भारत के युवाओं का सब्र अब टूट चुका है: टूटी हुई व्यवस्था पर कोई देश खड़ा नहीं रह सकता

 भारत के युवाओं का सब्र अब टूट चुका है: टूटी हुई व्यवस्था पर कोई देश खड़ा नहीं रह सकता

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भारत में छात्रों का गुस्सा अब भीतर ही भीतर नहीं सुलग रहा। वह सड़कों पर उतर चुका है, परीक्षा केंद्रों में फूट चुका है और पूरे समाज में फैल चुका है। वर्षों से युवाओं से कहा गया कि मेहनत करो, ईमानदारी से पढ़ो और उस व्यवस्था पर भरोसा रखो जो योग्यता के आधार पर अवसर देने का दावा करती है। लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश की हाल की घटनाओं ने दिखा दिया है कि यह व्यवस्था कितनी गहराई तक सड़ चुकी है।

बिहार में एक परीक्षा इसलिए रद्द करनी पड़ी क्योंकि कथित तौर पर संगठित नकल माफिया परीक्षा केंद्रों तक पहुँच गए थे ताकि पैसे देकर परीक्षा देने वालों को उत्तर उपलब्ध करा सकें। उत्तर प्रदेश में स्थिति और भी शर्मनाक रही। परीक्षा केंद्र की क्षमता 370 छात्रों से भी कम थी, लेकिन वहाँ उससे दोगुने से अधिक छात्रों को बुला लिया गया। फिर छात्रों से कहा गया कि वे 45 डिग्री की भीषण गर्मी में तीन-तीन शिफ्टों में परीक्षा दें। कई छात्र दूर-दराज़ से आए थे। कुछ के पास लौटने तक के पैसे नहीं थे। अंततः परीक्षा रद्द कर दी गई। गुस्से से भरे छात्रों ने केंद्र में तोड़फोड़ कर दी।

सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना सही नहीं कहा जा सकता, लेकिन उस गुस्से को समझना मुश्किल भी नहीं है। देशभर के छात्र अपमानित, थके हुए और टूटे हुए महसूस कर रहे हैं। उन्हें लगने लगा है कि इस व्यवस्था को उनके भविष्य की कोई परवाह नहीं है। NEET पेपर लीक कांड ने शिक्षा व्यवस्था में बचा-खुचा भरोसा भी खत्म कर दिया। लाखों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया, लेकिन आज तक लोगों को यह महसूस नहीं हुआ कि इस पूरे घोटाले के असली जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई हुई हो।

युवाओं का दर्द अब सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। यह उस पूरे माहौल के खिलाफ गुस्सा है जहाँ आम आदमी लगातार कुचला जा रहा है और सत्ता में बैठे लोग जवाबदेही से बच निकलते हैं।

जब पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तब जनता से कहा जाता है कि यहराष्ट्रीय हितमें है। जब गैस सिलेंडर गरीब और मध्यम वर्ग की पहुँच से बाहर होने लगते हैं, तब भी लोगों से चुप रहने की उम्मीद की जाती है। दूसरी तरफ बड़ी कंपनियाँ रिकॉर्ड मुनाफा कमाती रहती हैं। आम जनता को ऐसा लगता है कि सरकारें जनता की तकलीफ से ज्यादा कॉरपोरेट हितों की चिंता करती हैं। लोगों को यह भी महसूस होता है कि ईंधन जमा करके कीमतें बढ़ाने वाली कंपनियों के खिलाफ कोई गंभीर कार्रवाई नहीं होती।

गुस्सा तब और बढ़ता है जब एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं, लेकिन नतीजा शून्य रहता है। हजारों करोड़ रुपये के घोटालों की खबरें आती हैं। सरकारी प्रशिक्षण योजनाओं, रोजगार कार्यक्रमों और सार्वजनिक कल्याण के नाम पर भारी अनियमितताओं के आरोप लगते हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्टें बार-बार सरकारी योजनाओं में गड़बड़ियों और धन के दुरुपयोग की ओर इशारा करती हैं। फिर भी जनता को शायद ही कभी बड़े स्तर पर सजा, गिरफ्तारी या व्यवस्था में सुधार दिखाई देता है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि सत्ता और संस्थानों में अहंकार साफ दिखाई देने लगा है। जब संघर्ष कर रहे युवा लड़के-लड़कियों कोकॉकरोचजैसी अपमानजनक भाषा से संबोधित किया जाता है, तो यह सिर्फ एक शब्द नहीं होता, बल्कि यह उस मानसिकता को दिखाता है जिसमें आम नागरिकों की गरिमा का कोई मूल्य नहीं रह गया है। जब बेरोजगार और परीक्षा की तैयारी कर रहे युवाओं को तुच्छ समझा जाने लगे, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

प्रधानमंत्री Narendra Modi के आलोचक आरोप लगाते हैं कि सरकार अब शासन से ज्यादा अपनी छवि बचाने में व्यस्त है। उनका कहना है कि मीडिया प्रबंधन और राजनीतिक प्रचार ने जवाबदेही की जगह ले ली है। समर्थक इन आरोपों को खारिज करते हैं और सरकार की उपलब्धियों की बात करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि जनता के एक बड़े हिस्से में यह भावना बढ़ रही है कि उनकी आवाज़ सुनी नहीं जा रही।

यह सिर्फ राजनीतिक संकट नहीं है। यह नैतिक संकट भी है।

कोई भी लोकतंत्र तब तक मजबूत नहीं रह सकता जब छात्रों को लगने लगे कि परीक्षाएँ खरीदी जा सकती हैं, जब मजदूरों को लगे कि उनके नाम पर आने वाला पैसा चोरी हो जाएगा, और जब नागरिकों को विश्वास हो जाए कि कानून सिर्फ कमजोर लोगों पर लागू होता है।

लेकिन केवल नेताओं को दोष देना भी पर्याप्त नहीं है। समाज को भी अपने भीतर झाँकना होगा। चुनावों में शराब, पैसे और उपहार बाँटना और लेना, जाति और धर्म के नाम पर वोट देना, और भ्रष्टाचार कोसिस्टम का हिस्सामान लेना लोकतंत्र को धीरे-धीरे खोखला करता है। लोकतंत्र एक दिन में नहीं टूटता। वह हर बार थोड़ा कमजोर होता है जब समाज ईमानदारी से समझौता करता है।

फिर भी भारत को एक पूरी तरह टूटा हुआ देश कहना गलत होगा। आज भी इस देश में पत्रकार, वकील, शिक्षक, सेवानिवृत्त न्यायाधीश, सामाजिक कार्यकर्ता और जागरूक नागरिक हैं जो सच के लिए लड़ रहे हैं। Tamil Nadu, Karnataka और Kerala जैसे राज्यों का अक्सर उदाहरण दिया जाता है जहाँ नागरिक जागरूकता और संस्थागत प्रतिरोध कुछ मामलों में जवाबदेही बनाए रखने में मदद करते हैं।

लेकिन सिर्फ गुस्सा काफी नहीं है। बिना संगठन का गुस्सा जल्दी खत्म हो जाता है। जो लोग सच में इस देश से प्यार करते हैं, उन्हें अपनी नाराजगी को कार्रवाई में बदलना होगा। जनहित याचिकाएँ, स्वतंत्र जांच, नागरिक निगरानी समूह और लगातार मीडिया दबाव लोकतंत्र के वैध हथियार हैं। सेवानिवृत्त न्यायाधीश, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और छात्र मिलकर स्वतंत्र जांच और जन-जागरूकता अभियान चला सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षित लोगों को अब चुप दर्शक बनकर नहीं बैठना चाहिए। जब परीक्षा व्यवस्था टूटने लगे, जब भ्रष्टाचार सामान्य बात बन जाए और जब युवाओं का मेहनत और योग्यता से भरोसा उठने लगे, तब देश का भविष्य खतरे में पड़ जाता है।

भारत के युवा कोई चमत्कार नहीं मांग रहे। वे सिर्फ निष्पक्षता, ईमानदारी और जवाबदेह व्यवस्था मांग रहे हैं। यह मांग तो गलत है और ही कट्टरपंथी।

असली खतरा छात्रों का गुस्सा नहीं है। असली खतरा वह समाज है जो इस गुस्से को तब तक नजरअंदाज करता रहता है, जब तक वह विस्फोट में बदल जाए।

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