शिक्षा पर हमला, भारत के भविष्य पर हमला
शिक्षा पर हमला, भारत के भविष्य पर हमला
पटना
स्थित खान अकादमी इंस्टीट्यूट पर हुआ हमला केवल एक संस्थान पर हमला नहीं है। यह उस
विचार पर हमला है कि शिक्षा समाज के सबसे कमजोर और वंचित लोगों को आगे बढ़ने की ताकत
दे सकती है। लोकतंत्र में किसी भी शैक्षणिक संस्थान को डराने, दबाने या हिंसा का निशाना
बनाने की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
इस
घटना को सिर्फ “कुछ किराए के गुंडों” की हरकत कहकर टाल देना आसान होगा, लेकिन यह अधूरा
सच होगा। हाल के दिनों में जिस तरह कुछ मीडिया चेहरों और टीवी बहसों में ऑनलाइन कोचिंग
संस्थानों और सस्ती शिक्षा देने वाले प्लेटफॉर्म्स को निशाना बनाया गया, उसने ऐसे माहौल
को जन्म दिया है जहां शिक्षा के लोकतंत्रीकरण को संदेह की नजर से देखा जाने लगा। जब
प्रभावशाली मीडिया चेहरे इन संस्थानों को देश के लिए समस्या बताने लगते हैं, उन्हें
घटिया या खतरनाक बताकर पेश करते हैं, तब समाज में शिक्षा के जरिए हो रहे सामाजिक बदलाव
के खिलाफ एक मानसिकता मजबूत होती है।
सच्चाई
यह है कि इन ऑनलाइन संस्थानों ने भारत के गरीब, ग्रामीण और पिछड़े वर्गों के लाखों
युवाओं की जिंदगी बदली है। जिन छात्रों के पास बड़े शहरों की महंगी कोचिंग में जाने
के पैसे नहीं थे, उन्हें पहली बार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का अवसर मिला। हजारों
युवाओं ने सरकारी नौकरियां हासिल कीं, अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति बदली और समाज
में सम्मानजनक स्थान पाया।
यही
कारण है कि ऐसे संस्थान केवल “कोचिंग सेंटर” नहीं हैं। वे सामाजिक परिवर्तन के केंद्र
बन चुके हैं। उन्होंने शिक्षा को कुछ विशेष वर्गों की जागीर बनने से रोका है।
आज
का सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कुछ लोगों को इस बदलाव से इतनी परेशानी क्यों है?
क्यों हर उस व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश होती है जो गरीब और पिछड़े समाज को ऊपर
उठाने का काम करती है? क्यों उन संस्थानों को निशाना बनाया जाता है जो जाति, धर्म और
आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर शिक्षा उपलब्ध कराते हैं?
विडंबना
यह है कि हमारे समाज में पत्थरों को कपड़े पहनाने और उन्हें भोजन चढ़ाने में तो कोई
समस्या नहीं दिखाई देती, लेकिन जब गरीबों के बच्चों को पढ़ाकर उन्हें अधिकारी, इंजीनियर
या कर्मचारी बनाने की बात आती है, तब अचानक “सिस्टम”, “संस्कृति” और “व्यवस्था” खतरे
में दिखाई देने लगती है।
खान
अकादमी जैसे संस्थानों की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव
नहीं करते। वहां हर वर्ग का छात्र पढ़ता है। शायद यही बात उन लोगों को असहज करती है
जो समाज को हमेशा पुराने ढांचे और सामाजिक असमानताओं में जकड़े रखना चाहते हैं।
इस
घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में शिक्षा और सामाजिक उन्नति
भी अब राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष का मैदान बन चुकी है? अगर कोई संस्था गरीबों को अवसर
देती है, तो क्या उसे इसलिए निशाना बनाया जाएगा क्योंकि वह स्थापित विशेषाधिकारों को
चुनौती देती है?
मीडिया
की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। पत्रकारिता का काम बहस करना है, लेकिन किसी पूरे
शैक्षणिक आंदोलन को खलनायक की तरह पेश करना खतरनाक है। जब लगातार यह नैरेटिव बनाया
जाता है कि ऑनलाइन शिक्षा संस्थान समाज के लिए समस्या हैं, तब हिंसक मानसिकताओं को
अप्रत्यक्ष वैधता मिलती है।
सरकार
की चुप्पी भी उतनी ही चिंताजनक है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी होती है
कि वह छात्रों, शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। यदि शिक्षा
के केंद्र ही भय और हमलों के निशाने बन जाएं, तो यह केवल कानून व्यवस्था की विफलता
नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की भी विफलता है।
भारत
का भविष्य उन संस्थानों में है जो अवसर पैदा करते हैं, न कि उन ताकतों में जो लोगों
को अज्ञानता और निर्भरता में बनाए रखना चाहती हैं। देश को और अधिक सस्ती शिक्षा, डिजिटल
पहुंच और सामाजिक गतिशीलता की जरूरत है। क्योंकि जब शिक्षा कमजोर पड़ती है, तब लोकतंत्र
भी कमजोर पड़ता है।
पटना
की यह घटना केवल एक शहर की घटना नहीं है। यह उस संघर्ष का प्रतीक है जिसमें एक तरफ
वह भारत है जो शिक्षा के जरिए आगे बढ़ना चाहता है, और दूसरी तरफ वे शक्तियां हैं जो
समाज को पुराने ढांचों और असमानताओं में कैद रखना चाहती हैं।
शिक्षा
पर हमला अंततः भारत के भविष्य पर हमला है।
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