है। कई क्षेत्रीय नेता विपक्ष को
मजबूत करने से अधिक
अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में लगे
दिखाई देते हैं।
नतीजा
यह है कि विपक्ष
गठबंधन तो है, लेकिन
उद्देश्य में एकजुट नहीं
है। नई सरकार-विरोधी संस्थाएँ और समूह भी
अक्सर यही गलती दोहराते
हैं। वे लोगों में
उत्साह तो पैदा करते
हैं, लेकिन यदि वे विपक्षी
ताकतों को और बाँटते
हैं, तो अनजाने में
सरकार को ही लाभ
पहुँचाते हैं। उत्साह संगठन का विकल्प नहीं
है। दिखाई देना रणनीति का
विकल्प नहीं है।
इतिहास
बताता है कि सरकारें
बिखरे हुए आंदोलनों से
नहीं, बल्कि एकजुट गठबंधनों से चुनौती पाती
हैं। दुर्भाग्य यह है कि
छात्र, किसान, बेरोज़गार युवा, सामाजिक संगठन और विपक्षी दल
सभी जवाबदेही, पारदर्शिता, अवसर और न्याय
की मांग कर रहे
हैं लेकिन अलग-अलग।
और
इसी कारण वे साथ
मिलकर जीत नहीं पाते।
भारत का भविष्य किसी एक चुनाव,
एक आंदोलन या एक नेता
से तय नहीं होगा।
यह इस बात से तय
होगा कि बदलाव की
मांग करने वाले लोग
कब समझेंगे कि उनकी लड़ाई
अलग-अलग नहीं, बल्कि
एक ही लड़ाई के
अलग-अलग मोर्चे हैं।
विपक्ष
की सबसे बड़ी समस्या
भाजपा नहीं है। विपक्ष की
सबसे बड़ी समस्या है
विपक्ष का एकजुट न
होना।
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